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रविवार, 2 अगस्त 2015

मिशन

मिशनरी संस्थाएँ और एनजीओ
बाल श्रमिक तथा यौन शोषण दुष्चक्र

हमारे भारत के “तथाकथित मेनस्ट्रीम” मीडिया में कभीकभार भूले-भटके महानगरों में काम करने वाले घरेलू नौकरों अथवा नौकरानियों पर होने वाले अत्याचारों एवं शोषण की दहला देने वाली कथाएँ प्रस्तुत होती हैं। परन्तु चैनलों अथवा अखबारों से जिस खोजी पत्रकारिता की अपेक्षा की जाती है वह इस मामले में बिलकुल नदारद पाई जाती है। आदिवासी इलाके से फुसलाकर लाए गए गरीब नौकर-नौकरानियों की दर्दनाक दास्तान बड़ी मुश्किल से ही “हेडलाइन, “ब्रेकिंग न्यूज़” या किसी “स्टिंग स्टोरी” में स्थान पाती हैं। ऐसा क्यों होता है? जब एक स्वयंसेवी संस्था ने ऐसे कुछ मामलों में अपने नाम-पते गुप्त रखकर तथा पहचान छिपाकर खोजबीन और जाँच की तब कई चौंकाने वाले खुलासे हुए।
दिल्ली-मुम्बई-कोलकाता-अहमदाबाद जैसे महानगरों में की गई इस जाँच से पता चला कि बड़े-बड़े शक्तिशाली NGOs तथा कई मिशनरी संस्थाएँ एक बड़े “रैकेट” के रूप में इस करोड़ों रूपए के “धंधे” को चला रही हैं। इस संस्था को जितनी जानकारी प्राप्त हुई है उसके अनुसार इन NGOs एवं मिशनरी संस्थाओं की कार्यशैली इस प्रकार है। सबसे पहले ईसाई मिशनरियाँ भारत के दूरदराज आदिवासी क्षेत्रों में गरीब आदिवासियों को शहर में अच्छी नौकरी और परिवार को नियमित मासिक धन का ऐसा लालच देती हैं कि उसे नकार पाना मुश्किल ही होता है। उस गरीब परिवार की एक लड़की को वह संस्था पहले अपनी शरण में लेकर ईसाई बनाती है और उसे महानगर में उन्हीं की किसी कथित “प्लेसमेंट एजेंसी” के जरिये नौकरानी बनाकर भेज देती है। यह प्लेसमेंट एजेंसी उस धनाढ्य परिवार से पहले ही 30 से 50,000 रूपए “विश्वसनीय नौकरानी” की फीस के रूप में वसूल लेते है।
गाँव में बैठी मिशनरी संस्था और महानगरों की एजेंसी के बीच में भी “दलालों” की एक कड़ी होती है जो इन नौकरों-नौकरानियों को बेचने अथवा ट्रांसफर करने का काम करते हैं। यह एक तरह से “मार्केट सप्लाय चेन” के रूप में काम करता है और प्रत्येक स्तर पर धन का लेन-देन किया जाता है। महानगर में जो कथित प्लेसमेंट एजेंसी होती है, वह इन नौकरानियों को किसी भी घर में चार-छह माह से अधिक टिकने नहीं देती और लगातार अलग-अलग घरों में स्थानान्तरित किया जाता ह। जो परिवार पूरी तरह सिर्फ नौकरों के भरोसे रहते हैं, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके यहाँ कौन काम कर रहा है, क्योंकि उन्हें तो सिर्फ अपने काम पूर्ण होने से मतलब रहता है। चूँकि विश्वसनीयता (खासकर उस नौकर द्वारा चोरी करने वगैरह) की जिम्मेदारी उस एजेंसी की होती है, इसलिए मालिक को कोई फर्क नहीं पड़ता कि नौकरानी कौन है, कहाँ से आई है या चार महीने में ही क्यों बदल गई? इस प्रकार यह प्लेसमेंट एजेंसी एक ही नौकरानी को तीन-चार-छः घरों में स्थानांतरित करते हुए उन धनाढ्यों से धन वसूलती रहती है।
सामान्यतः इन घरेलू नौकरानियों को ना तो अच्छी हिन्दी आती है और ना ही अंग्रेजी. चूँकि उधर सुदूर गाँव में मिशनरी ने मोर्चा संभाला हुआ होता है, इसलिए परिवार को भी कोई चिंता नहीं होती, क्योंकि उस नौकरानी के वेतन में से अपना कमीशन काटकर वह NGO उस परिवार को प्रतिमाह एक राशि देता है, इसलिए वे कोई शिकायत नहीं करते। परन्तु इधर महानगर में वह नौकरानी सतत तनाव में रहती है और बार-बार घर बदलने तथा प्लेसमेंट एजेंसी अथवा NGO पर अत्यधिक निर्भरता के कारण अवसादग्रस्त हो जाती है। इसी बीच इन तमाम कड़ियों में कुछ व्यक्ति ऐसे भी निकल आते हैं जो इनका यौन शोषण कर लेते हैं, परन्तु परिवार से कट चुकी इन लड़कियों के पास वहीं टिके रहने के अलावा कोई चारा नहीं होता. एक अनुमान के मुताबिक़ अकेले दिल्ली में लगभग ८०० ऐसी नौकरानियां काम कर रही हैं, जबकि उधर दूरस्थ आदिवासी इलाके में उसका परिवार चर्च से एकमुश्त मोटी रकम लेकर धर्मान्तरित ईसाई बन चुका होता है.
अपने “शिकार” पर मजबूत पकड़ तथा इन संस्थाओं की गुण्डागर्दी की एक घटना हाल ही में दिल्ली में दिखाई दी थी, जब एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में ऊँचे वेतन पर पदस्थ एक महिला को दिल्ली पुलिस ने अपनी “नौकरानी पर अत्याचार” के मामले में थाने में बैठा लिया था। महिला पर आरोप था कि उसने एक नाबालिग आदिवासी लड़की के साथ मारपीट की है। पुलिस जाँच में पता चला कि वह लड़की झारखण्ड के संथाल क्षेत्र से आई है और उसका परिवार बेहद गरीब है।
हमारी “सनसनी-प्रिय” मीडिया ने खबर को हाथोंहाथ लपका और दिन भर “बालश्रम” विषय पर तमाम लेक्चर झाडे़, खबरें बनाईं. जाँच में आगे पता चला कि उस लड़की को सिर्फ तीन माह पहले ही उस संभ्रांत महिला के यहाँ किसी एजेंसी द्वारा लाया गया था और इससे पहले कम से कम बीस घरों में वह इसी प्रकार काम कर चुकी थी। दिल्ली पुलिस ने जब झारखंड संपर्क किया तो पता चला कि लड़की १८ वर्ष पूर्ण कर चुकी है. यहाँ पर पेंच यह है कि जब उस महिला ने पुलिस को पैसा खिलाने से इनकार कर दिया तब पुलिस ने मामला रफा-दफा कर दिया, जबकि होना यह चाहिए था कि पुलिस उस नौकरानी द्वारा काम किए पिछले सभी घरों की जाँच करती (क्योंकि तब वह नाबालिग थी) और साथ ही उस कथित प्लेसमेंट एजेंसी के कर्ताधर्ताओं की भी जमकर खबर लेती, तो तुरंत ही यह “रैकेट” पकड़ में आ जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि जिस NGO और मिशनरी संस्था से उस एजेंसी की साँठगाँठ थी, उसने ऊपर से कोई राजनैतिक दवाब डलवा दिया और वह नौकरानी चुपचाप किसी और मालिक के यहाँ शिफ्ट कर दी गई. केस खत्म हो गया.
दिल्ली पुलिस के अधिकारी भी इस रैकेट के बारे में काफी कुछ जानते हैं, परन्तु कोई भी कार्रवाई करने से पहले उन्हें बहुत सोचना पड़ता है। क्योंकि अव्वल तो वह नौकरानी “ईसाई धर्मान्तरित” होती है, और उसके पीछे उसका बचाव करने वाली शक्तिशाली मिशनरी संस्थाएँ, NGOs होते हैं, जिनके तार बड़े राजनेताओं से लेकर झारखंड-उड़ीसा के दूरदराज स्थानीय संपर्कों तक जुड़े होते हैं। इन्हीं संगठनों द्वारा ऐसे ही कामों और ब्लैकमेलिंग के लिए महानगरों में कई मानवाधिकार संगठन भी खड़े किए होते हैं. इसलिए पुलिस इनसे बचकर दूर ही रहती है। दिल्ली की उस संभ्रांत महिला के मामले में भी यही हुआ कि वृंदा करात तत्काल मामले में कूद पड़ी और उस महिला पर दबाव बनाते हुए उसे शोषण, अत्याचार वगैरह का दोषी बता डाला, लेकिन इस बात की माँग नहीं की, कि उस एजेंसी तथा उस नौकरानी के पूर्व-मालिकों की भी जाँच हो. क्योंकि यदि ऐसा होता तो पूरी की पूरी “सप्लाय चेन” की पोल खुलने का खतरा था। यही रवैया दूसरे राजनैतिक दलों का भी रहता है. उन्हें भी अपने आदिवासी गरीब वोट बैंक, मिशनरी संस्थाओं से मिलने वाले चन्दे और दूरदराज में काम कर रहे NGOs से कार्यकर्ता आदि मिलते हैं। इसलिए कोई भी राजनैतिक दल इस मामले में गंभीर नहीं है और यथास्थिति बनाए रखता है।
बालश्रम, शोषण के ऐसे मामलों में कुछ शातिर NGOs इसमें भी ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोज लेते हैं। चूँकि उनके पास संसाधन हैं, अनुभव है, नेटवर्क है, तो वे धनाढ्य परिवार को धमकाते हैं कि यदि वे अपनी भलाई चाहते हों तथा पुलिस के चक्करों से बचना चाहते हों तो फलाँ राशि उन्हें दें अन्यथा नौकरानी कैमरे और पुलिस के सामने कह देगी कि उसके साथ यौन शोषण भी किया गया है। पुलिस के अनुसार कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि जब उस एजेंसी (अथवा NGO) को यह लगने लगता है कि बात बिगड़ने वाली है या अब उस परिवार को नौकरानी की जरूरत नहीं रहेगी इसलिए भविष्य में उस परिवार से उनकी आमदनी का जरिया खत्म होने वाला है तो वे इन्हीं नौकरानियों को डरा-धमकाकर महँगे माल की चोरी करवाकर उन्हें रातोंरात वापस उनके गाँव भेज देती हैं। यदि कभी कोई लड़की गलती से तेजतर्रार निकली, बातचीत अच्छे से कर लेती हो, थोड़ी बहुत अंग्रेजी भी सीख चुकी है तो उसे “गोद लेने” के नाम पर अपने किसी विदेशी नेटवर्क के जरिये यूरोप अथवा खाड़ी देशों में भेज दी जाती है।
भारत के मीडिया के बारे में तो कहना ही क्या, “खोजी पत्रकारिता” किस चिड़िया का नाम है, ये तो वे बरसों पहले भूल चुके हैं। इतने सारे संसाधन और रसूख होने के बावजूद उन्हें मानवता से कोई लेना-देना नहीं. किसी घरेलू नौकरानी के शोषण और अत्याचार का मामला उनके लिए TRP बढ़ाने और सनसनीखेज खबर बनाने का माध्यम भर होता है, उन्हें इस बात की कतई चिंता नहीं है कि आखिर ये नौकरानियाँ कहाँ से आती हैं? क्यों आती हैं? कौन इन्हें लाता है? इनका पूरा वेतन क्या वास्तव में उनके ही पास अथवा परिवार के पास पहुँचता है या नहीं? “प्लेसमेंट एजेंसी” क्या काम कर रही है? उनकी फीस कितनी है? ऐसे अनगिनत सवाल हैं परन्तु मीडिया, नेता, पुलिस, तंत्र सभी खामोश हैं और उधर खबर आती है कि २०१४-१५ में पश्चिम बंगाल से सर्वाधिक ११००० लड़कियाँ रहस्यमयी तरीके से गायब हुई हैं, जिनका कोई एक साल से कोई अतापता नहीं चला।
यदि केन्द्र सरकार अपनी सक्षम एजेंसियों के मार्फ़त महानगरों में काम करने वाली नौकरानियों के बारे में एक विस्तृत जाँच करवाए तो कई जाने-माने मिशनरी संस्थाएँ एवं NGOs के चेहरे से नकाब उतारा जा सकता है, जो दिन में "Save the Girl Child", "Donate for a Girl Child" के नारे लगाते हैं, लेकिन रात में "मानव तस्कर" बन जाते हैं।
साभार • सुरेश चिपलूणकर
लिन्क: http://blog.sureshchiplunkar.com/2015/08/missionaries-ngos-and-child-labour.html

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

पशु वध

मेनका के बयान पर तूफान

केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी के बयान को जिस तरह विवाद का विषय बनाया गया है वह अस्वाभाविक नहीं है। लंबे समय से देश के किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठे हुए व्यक्ति के मुंह से ऐसी बातें नहीं निकलीं थीं। जिनमें अल्पसंख्यकों में विशेषकर मुसलमानों के प्रति प्रश्न खड़ा करने का पहलू हो तो उससे लोग दूर ही रहने की कोशिश करते रहे हैं। इसलिए मेनका की बात से सनसनाहट जैसी स्थिति पैदा होती है। हालांकि यह विषय मुस्लिम विरोधी है ही नहीं। मेनका ने मुख्यतः तीन बातें कहीं। पहला, देश में अवैध तरीके से दुधारु गाय की बेरहमी से हत्यायें हो रहीं हैं। उन्हांेंने विशेष तौर पर पश्चिमी एशिया एवं बांग्लादेश का नाम लेते हुए कहा कि उसेे १६०० टन गोमांस का निर्यात किया जा रहा है। हालांकि पशुपालन विभाग के आंकड़ों में यह नहीं मिलेगा। दूसरे, उन्होंने कहा है कि इसे केवल एक समुदाय या मजहब तक तक सीमित नहीं। तीसरे, इसका पैसा आतंकवाद में लग रहा है। मेनका का दावा है कि चार वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश पुलिस को इससे संबंधित रिपोर्ट सौंपी गई थी।
हम रिकॉर्ड में विश्व के सबसे बड़े मांस निर्यातक हो गए हैं। भारत से जो मांस निर्यात होता है वो गाय का है, बैल का है, भैंस का है....इसके बारे में अधिकृत रिकॉर्ड सरकार ने रखा ही नहीं। यूरोप एवं अमेरिका में कहा जाता है कि भारत के निर्यात में भैंस का मांस ज्यादा है। अगर ऐसा ही है तो बैल और देसी गायें कहां विलुप्त होतीं गईं हैं? गाय और उसकी संतति बैल भारतीय किसानों की ताकत थी। बैल खेती को स्वावलंबी बनाता था। गाय हमें पुष्ट रखने के लिए दूध देती है, उसके पेशाब से आयुर्वेद की अनेक दवाईयां बनती हैं तथा उसके गोबर का उपयोग केवल खेत में ही नहीं और कई कार्यों में परंपरागत तरीके से होता रहा है। ऐसे जानवर की हत्या राष्ट्रीय अपराध होना चाहिए।
अनेक कत्लगाहों के खिलाफ गांधीवादी, अहिंसक लोग आंदोलन कर रहे हैं। गांधी जी गोवंश की हत्या के विरुद्ध थे। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में इसे शामिल कर संविधान निर्माताओं ने भावी नेताओं से यह अपेक्षा की थी कि वे गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाएंगे। राष्ट्रीय स्तर पर इसके निषेध का कोई कानून नहीं है। केन्द्र सरकार की पूर्व नीति मांस निर्यात को बढ़ावा देने की रही है और डेयरी विकास के नाम पर इसमें कई प्रकार की छूट भी है। 
आतंकवाद संबंधी आरोपों की पुष्टि उत्तर प्रदेश सरकार ही कर सकती है कि पुलिस को ऐसी रिपोर्ट मिली थी या नहीं। लेकिन आतंकवाद कहीं भी वैध धन से नहीं फैलता। अवैध तरीके से धन दिए जाने से ही जेहादी आतंकवाद का खतरनाक विस्तार हुआ है। अगर कोई मांस के अवैध निर्यात से प्राप्त धन से कुछ आतंकवादियों को मदद कर रहे हों तो इसमें आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। हमारे यहां आतंकवादी पैदा हो रहे हैं यह सच है। तभी तो महाराष्ट्र का एक पढ़ा लिखा युवक अचानक इराक चला गया 
उनकी दूसरी भी सही है। काटने वाले मुसलमान होते हैं, लेकिन उसे ढोने वाले हिन्दू हो सकते हैं, पालने वाले बेचने वाले हिन्दू हो सकते हैं। एवं आईएसआईएस के लिए लड़ते हुए मारा गया। हैदराबाद में पुलिस ने १४ युवाओं को पकड़ा जो इराक और सीरिया जा रहे थे। पता नहीं और कितने कहां से जा रहे होंगे। इनको वहां तक जाने के लिए धन कौन दे रहा है? इसकी तो जांच होनी चाहिए।

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

ईसाइयत

ईसाइयत पर भारत के महापुरुषों के विचार

स्वामी विवेकानन्द
आप मिशनरियों को शिक्षा कपड़े और पैसे क्या इसलिए देते हैं कि वे मेरे देश में आकर मेरे सभी पूर्वजों को मेरे देश में आकर मेरे सभी पूर्वजों को, मेरे धर्म को और जो भी मेरा है, उस सब को गालियां दें, भला बुरा कहें। वे मंदिर के सामने खड़े होकर कहते हैं ऐ ! मूर्तिपूजकों तुम नकर में जाओगे, लेकिन हिन्दुस्तान के मुसलमानों से ऐसी ही बात करने की उनकी हिम्मत इसलिए नहीं होती कि कहीं तलवारें न खिंच जाएं...और आपके धर्माधिकारी जब भी हमारी आलोचना करें, तब वे यह भी ध्यान रखें कि यदि सारा हिन्दुस्तान खड़ा होकर सम्पूर्ण हिन्द महासागर की तलहटी में पड़े कीचड़ को पश्चिमी देशों पर फेंकें, तो भी अन्याय के अंश मात्र का ही परिमार्जन होगा जो आप लोग हमारे साथ कर रहे हैं।
• डेट्राइट में ईसाइयों की एक सभा में वक्त्व्य
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मोहनदास करम चन्द गांधी
यदि वे पूरी तरह से मानवीय कार्यों तथा गरीबों की सेवा करने के बजाय डाक्टरी सहायता, शिक्षा आदि के द्वारा धर्म परिवर्तन करेगें, तो मैं निश्चय ही उन्हें चले जाने को कहूंगा  प्रत्येक राष्ट्र का धर्म अन्य किसी राष्ट्र के धर्म के समान ही श्रेष्ठ है। निश्चय ही भारत का धर्म यहां के लोगों के लिए पर्याप्त है। हमें धर्म परिवर्तन की आवश्कता नहीं।
• गांधी वाङ्मय खण्ड ४५ पृष्ठ ३३९
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पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन्
तुम्हारा क्राइस्ट तुम्हें एक उत्तम स्त्री और पुरुष बनाने में सफल न हो सका, तो हम कैसे मान लें कि वह हमारे लिए अधिक प्रयास करेगा, यदि हम ईसाई बन भी जाएं।
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर
यह एक भयानक सत्य है कि ईसाई बनने से अराष्ट्रीय होते हैं।साथ ही यह भी सत्य है कि ईसाइयत, मतान्तरण के बाद भी जातिवाद नहीं मिटा सकती।• राइटिंग एण्ड स्पीचेज वाल्यूम 5 पृष्ठ 456

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गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर
ईसाई व मुसलमान मत अन्य सभी को समाप्त करने हेतु कटिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य केवल अपने मत पर चलना नहीं है अपितु मानव धर्म को नष्ट करना है।
• पृष्ठ रवीन्द्र नाथ वाडमय २४ वां खण्ड पृष्ठ २७५ , टाइम्स आफ इंडिया १७-०४-१९२७ , कालान्तर




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link: http://www.hindusthangaurav.com/hindustangaurav.asp

कवि

जनपथ










मेरे मस्तिष्क के आकाश में
गहरी धुन्ध
साफ़ हो जाती है
जब मैं
भारत की राजधानी के बीचों-बीच
जनपथ को
राजपथ से
कटते हुए देखता हूं!
• सरदार दलीप सिंह अलमी
सरदार दलीप सिंह अलमी
पिछले दिनों मेरी तबियत के बारे में जानने को घर पर आये हिन्दी के जबरदस्त पक्षपाती मेरे पुराने मित्र गज़लकार-कवि सरदार दलीप सिंह।

वापसी

मंदिर में बदल गया चर्च 

वाल्मीकि समुदाय के 72 लोग हिंदू धर्म में लौटे

• इरम आगा, अलीगढ़
अलीगढ़ में सेवंथ डे एडवेंटिस्ट्स से जुड़ा एक चर्च रातोरात शिव मंदिर में तब्दील हो गया। 1995 में हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई बने वाल्मीकि समाज के 72 लोगों ने फिर से हिंदू धर्म अपना लिया। जिस चर्च में पहले क्रॉस लगा था, उसे हटाकर वहां पर शिव की तस्वीर लगा दी गई है। हिंदू संगठन इसे 'घर वापसी' करार दे रहे हैं।
मंगलवार को अलीगढ़ से 30 किलोमीटर दूर असरोई में चर्च के अंदर व्यापक स्तर पर शुद्धिकरण किया गया। 19 साल पहले ईसाई बने 72 लोगों ने हिंदू धर्म अपना लिया। बताया जा रहा है कि इस चर्च में लगे क्रॉस को हटाकर गेट के बाहर रख दिया गया है और अंदर शिवजी की तस्वीर लगा दी है। जैसे ही इन लोगों के एक बार फिर हिंदू धर्म स्वीकार करने की खबर फैली, इलाके में तनाव फैलना शुरू हो गया। लोकल इंटेलिजेंस यूनिट मौके पर पहुंच गई। कुछ ग्रामीणों ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि अब शिव की तस्वीर को भी हटाकर एक घर में रख लिया गया है।
संघ प्रचारक और धर्म जागरण संगठन के प्रमुख खेम चंद्र ने कहा, 'इसे धर्मांतरण नहीं, घर वापसी कहते हैं। वे अपनी मर्जी से हिंदू धर्म छोड़कर गए थे और जब उन्हें लगा कि उन्होंने गलती की है, तो वे वापस आ गए।' 72 वाल्मीकियों के पुनर्धर्मांतरण पर खेम ने कहा, 'हम उनका स्वागत करते हैं। हम अपने समाज को बिखरने नहीं देंगे, हमें इसे समेटकर रखना होगा।' खेम ने कहा कि ये लोग कई सालों से ईसाई धर्म मान रहे थे। मैं इनसे कई बार मिला और इनसे अपने फैसले पर एक बार फिर से विचार करने को कहा।
एक बार फिर हिंदू धर्म में लौटे अनिल गौड़ का कहा है, 'हम जाति व्यवस्था से परेशान थे और इसी वजह से हमने अपना धर्म बदला था। लेकिन हमने पाया कि ईसाइयों के बीच भी हमारी स्थिति कुछ ठीक नहीं है। हिंदू थे, तब हमारा कोई स्तर नहीं था और हमें छोटे काम करने तक सीमित रहना पड़ता था। 19 साल तक हम ईसाई रहे, लेकिन हमने पाया कि वे भी हमारी कम्यूनिटी की मदद करने नहीं आए। बड़े दिन की कोई सेलिब्रेशन नहीं होती थी। बस मिशनरियों ने एक चर्च बना दिया। और कुछ नहीं।'
चर्च में शिव की तस्वीर लगाते युवक।
78 साल के राजेंद्र सिंह कहते हैं कि वह वापस हिंदू धर्म में आकर बेहद खुश हैं। उन्होंने कहा, 'एक दिन मैं चर्च के बाहर सोया था कि मुझे पैरालिसिस का अटैक हो गया। मैं हिल तक नहीं पा रहा था। मुझे यह पिछले साल हुआ था। तब से लेकर आज तक मैं सोच रहा हूं कि यह मुझे माता देवी ने सजा दी है अपना विश्वास छोड़ने के लिए।'
अलीगढ़ में वकील और ईसाई समुदाय के नेता ओजमंड चार्ल्स इन बातों से सहमत नहीं होते। उन्होंने कहा, 'घर वापसी मुझे एक साजिश लगती है। कभी हम 'लव जिहाद' का शोर सुनते हैं और अब 'घर वापसी' की बात हो रही है। क्या यह हिंदू राष्ट्र बनाने के संकेत हैं? सिटी मेथडिस्ट चर्च के फादर भी इस खबर से नाराज दिखे। उन्होंने कहा, 'यह शुद्धिकरण पूजा उस चर्च के अंदर हुई, जो सेवंथ डे एडवेंटिस्ट्स से जुड़ा है। ऐसा नहीं होना चाहिए। विश्वास व्यक्तिगत मामला है लेकिन चर्च के अंदर हवन नहीं।'
इस बीच असरोई गांव में अगर कोई किसी से पुनर्धर्मांतरण के बारे में पूछता है, तो लोग अपने घरों मे चले जाते हैं तो कुछ कहते हैं कि उन्हें इस बारे में कुछ नहीं मालूम। साथ ही इलाके में पुलिस की मौजूदगी से लोगों में बेचैनी बढ़ गई है।
सौजन्य: नवभारत टाइम्स

शनिवार, 12 जुलाई 2014

जोहरा

१०२ साल की छोकरी
• दिनेश कुमार गेरा
जोहरा आपा.
मैं दादी कहना चाहता था, पर आपा कहता हूं तो सबकी आवाज मेरी आवाज में शामिल हो जाती है. हां तो आपा, लोग कह रहे हैं कि जोहरा इज नो मोर . पागल हैं क्या ये? इन्हें मालूम नहीं कि जिंदादिली भी कभी मरा करती है? कह रहे हैं कि जोहरा 'रेस्ट इन पीस'. मैं सोचता हूं कि तुम उस 'सो कॉल्ड पीस' में रहोगी कैसे. बोर हो जाओगी, सच बता रहा हूं. कोई टुकड़ों में भी शांति पा सकता है भला. वो भी तुम. तुम जैसी नटखट, शरारती, चुलबुली छोकरी. 102 साल की छोकरी. सवाल ही नहीं उठता. इसलिए मैं 'रेस्ट इन पीस' नहीं, 'रेस्ट इन फन' कहूंगा. सच बताऊं तो तुम्हारी रुखसती से न मैं दुखी हूं, न ज्यादा परेशान. हचककर खूब जी लीं यार तुम. जानता हूं कि जोहरा आपा.
मैं दादी कहना चाहता था, पर आपा कहता हूं तो सबकी आवाज मेरी आवाज में शामिल हो जाती है. हां तो आपा, लोग कह रहे हैं कि जोहरा इज नो मोर . पागल हैं क्या ये? इन्हें मालूम नहीं कि जिंदादिली भी कभी मरा करती है?
कह रहे हैं कि जोहरा 'रेस्ट इन पीस'. मैं सोचता हूं कि तुम उस 'सो कॉल्ड पीस' में रहोगी कैसे. बोर हो जाओगी, सच बता रहा हूं. कोई टुकड़ों में भी शांति पा सकता है भला. वो भी तुम. तुम जैसी नटखट, शरारती, चुलबुली छोकरी. 102 साल की छोकरी. सवाल ही नहीं उठता. इसलिए मैं 'रेस्ट इन पीस' नहीं, 'रेस्ट इन फन' कहूंगा. सच बताऊं तो तुम्हारी रुखसती से न मैं दुखी हूं, न ज्यादा परेशान. हचककर खूब जी लीं यार तुम. जानता हूं कि 'ओल्ड वुमन' कहकर छेड़ूंगा तो मेरी शामत आ जाएगी.
सुनो, अब ऊपर जा रही हो तो बदल न जाना.
तुम्हारी वो नटखट लड़कियों वाली हरकतें थीं न फिल्मों वाली, उन्हें जारी रखना. अब चली गई हो तो बताए देता हूं कि मैंने तुम्हारा कोई नाटक या एक्टिंग का नायाब नमूना नहीं देखा, लेकिन फिल्में खूब देखीं. तुम्हें देखता था तो लगता था कि हर औरत को ऐसा ही होना चाहिए.
'चीनी कम' में तुमने अमिताभ की जो टांग खिचाई की थी. आहा. ऐसा लगा था कि अमिताभ को हमने छेड़ा हो और हम ही महानायक के मजे लेकर खिलखिला दिए हों. इस जीवंत भरोसे से ही तुम ही किसी को डांट सकती थीं. तुम्हारे गालों पर जो नूर झुर्रियों से होते हुए टपकता है, दावे से कह सकता हूं कि आज भी तमाम दिलफेंक बुढ़ऊ उस पर अपनी बची-खुची जान छिड़कते होंगे.
धुंधली सी एक याद है. बताऊं क्या. तब मैंने 'दिल से' फिल्म देखी थी. फिल्म देखने के बाद जब अपनी दादी से मिला तो बोला कि ऐ दादी तुम भी फिल्मों में बूढ़ी हीरोइन बन जाओ न. तो दादी ने प्यार से पागल कहकर हल्की सी चपत लगा दी. अभी दो साल पहले जब तुमने सावन की सेंचुरी लगाई थी. जन्मदिन का केक सामने पड़ा था और तुम चाकू को हमलावर अंदाज में पकड़कर पोज देने में व्यस्त थीं. दिल बाग-बाग हो गया था कसम से. लगा था कि आपा के दस साल अभी कहीं नहीं गए.
टीवी पर तुम्हारा खूबसूरत चेहरा और बच्चे की किलकारी-सी आवाज खूब देखी और सुनी थी. तुम जब हंसती थीं तो दुधमुंहे बच्ची की तरह क्यूट लगती थीं. अब जब बॉलीवुड और धरतीवुड से बिना बताए 102 का रिकॉर्ड बनाकर सरक ली हो. तब मन कर रहा है कि तसल्ली से बैठकर तुम्हारी जिंदगी का एक-एक पाठ पढ़कर पी जाऊं. तु्म्हारी जिंदादिली को बार-बार सलाम करूं. झुर्रियों वाले चेहरे के साथ फ्लर्ट करने की हिम्मत के लिए तुम्हारी तारीफ में कसीदे पढ़ूं.
अच्छा सुनो आपा, ऊपर जा रही हो. वहां ज्यादा थकावट नहीं होती होगी न. कोई काम नहीं होता है न. तो वो जो तुम करियर की शुरुआत में डांस का जादू बिखेरा करती थीं न, उसे वहां फिर शुरू करना प्लीज. अपनी नटखट हरकतों और 'कातिल' एक्सप्रेशन्स को बनाए रखना. बाकी इश्क तो लड़ाते ही रहना. मौका लगे तो कोई सस्ता टिकाऊ ईमानदार बुढ़ऊ सांवरिया भी ढूंढ लेना. हम जरा कुछ सावन तुम्हारे नक्शे कदम पर चलते हुए बिता लें. फिर आते हैं वहीं, तुम्हारे पास. दिल और जुबान पर 'चीनी कम' नहीं, ज्यादा लिए हुए. जाओ, जन्नत वालों को जिंदादिली सिखाओ आपा. विद सारे-जहां का लव.'ओल्ड वुमन' कहकर छेड़ूंगा तो मेरी शामत आ जाएगी. सुनो, अब ऊपर जा रही हो तो बदल न जाना. तुम्हारी वो नटखट लड़कियों वाली हरकतें थीं न फिल्मों वाली, उन्हें जारी रखना. अब चली गई हो तो बताए देता हूं कि मैंने तुम्हारा कोई नाटक या एक्टिंग का नायाब नमूना नहीं देखा, लेकिन फिल्में खूब देखीं.
तुम्हें देखता था तो लगता था कि हर औरत को ऐसा ही होना चाहिए. 'चीनी कम' में तुमने अमिताभ की जो टांग खिचाई की थी. आहा. ऐसा लगा था कि अमिताभ को हमने छेड़ा हो और हम ही महानायक के मजे लेकर खिलखिला दिए हों. इस जीवंत भरोसे से ही तुम ही किसी को डांट सकती थीं. तुम्हारे गालों पर जो नूर झुर्रियों से होते हुए टपकता है, दावे से कह सकता हूं कि आज भी तमाम दिलफेंक बुढ़ऊ उस पर अपनी बची-खुची जान छिड़कते होंगे. धुंधली सी एक याद है. बताऊं क्या. तब मैंने 'दिल से' फिल्म देखी थी. फिल्म देखने के बाद जब अपनी दादी से मिला तो बोला कि ऐ दादी तुम भी फिल्मों में बूढ़ी हीरोइन बन जाओ न. तो दादी ने प्यार से पागल कहकर हल्की सी चपत लगा दी. अभी दो साल पहले जब तुमने सावन की सेंचुरी लगाई थी. जन्मदिन का केक सामने पड़ा था और तुम चाकू को हमलावर अंदाज में पकड़कर पोज देने में व्यस्त थीं. दिल बाग-बाग हो गया था कसम से. लगा था कि आपा के दस साल अभी कहीं नहीं गए. टीवी पर तुम्हारा खूबसूरत चेहरा और बच्चे की किलकारी-सी आवाज खूब देखी और सुनी थी. तुम जब हंसती थीं तो दुधमुंहे बच्ची की तरह क्यूट लगती थीं.
अब जब बॉलीवुड और धरतीवुड से बिना बताए 102 का रिकॉर्ड बनाकर सरक ली हो. तब मन कर रहा है कि तसल्ली से बैठकर तुम्हारी जिंदगी का एक-एक पाठ पढ़कर पी जाऊं. तु्म्हारी जिंदादिली को बार-बार सलाम करूं. झुर्रियों वाले चेहरे के साथ फ्लर्ट करने की हिम्मत के लिए तुम्हारी तारीफ में कसीदे पढ़ूं. अच्छा सुनो आपा, ऊपर जा रही हो. वहां ज्यादा थकावट नहीं होती होगी न. कोई काम नहीं होता है न. तो वो जो तुम करियर की शुरुआत में डांस का जादू बिखेरा करती थीं न, उसे वहां फिर शुरू करना प्लीज. अपनी नटखट हरकतों और 'कातिल' एक्सप्रेशन्स को बनाए रखना. बाकी इश्क तो लड़ाते ही रहना. मौका लगे तो कोई सस्ता टिकाऊ ईमानदार बुढ़ऊ सांवरिया भी ढूंढ लेना. हम जरा कुछ सावन तुम्हारे नक्शे कदम पर चलते हुए बिता लें. फिर आते हैं वहीं, तुम्हारे पास. दिल और जुबान पर 'चीनी कम' नहीं, ज्यादा लिए हुए. जाओ, जन्नत वालों को जिंदादिली सिखाओ आपा. विद सारे-जहां का लव. •
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एक घर की मांग 
भारतीय सिनेमा की सबसे बुजुर्ग अभिनेत्री जोहरा सहगल दक्षिणी दिल्ली के मंदाकिनी एवक्लेव में बेटी किरण सहगल के साथ रह रही थीं। उन्होंने 2011 में दिल्ली सरकार को पत्र लिखकर एक घर देने की मांग की थी।
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करियर की शुरुआत एक डांसर के रूप में
जोहरा ने अपने करियर की शुरुआत एक डांसर और डांस निर्देशक के रूप में शुरू की थी। जोहरा थिएटर को अपना पहला प्यार मानती थी। वहीं से उन्होंने अभियन की कई बारिकियां सीखीं। जोहरा ने पृथ्वीराज कपूर के पृथ्वी थिएटर में करीब 14 साल तक काम किया।
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पृथ्वीराज कपूर से लेकर रणबीर कपूर तक 
जोहरा ने पृथ्वीराज कपूर से लेकर रणबीर कपूर तक, बॉलीवुड के मशहूर कपूर परिवार की चार पीढ़ियों के साथ काम किया था। जोहरा को विशेष रूप से 'भाजी ऑन द बीच' (1992), 'हम दिल दे चुके सनम' (1999), 'बेंड इट लाइक बेकहम' (2002), 'दिल से.'(1998) और 'चीनी कम' (2007) जैसी फिल्मों में बेहतरीन अभिनय के लिए जाना जाता है। उनकी आखिरी फिल्म 'चीनी कम' और 'सांवरिया' थी।
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पद्म विभूषण से सम्मानित 
जोहरा सहगल का जन्म 27 अप्रैल, 1912 को उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में हुआ था। देहरादून के पास चकराता में पली-बढ़ीं जोहरा को भारत सरकार ने वर्ष 1998 में पद्मश्री और वर्ष 2010 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया था।
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सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय मंच का अनुभव 
वह पहली ऐसी भारतीय हैं, जिसने सबसे पहले अंतर्राष्ट्रीय मंच का अनुभव किया। उन्होंने 1960 के दशक के मध्य में रूडयार्ड किपलिंग की 'द रेस्कयू ऑफ प्लूफ्लेस' में काम किया।
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टेलीविजन कार्यक्रमों में भी काम किया
वर्ष 1990 के दशक में लंदन से भारत लौटने से पहले जोहरा ने 'द ज्वेल इन द क्राउन', 'माय ब्यूटीफुल लाउंडेरेटे', 'तंदूरी नाइट्स' और 'नेवर से डाइ' जैसे टेलीविजन कार्यक्रमों में भी काम किया।
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वर्ष 1998 में पद्मश्री 
जोहरा सहगल को वर्ष 1998 में पद्मश्री, 2001 में कालिदास सम्मान, 2004 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया था।
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जिंदगी हसीन है, नजर उठा के तो देख
जी हां जिंदगी बेहद हसीन है बस जरूरत है इसे दिल से बिंदास होकर जीने की... यही फलसफा था  गुरूवार को दुनिया को अलविदा कहने वालीं 102 साल की प्रतिभाशाली अभिनेत्री जोहरा सहगल का। जोहरा ने यह अल्फाज पिछले साल अपने जन्मदिन के मौके पर लोगों के सामने कहे थे। जोहरा ने कहा था कि भले ही आज मैं 101 साल की हो गई हूं तो क्या.. मैं आज भी अपने जीवन के हर एक पल का लुत्फ उठा रही हूं। अपने जन्मदिन के मौके पर दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में केक काटती हुईं जोहरा की खुशी के अंदाज और ऊर्जा ने उस समय सबका दिल जीत लिया था। इस मौके पर उनकी बेटी किरण सहगल की लिखी किताब 'जोहरा सहगल फैटी' का विमोचन पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरण कौर ने किया था। किताब में उनके जीवन से जुड़ी खट्टी-मीठी यादों का जिक्र है। अभी तो मैं जवान हूँ: जोहरा सहगल अपने खुशमिजाज अंदाज के लिए मशहूर जोहरा ने वहां मौजूद सभी लोगों को अपनी बातों से खूब गुदगुदाया था। लोगों को एहसास दिलाया कि जिंदगी एक खूबसूरत किताब है, जिसे खुशी के साथ पढ़ना चाहिए। जोहरा ने अपने बीते दिनों को याद करते हुए बताया था कि पृथ्वीराज कपूर श्रेष्ठ कलाकार होने के साथ साथ एक अच्छे इंसान भी थे, जिन्हें अपने साथी कलाकारों का भी पूरा ख्याल रहता था। वह पहले डांसर बनीं, फिर कोरियोग्राफर और तब जाकर कहीं अभिनेत्री बनी।
साभार: वन इण्डिया

सोमवार, 13 जनवरी 2014

नमन

जस की तस धर दीनी चदरिया
नार्वी नहीं रहे ! 
नये साल के पहले महीने की दस तारीख़ को उनका शरीर शांत हो गया| एक दिन पहले ही फोन पर उनसे तबियत की जानकारी लेने के लिए बात हुई थी। वो काफी दिनों से बीमार चल रहे थे, पर पस्त नहीं थे, हारे हुए नहीं थे। लगातार पढ़ने-लिखने, राजनीतिक घटनाक्रमों पर चर्चा में हिस्सा ले रहे थे। 
नार्वी से मेरा परिचय 1981 में दैनिक विकासशील भारत की शुरुआत के समय हुआ था। वह उस हरावल दस्ते के सक्रिय सदस्य थे, जिसने एक नए और साधनहीन अखबार को कुछ ही महीनों में पाठकों का प्रिय और भरोसेमंद बना दिया था। इस जुझारू और समर्पित टोली में वह अनिल शुक्ल, योगेन्द्र दुबे, राजीव सक्सेना, सुभाष रावत, ईश्वर दयाल, हेमंत लवानिया, आदि गुणी पत्रकारों के साथ काम करते थे। नार्वी का संवेदना से सीधा नाता था। मुझे याद नहीं पड़ता, कभी उन्होंने किसी की भावनाओं को चोट पहुंचाई हो ? उनके पास संपादकीय और रविवायरीय पृष्ठों का जिम्मा था। वह अपना काम डूबकर करते और दफ्तरों की टुच्ची राजनीति या चकल्लस से दूर रहते। अपने काम और दायित्व के प्रति हमेशा समर्पित रहते थे |
नार्वी हृदय की बड़ी और क्षुद्र इच्छाओं-तृष्णाओं से ऊपर रहे। उन्होंने अवांछनीय या अनुचित चाह कभी नहीं की। न धन, न पद । विनम्रता और निराभिमानता उनके स्वाभाविक गुण थे। उन्होंने उतने ही पैर पसारे, जितनी बड़ी चादर उनके पास रही। नार्वी ने मानवीय संवेदनाओं में डूबकर कई कहानियां लिखीं। उनकी कुछ गज़लें बहुत ही भावपूर्ण और अर्थपूर्ण हैं। उनकी कहानियों और गज़लों को प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सम्मानपूर्ण स्थान भी मिला।
नार्वी अचानक हमारे बीच से चले गए और बिलकुल इसी तरह कि : झीनी-झीनी बीनी चदरिया... जस की तस धर दीनी चदरिया। मेरा नमन ।
- हर्षदेव
https://www.facebook.com/harsh.deo1

रविवार, 29 दिसंबर 2013

अरविन्द केजरीवाल

कैसे और क्‍यों ‘बनाया’ अमेरिका ने अरविंद केजरीवाल को

संदीप देव, नयी दिल्‍ली
प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और उनके ‘पंजीकृत आम आदमी’  ने जब देखा कि ‘भारत माता’ के अपमान व कश्मीर को भारत से अलग करने जैसे वक्तव्य पर ‘मीडिया-बुद्धिजीवी समर्थन का खेल’ शुरू हो चुका है तो उन्होंने अपनी ईमानदारी की चाशनी में कांग्रेस के छद्म सेक्यूलरवाद को मिला लिया। उनके बयान देखिए, प्रशांत भूषण ने कहा, ‘इस देश में हिंदू आतंकवाद चरम पर है’, तो प्रशांत के सुर में सुर मिलाते हुए अरविंद ने कहा कि ‘बाटला हाउस एनकाउंटर फर्जी था और उसमें मारे गए मुस्लिम युवा निर्दोष थे।’ इससे दो कदम आगे बढ़ते हुए अरविंद केजरीवाल उत्तरप्रदेश के बरेली में दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके तौकीर रजा और जामा मस्जिद के मौलाना इमाम बुखारी से मिलकर समर्थन देने की मांग की।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली एनजीओ गिरोह ‘राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी)’ ने घोर सांप्रदायिक ‘सांप्रदायिक और लक्ष्य केंद्रित हिंसा निवारण अधिनियम’ का ड्राफ्ट तैयार किया है। एनएसी की एक प्रमुख सदस्य अरुणा राय के साथ मिलकर अरविंद केजरीवाल ने सरकारी नौकरी में रहते हुए एनजीओ की कार्यप्रणाली समझी और फिर ‘परिवर्तन’ नामक एनजीओ से जुड़ गए। अरविंद लंबे अरसे तक राजस्व विभाग से छुटटी लेकर भी सरकारी तनख्वाह ले रहे थे और एनजीओ से भी वेतन उठा रहे थे, जो ‘श्रीमान ईमानदार’ को कानूनन भ्रष्‍टाचारी की श्रेणी में रखता है। वर्ष 2006 में ‘परिवर्तन’ में काम करने के दौरान ही उन्हें अमेरिकी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ ने 'उभरते नेतृत्व' के लिए ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार दिया, जबकि उस वक्त तक अरविंद ने ऐसा कोई काम नहीं किया था, जिसे उभरते हुए नेतृत्व का प्रतीक माना जा सके।  इसके बाद अरविंद अपने पुराने सहयोगी मनीष सिसोदिया के एनजीओ ‘कबीर’ से जुड़ गए, जिसका गठन इन दोनों ने मिलकर वर्ष 2005 में किया था।
अरविंद को समझने से पहले ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को समझ लीजिए!
अमेरिकी नीतियों को पूरी दुनिया में लागू कराने के लिए अमेरिकी खुफिया ब्यूरो  ‘सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए)’ अमेरिका की मशहूर कार निर्माता कंपनी ‘फोर्ड’ द्वारा संचालित ‘फोर्ड फाउंडेशन’ एवं कई अन्य फंडिंग एजेंसी के साथ मिलकर काम करती रही है। 1953 में फिलिपिंस की पूरी राजनीति व चुनाव को सीआईए ने अपने कब्जे में ले लिया था। भारतीय अरविंद केजरीवाल की ही तरह सीआईए ने उस वक्त फिलिपिंस में ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ को खड़ा किया था और उन्हें फिलिपिंस का राष्ट्रपति बनवा दिया था। अरविंद केजरीवाल की ही तरह ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ का भी पूर्व का कोई राजनैतिक इतिहास नहीं था। ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के जरिए फिलिपिंस की राजनीति को पूरी तरह से अपने कब्जे में करने के लिए अमेरिका ने उस जमाने में प्रचार के जरिए उनका राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय ‘छवि निर्माण’ से लेकर उन्हें ‘नॉसियोनालिस्टा पार्टी’ का  उम्मीदवार बनाने और चुनाव जिताने के लिए करीब 5 मिलियन डॉलर खर्च किया था। तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन डॉउल्स की निगरानी में इस पूरी योजना को उस समय के सीआईए अधिकारी ‘एडवर्ड लैंडस्ले’ ने अंजाम दिया था। इसकी पुष्टि 1972 में एडवर्ड लैंडस्ले द्वारा दिए गए एक साक्षात्कार में हुई।
ठीक अरविंद केजरीवाल की ही तरह रेमॉन मेग्सेसाय की ईमानदार छवि को गढ़ा गया और ‘डर्टी ट्रिक्स’ के जरिए विरोधी नेता और फिलिपिंस के तत्कालीन राष्ट्रपति ‘क्वायरिनो’ की छवि धूमिल की गई। यह प्रचारित किया गया कि क्वायरिनो भाषण देने से पहले अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए ड्रग का उपयोग करते हैं। रेमॉन मेग्सेसाय की ‘गढ़ी गई ईमानदार छवि’ और क्वायरिनो की ‘कुप्रचारित पतित छवि’ ने रेमॉन मेग्सेसाय को दो तिहाई बहुमत से जीत दिला दी और अमेरिका अपने मकसद में कामयाब रहा था। भारत में इस समय अरविंद केजरीवाल बनाम अन्य राजनीतिज्ञों की बीच अंतर दर्शाने के लिए छवि गढ़ने का जो प्रचारित खेल चल रहा है वह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए द्वारा अपनाए गए तरीके और प्रचार से बहुत कुछ मेल खाता है।
उन्हीं ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ के नाम पर एशिया में अमेरिकी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने वालों, वॉलेंटियर तैयार करने वालों, अपने देश की नीतियों को अमेरिकी हित में प्रभावित करने वालों, भ्रष्‍टाचार के नाम पर देश की चुनी हुई सरकारों को अस्थिर करने वालों को ‘फोर्ड फाउंडेशन’ व ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ मिलकर अप्रैल 1957 से ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ अवार्ड प्रदान कर रही है। ‘आम आदमी पार्टी’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनके साथी व ‘आम आदमी पार्टी’ के विधायक मनीष सिसोदिया को भी वही ‘रेमॉन मेग्सेसाय’ पुरस्कार मिला है और सीआईए के लिए फंडिंग करने वाली उसी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड से उनका एनजीओ ‘कबीर’ और ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ मूवमेंट खड़ा हुआ है।
भारत में राजनैतिक अस्थिरता के लिए एनजीओ और मीडिया में विदेशी फंडिंग
‘फोर्ड फाउंडेशन’ के एक अधिकारी स्टीवन सॉलनिक के मुताबिक ‘‘कबीर को फोर्ड फाउंडेशन की ओर से वर्ष 2005 में 1 लाख 72 हजार डॉलर एवं वर्ष 2008 में 1 लाख 97 हजार अमेरिकी डॉलर का फंड दिया गया।’’ यही नहीं, ‘कबीर’ को ‘डच दूतावास’ से भी मोटी रकम फंड के रूप में मिली। अमेरिका के साथ मिलकर नीदरलैंड भी अपने दूतावासों के जरिए दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में अमेरिकी-यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ाने के लिए वहां की गैर सरकारी संस्थाओं यानी एनजीओ को जबरदस्त फंडिंग करती है।
अंग्रेजी अखबार ‘पॉयनियर’ में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक डच यानी नीदरलैंड दूतावास अपनी ही एक एनजीओ ‘हिवोस’ के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करने में लगे विभिन्‍न भारतीय एनजीओ को अप्रैल 2008 से 2012 के बीच लगभग 13 लाख यूरो, मतलब करीब सवा नौ करोड़ रुपए की फंडिंग कर चुकी है।  इसमें एक अरविंद केजरीवाल का एनजीओ भी शामिल है। ‘हिवोस’ को फोर्ड फाउंडेशन भी फंडिंग करती है।
डच एनजीओ ‘हिवोस’  दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में केवल उन्हीं एनजीओ को फंडिंग करती है,जो अपने देश व वहां के राज्यों में अमेरिका व यूरोप के हित में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की क्षमता को साबित करते हैं।  इसके लिए मीडिया हाउस को भी जबरदस्त फंडिंग की जाती है। एशियाई देशों की मीडिया को फंडिंग करने के लिए अमेरिका व यूरोपीय देशों ने ‘पनोस’ नामक संस्था का गठन कर रखा है। दक्षिण एशिया में इस समय ‘पनोस’ के करीब आधा दर्जन कार्यालय काम कर रहे हैं। 'पनोस' में भी फोर्ड फाउंडेशन का पैसा आता है। माना जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल के मीडिया उभार के पीछे इसी ‘पनोस' के जरिए 'फोर्ड फाउंडेशन' की फंडिंग काम कर रही है। ‘सीएनएन-आईबीएन’ व ‘आईबीएन-7’ चैनल के प्रधान संपादक राजदीप सरदेसाई ‘पॉपुलेशन काउंसिल’ नामक संस्था के सदस्य हैं, जिसकी फंडिंग अमेरिका की वही ‘रॉकफेलर ब्रदर्स’ करती है जो ‘रेमॉन मेग्सेसाय’  पुरस्कार के लिए ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के साथ मिलकर फंडिंग करती है।
माना जा रहा है कि ‘पनोस’ और ‘रॉकफेलर ब्रदर्स फंड’ की फंडिंग का ही यह कमाल है कि राजदीप सरदेसाई का अंग्रेजी चैनल ‘सीएनएन-आईबीएन’ व हिंदी चैनल ‘आईबीएन-7’ न केवल अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ने’ में सबसे आगे रहे हैं, बल्कि 21 दिसंबर 2013 को ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार भी उसे प्रदान किया है। ‘इंडियन ऑफ द ईयर’ के पुरस्कार की प्रयोजक कंपनी ‘जीएमआर’ भ्रष्‍टाचार में में घिरी है।
‘जीएमआर’ के स्वामित्व वाली ‘डायल’ कंपनी ने देश की राजधानी दिल्ली में इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा विकसित करने के लिए यूपीए सरकार से महज 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन हासिल किया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ‘सीएजी’  ने 17 अगस्त 2012 को संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीएमआर को सस्ते दर पर दी गई जमीन के कारण सरकारी खजाने को 1 लाख 63 हजार करोड़ रुपए का चूना लगा है। इतना ही नहीं, रिश्वत देकर अवैध तरीके से ठेका हासिल करने के कारण ही मालदीव सरकार ने अपने देश में निर्मित हो रहे माले हवाई अड्डा का ठेका जीएमआर से छीन लिया था। सिंगापुर की अदालत ने जीएमआर कंपनी को भ्रष्‍टाचार में शामिल होने का दोषी करार दिया था। तात्पर्य यह है कि अमेरिकी-यूरोपीय फंड, भारतीय मीडिया और यहां यूपीए सरकार के साथ घोटाले में साझीदार कारपोरेट कंपनियों ने मिलकर अरविंद केजरीवाल को ‘गढ़ा’ है, जिसका मकसद आगे पढ़ने पर आपको पता चलेगा।
‘जनलोकपाल आंदोलन’ से ‘आम आदमी पार्टी’ तक का शातिर सफर
आरोप है कि विदेशी पुरस्कार और फंडिंग हासिल करने के बाद अमेरिकी हित में अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया ने इस देश को अस्थिर करने के लिए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का नारा देते हुए वर्ष 2011 में ‘जनलोकपाल आंदोलन’ की रूप रेखा खिंची।  इसके लिए सबसे पहले बाबा रामदेव का उपयोग किया गया, लेकिन रामदेव इन सभी की मंशाओं को थोड़ा-थोड़ा समझ गए थे। स्वामी रामदेव के मना करने पर उनके मंच का उपयोग करते हुए महाराष्ट्र के सीधे-साधे, लेकिन भ्रष्‍टाचार के विरुद्ध कई मुहीम में सफलता हासिल करने वाले अन्ना हजारे को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली से उत्तर भारत में ‘लॉंच’ कर दिया।  अन्ना हजारे को अरिवंद केजरीवाल की मंशा समझने में काफी वक्त लगा, लेकिन तब तक जनलोकपाल आंदोलन के बहाने अरविंद ‘कांग्रेस पार्टी व विदेशी फंडेड मीडिया’ के जरिए देश में प्रमुख चेहरा बन चुके थे। जनलोकपाल आंदोलन के दौरान जो मीडिया अन्ना-अन्ना की गाथा गा रही थी, ‘आम आदमी पार्टी’ के गठन के बाद वही मीडिया अन्ना को असफल साबित करने और अरविंद केजरीवाल के महिमा मंडन में जुट गई।
विदेशी फंडिंग तो अंदरूनी जानकारी है, लेकिन उस दौर से लेकर आज तक अरविंद केजरीवाल को प्रमोट करने वाली हर मीडिया संस्थान और पत्रकारों के चेहरे को गौर से देखिए। इनमें से अधिकांश वो हैं, जो कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के द्वारा अंजाम दिए गए 1 लाख 76 हजार करोड़ के 2जी स्पेक्ट्रम, 1 लाख 86 हजार करोड़ के कोल ब्लॉक आवंटन, 70 हजार करोड़ के कॉमनवेल्थ गेम्स और 'कैश फॉर वोट' घोटाले में समान रूप से भागीदार हैं।
आगे बढ़ते हैं...! अन्ना जब अरविंद और मनीष सिसोदिया के पीछे की विदेशी फंडिंग और उनकी छुपी हुई मंशा से परिचित हुए तो वह अलग हो गए, लेकिन इसी अन्ना के कंधे पर पैर रखकर अरविंद अपनी ‘आम आदमी पार्टी’ खड़ा करने में सफल  रहे।  जनलोकपाल आंदोलन के पीछे ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के फंड  को लेकर जब सवाल उठने लगा तो अरविंद-मनीष के आग्रह व न्यूयॉर्क स्थित अपने मुख्यालय के आदेश पर फोर्ड फाउंडेशन ने अपनी वेबसाइट से ‘कबीर’ व उसकी फंडिंग का पूरा ब्यौरा ही हटा दिया।  लेकिन उससे पहले अन्ना आंदोलन के दौरान 31 अगस्त 2011 में ही फोर्ड के प्रतिनिधि स्टीवेन सॉलनिक ने ‘बिजनस स्टैंडर’ अखबार में एक साक्षात्कार दिया था, जिसमें यह कबूल किया था कि फोर्ड फाउंडेशन ने ‘कबीर’ को दो बार में 3 लाख 69 हजार डॉलर की फंडिंग की है। स्टीवेन सॉलनिक के इस साक्षात्कार के कारण यह मामला पूरी तरह से दबने से बच गया और अरविंद का चेहरा कम संख्या में ही सही, लेकिन लोगों के सामने आ गया।
सूचना के मुताबिक अमेरिका की एक अन्य संस्था ‘आवाज’ की ओर से भी अरविंद केजरीवाल को जनलोकपाल आंदोलन के लिए फंड उपलब्ध कराया गया था और इसी ‘आवाज’ ने दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए भी अरविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ को फंड उपलब्ध कराया। सीरिया, इजिप्ट, लीबिया आदि देश में सरकार को अस्थिर करने के लिए अमेरिका की इसी ‘आवाज’ संस्था ने वहां के एनजीओ, ट्रस्ट व बुद्धिजीवियों को जमकर फंडिंग की थी। इससे इस विवाद को बल मिलता है कि अमेरिका के हित में हर देश की पॉलिसी को प्रभावित करने के लिए अमेरिकी संस्था जिस ‘फंडिंग का खेल’ खेल खेलती आई हैं, भारत में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और ‘आम आदमी पार्टी’ उसी की देन हैं।
सुप्रीम कोर्ट के वकील एम.एल.शर्मा ने अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया के एनजीओ व उनकी ‘आम आदमी पार्टी’ में चुनावी चंदे के रूप में आए विदेशी फंडिंग की पूरी जांच के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल कर रखी है। अदालत ने इसकी जांच का निर्देश दे रखा है, लेकिन केंद्रीय गृहमंत्रालय इसकी जांच कराने के प्रति उदासीनता बरत रही है, जो केंद्र सरकार को संदेह के दायरे में खड़ा करता है। वकील एम.एल.शर्मा कहते हैं कि ‘फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट-2010’ के मुताबिक विदेशी धन पाने के लिए भारत सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है। यही नहीं, उस राशि को खर्च करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना भी जरूरी है। कोई भी विदेशी देश चुनावी चंदे या फंड के जरिए भारत की संप्रभुता व राजनैतिक गतिविधियों को प्रभावित नहीं कर सके, इसलिए यह कानूनी प्रावधान किया गया था, लेकिन अरविंद केजरीवाल व उनकी टीम ने इसका पूरी तरह से उल्लंघन किया है। बाबा रामदेव के खिलाफ एक ही दिन में 80 से अधिक मुकदमे दर्ज करने वाली कांग्रेस सरकार की उदासीनता दर्शाती है कि अरविंद केजरीवाल को वह अपने राजनैतिक फायदे के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
अमेरिकी ‘कल्चरल कोल्ड वार’ के हथियार हैं अरविंद केजरीवाल
फंडिंग के जरिए पूरी दुनिया में राजनैतिक अस्थिरता पैदा करने की अमेरिका व उसकी खुफिया एजेंसी ‘सीआईए’ की नीति को ‘कल्चरल कोल्ड वार’ का नाम दिया गया है। इसमें किसी देश की राजनीति, संस्कृति  व उसके लोकतंत्र को अपने वित्त व पुरस्कार पोषित समूह, एनजीओ, ट्रस्ट, सरकार में बैठे जनप्रतिनिधि, मीडिया और वामपंथी बुद्धिजीवियों के जरिए पूरी तरह से प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। अरविंद केजरीवाल ने ‘सेक्यूलरिज्म’ के नाम पर इसकी पहली झलक अन्ना के मंच से ‘भारत माता’ की तस्वीर को हटाकर दे दिया था। चूंकि इस देश में भारत माता के अपमान को ‘सेक्यूलरिज्म का फैशनेबल बुर्का’ समझा जाता है, इसलिए वामपंथी बुद्धिजीवी व मीडिया बिरादरी इसे अरविंद केजरीवाल की धर्मनिरपेक्षता साबित करने में सफल रही।
एक बार जो धर्मनिरपेक्षता का गंदा खेल शुरू हुआ तो फिर चल निकला और ‘आम आदमी पार्टी’ के नेता प्रशांत भूषण ने तत्काल कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का सुझाव दे दिया। प्रशांत भूषण यहीं नहीं रुके, उन्होंने संसद हमले के मुख्य दोषी अफजल गुरु की फांसी का विरोध करते हुए यह तक कह दिया कि इससे भारत का असली चेहरा उजागर हो गया है। जैसे वह खुद भारत नहीं, बल्कि किसी दूसरे देश के नागरिक हों?
प्रशांत भूषण लगातार भारत विरोधी बयान देते चले गए और मीडिया व वामपंथी बुद्धिजीवी उनकी आम आदमी पार्टी को ‘क्रांतिकारी सेक्यूलर दल’ के रूप में प्रचारित करने लगी।  प्रशांत भूषण को हौसला मिला और उन्होंने केंद्र सरकार से कश्मीर में लागू एएफएसपीए कानून को हटाने की मांग करते हुए कह दिया कि सेना ने कश्मीरियों को इस कानून के जरिए दबा रखा है। इसके उलट हमारी सेना यह कह चुकी है कि यदि इस कानून को हटाया जाता है तो अलगाववादी कश्मीर में हावी हो जाएंगे।
अमेरिका का हित इसमें है कि कश्मीर अस्थिर रहे या पूरी तरह से पाकिस्तान के पाले में चला जाए ताकि अमेरिका यहां अपना सैन्य व निगरानी केंद्र स्थापित कर सके।  यहां से दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण-पूर्वी एशिया व चीन पर नजर रखने में उसे आसानी होगी।  आम आदमी पार्टी के नेता  प्रशांत भूषण अपनी झूठी मानवाधिकारवादी छवि व वकालत के जरिए इसकी कोशिश पहले से ही करते रहे हैं और अब जब उनकी ‘अपनी राजनैतिक पार्टी’ हो गई है तो वह इसे राजनैतिक रूप से अंजाम देने में जुटे हैं। यह एक तरह से ‘लिटमस टेस्ट’ था, जिसके जरिए आम आदमी पार्टी ‘ईमानदारी’ और ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का ‘कॉकटेल’ तैयार कर रही थी।
8 दिसंबर 2013 को दिल्ली की 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीतने के बाद अपनी सरकार बनाने के लिए अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा आम जनता को अधिकार देने के नाम पर जनमत संग्रह का जो नाटक खेला गया, वह काफी हद तक इस ‘कॉकटेल’ का ही परीक्षण  है। सवाल उठने लगा है कि यदि देश में आम आदमी पार्टी की सरकार बन जाए और वह कश्मीर में जनमत संग्रह कराते हुए उसे पाकिस्तान के पक्ष में बता दे तो फिर क्या होगा?
आखिर जनमत संग्रह के नाम पर उनके ‘एसएमएस कैंपेन’ की पारदर्शिता ही कितनी है? अन्ना हजारे भी एसएमएस  कार्ड के नाम पर अरविंद केजरीवाल व उनकी पार्टी द्वारा की गई धोखाधड़ी का मामला उठा चुके हैं। दिल्ली के पटियाला हाउस अदालत में अन्ना व अरविंद को पक्षकार बनाते हुए एसएमएस  कार्ड के नाम पर 100 करोड़ के घोटाले का एक मुकदमा दर्ज है। इस पर अन्ना ने कहा, ‘‘मैं इससे दुखी हूं, क्योंकि मेरे नाम पर अरविंद के द्वारा किए गए इस कार्य का कुछ भी पता नहीं है और मुझे अदालत में घसीट दिया गया है, जो मेरे लिए बेहद शर्म की बात है।’’
प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और उनके ‘पंजीकृत आम आदमी’  ने जब देखा कि ‘भारत माता’ के अपमान व कश्मीर को भारत से अलग करने जैसे वक्तव्य पर ‘मीडिया-बुद्धिजीवी समर्थन का खेल’ शुरू हो चुका है तो उन्होंने अपनी ईमानदारी की चाशनी में कांग्रेस के छद्म सेक्यूलरवाद को मिला लिया। उनके बयान देखिए, प्रशांत भूषण ने कहा, ‘इस देश में हिंदू आतंकवाद चरम पर है’, तो प्रशांत के सुर में सुर मिलाते हुए अरविंद ने कहा कि ‘बाटला हाउस एनकाउंटर फर्जी था और उसमें मारे गए मुस्लिम युवा निर्दोष थे।’ इससे दो कदम आगे बढ़ते हुए अरविंद केजरीवाल उत्तरप्रदेश के बरेली में दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार हो चुके तौकीर रजा और जामा मस्जिद के मौलाना इमाम बुखारी से मिलकर समर्थन देने की मांग की।
याद रखिए, यही इमाम बुखरी हैं, जो खुले आम दिल्ली पुलिस को चुनौती देते हुए कह चुके हैं कि ‘हां, मैं पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का एजेंट हूं, यदि हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार करके दिखाओ।’ उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, अदालत ने उन्हें भगोड़ा घोषित कर रखा है लेकिन दिल्ली पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं है कि वह जामा मस्जिद जाकर उन्हें गिरफ्तार कर सके।  वहीं तौकीर रजा का पुराना सांप्रदायिक इतिहास है। वह समय-समय पर कांग्रेस और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के पक्ष में मुसलमानों के लिए फतवा जारी करते रहे हैं। इतना ही नहीं, वह मशहूर बंग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की हत्या करने वालों को ईनाम देने जैसा घोर अमानवीय फतवा भी जारी कर चुके हैं।
नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए फेंका गया ‘आखिरी पत्ता’ हैं अरविंद
दरअसल विदेश में अमेरिका, सउदी अरब व पाकिस्तान और भारत में कांग्रेस व क्षेत्रीय पाटियों की पूरी कोशिश नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को रोकने की है। मोदी न अमेरिका के हित में हैं, न सउदी अरब व पाकिस्तान के हित में और न ही कांग्रेस पार्टी व धर्मनिरेपक्षता का ढोंग करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों के हित में।  मोदी के आते ही अमेरिका की एशिया केंद्रित पूरी विदेश, आर्थिक व रक्षा नीति तो प्रभावित होगी ही, देश के अंदर लूट मचाने में दशकों से जुटी हुई पार्टियों व नेताओं के लिए भी जेल यात्रा का माहौल बन जाएगा। इसलिए उसी भ्रष्‍टाचार को रोकने के नाम पर जनता का भावनात्मक दोहन करते हुए ईमानदारी की स्वनिर्मित धरातल पर ‘आम आदमी पार्टी’ का निर्माण कराया गया है।
दिल्ली में भ्रष्‍टाचार और कुशासन में फंसी कांग्रेस की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की 15 वर्षीय सत्ता के विरोध में उत्पन्न लहर को भाजपा के पास सीधे जाने से रोककर और फिर उसी कांग्रेस पार्टी के सहयोग से ‘आम आदमी पार्टी’ की सरकार बनाने का ड्रामा रचकर अरविंद केजरीवाल ने भाजपा को रोकने की अपनी क्षमता को दर्शा दिया है। अरविंद केजरीवाल द्वारा सरकार बनाने की हामी भरते ही केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, ‘‘भाजपा के पास 32 सीटें थी, लेकिन वो बहुमत के लिए 4 सीटों का जुगाड़ नहीं कर पाई। हमारे पास केवल 8 सीटें थीं, लेकिन हमने 28 सीटों का जुगाड़ कर लिया और सरकार भी बना ली।’’
कपिल सिब्बल का यह बयान भाजपा को रोकने के लिए अरविंद केजरीवाल और उनकी ‘आम आदमी पार्टी’ को खड़ा करने में कांग्रेस की छुपी हुई भूमिका को उजागर कर देता है। वैसे भी अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित एनजीओ के लिए साथ काम कर चुके हैं। तभी तो दिसंबर-2011 में अन्ना आंदोलन को समाप्त कराने की जिम्मेवारी यूपीए सरकार ने संदीप दीक्षित को सौंपी थी। ‘फोर्ड फाउंडेशन’ ने अरविंद व मनीष सिसोदिया के एनजीओ को 3 लाख 69 हजार डॉलर तो संदीप दीक्षित के एनजीओ को 6 लाख 50 हजार डॉलर का फंड उपलब्ध कराया है। शुरू-शुरू में अरविंद केजरीवाल को कुछ मीडिया हाउस ने शीला-संदीप का ‘ब्रेन चाइल्ड’ बताया भी था, लेकिन यूपीए सरकार का इशारा पाते ही इस पूरे मामले पर खामोशी अख्तियार कर ली गई।
‘आम आदमी पार्टी’ व  उसके नेता अरविंद केजरीवाल की पूरी मंशा को इस पार्टी के संस्थापक सदस्य व प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण ने ‘मेल टुडे’ अखबार में लिखे अपने एक लेख में जाहिर भी कर दिया था, लेकिन बाद में प्रशांत-अरविंद के दबाव के कारण उन्होंने अपने ही लेख से पल्ला झाड़ लिया और ‘मेल टुडे’ अखबार के खिलाफ मुकदमा कर दिया। ‘मेल टुडे’ से जुड़े सूत्र बताते हैं कि यूपीए सरकार के एक मंत्री के फोन पर ‘टुडे ग्रुप’ ने भी इसे झूठ कहने में समय नहीं लगाया, लेकिन तब तक इस लेख के जरिए नरेंद्र मोदी को रोकने लिए ‘कांग्रेस-केजरी’ गठबंधन की समूची साजिश का पर्दाफाश हो गया। यह अलग बात है कि कम प्रसार संख्या और अंग्रेजी में होने के कारण ‘मेल टुडे’ के लेख से बड़ी संख्या में देश की जनता अवगत नहीं हो सकी, इसलिए उस लेख के प्रमुख हिस्से को मैं यहां जस का तस रख रहा हूं, जिसमें नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए गठित ‘आम आदमी पार्टी’ की असलियत का पूरा ब्यौरा है।
शांति भूषण ने इंडिया टुडे समूह के अंग्रेजी अखबार ‘मेल टुडे’ में लिखा था, ‘‘अरविंद केजरीवाल ने बड़ी ही चतुराई से भ्रष्‍टाचार के मुद्दे पर भाजपा को भी निशाने पर ले लिया और उसे कांग्रेस के समान बता डाला।  वहीं खुद वह सेक्यूलरिज्म के नाम पर मुस्लिम नेताओं से मिले ताकि उन मुसलमानों को अपने पक्ष में कर सकें जो बीजेपी का विरोध तो करते हैं, लेकिन कांग्रेस से उकता गए हैं।  केजरीवाल और आम आदमी पार्टी उस अन्ना हजारे के आंदोलन की देन हैं जो कांग्रेस के करप्शन और मनमोहन सरकार की कारगुजारियों के खिलाफ शुरू हुआ था। लेकिन बाद में अरविंद केजरीवाल की मदद से इस पूरे आंदोलन ने अपना रुख मोड़कर बीजेपी की तरफ कर दिया, जिससे जनता कंफ्यूज हो गई और आंदोलन की धार कुंद पड़ गई।’’
‘‘आंदोलन के फ्लॉप होने के बाद भी केजरीवाल ने हार नहीं मानी। जिस राजनीति का वह कड़ा विरोध करते रहे थे, उन्होंने उसी राजनीति में आने का फैसला लिया। अन्ना इससे सहमत नहीं हुए । अन्ना की असहमति केजरीवाल की महत्वाकांक्षाओं की राह में रोड़ा बन गई थी। इसलिए केजरीवाल ने अन्ना को दरकिनार करते हुए ‘आम आदमी पार्टी’ के नाम से पार्टी बना ली और इसे दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के खिलाफ खड़ा कर दिया।  केजरीवाल ने जानबूझ कर शरारतपूर्ण ढंग से नितिन गडकरी के भ्रष्‍टाचार की बात उठाई और उन्हें कांग्रेस के भ्रष्‍ट नेताओं की कतार में खड़ा कर दिया ताकि खुद को ईमानदार व सेक्यूलर दिखा सकें।  एक खास वर्ग को तुष्ट करने के लिए बीजेपी का नाम खराब किया गया। वर्ना बीजेपी तो सत्ता के आसपास भी नहीं थी, ऐसे में उसके भ्रष्‍टाचार का सवाल कहां पैदा होता है?’’
‘‘बीजेपी ‘आम आदमी पार्टी’ को नजरअंदाज करती रही और इसका केजरीवाल ने खूब फायदा उठाया। भले ही बाहर से वह कांग्रेस के खिलाफ थे, लेकिन अंदर से चुपचाप भाजपा के खिलाफ जुटे हुए थे। केजरीवाल ने लोगों की भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए इसका पूरा फायदा दिल्ली की चुनाव में उठाया और भ्रष्‍टाचार का आरोप बड़ी ही चालाकी से कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा पर भी मढ़ दिया।  ऐसा उन्होंने अल्पसंख्यक वोट बटोरने के लिए किया।’’
‘‘दिल्ली की कामयाबी के बाद अब अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति में आने जा रहे हैं। वह सिर्फ भ्रष्‍टाचार की बात कर रहे हैं, लेकिन गवर्नेंस का मतलब सिर्फ भ्रष्‍टाचार का खात्मा करना ही नहीं होता। कांग्रेस की कारगुजारियों की वजह से भ्रष्‍टाचार के अलावा भी कई सारी समस्याएं उठ खड़ी हुई हैं। खराब अर्थव्यवस्था, बढ़ती कीमतें, पड़ोसी देशों से रिश्ते और अंदरूनी लॉ एंड ऑर्डर समेत कई चुनौतियां हैं। इन सभी चुनौतियों को बिना वक्त गंवाए निबटाना होगा।’’
‘‘मनमोहन सरकार की नाकामी देश के लिए मुश्किल बन गई है। नरेंद्र मोदी इसलिए लोगों की आवाज बन रहे हैं, क्योंकि उन्होंने इन समस्याओं से जूझने और देश का सम्मान वापस लाने का विश्वास लोगों में जगाया है। मगर केजरीवाल गवर्नेंस के व्यापक अर्थ से अनभिज्ञ हैं। केजरीवाल की प्राथमिकता देश की राजनीति को अस्थिर करना और नरेंद्र मोदी को सत्ता में आने से रोकना है।  ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर मोदी एक बार सत्ता में आ गए तो केजरीवाल की दुकान हमेशा के लिए बंद हो जाएगी।’’
सौजन्य लिन्क- आधी आबादी

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

मुस्कान

जय मुस्कान!
मेरे कार्टूनिस्ट और कार्टूनप्रेमी मित्रो,मेरा विचार है कि अच्छे कार्टूनों का हिन्दी में एक टेब्लॉइड पीडीएफ़ अखबार निकाला जाए। इस अखबार में कार्टून की अधिकता हो और टाइप की हुई सामग्री न्यूनतम हो यानी आम अखबारों के उलट। यों अभी अखबारों ने कार्टून कला की ओर से मुंह फ़ेर लिया है। कार्टून फ़ोकट की चीज़ बनकर रह गये हैं जो कार्टूनिस्टों के द्वारा इण्टरनेट पर सहज उपलब्ध करा दिये जाते हैं।
इस कार्टून प्रधान अखबार को अभी या बाद में अखबारी कागज़ पर छापा जाए- साधन होने पर। अभी इस अखबार को पीडीएफ़ के रूप में देस-विदेश में ई-मेल द्वारा सदस्यों को भेजा जाए। ज़ाहिर है इसके लिए अच्छे कार्टूनों की आवश्यकता होगी ही। रोना वही कि फ़िलहाल मेहनताना नहीं दिया जा सकता। इसके लिए सक्षम होने का प्रयास किया जाएगा, शुरूआत तो हो! सामग्री में विविधता होगी. यह पक्का है। आप लोगों की सहमति हो तो एक अंक बनाया जाए। पर इसके लिए कुछ कार्टूनिस्ट मित्रों के ५ (छपे/बिन छपे) कार्टून/कार्टून स्ट्रिप/कैरीकेचर/फ़ीचर, सचित्र (फ़ोटो सहित) आत्म परिचय वगैरह चाहिए ही चाहिए।
कार्यक्रम तय होने पर व्यवस्था हेतु दक्षिणा १०१ (101) या ९९ (99) रुपये रुचि रखने वाले कार्टून प्रेमी यह मामूली सहयोग देंगे तो गाड़ी चल पड़ेगी। इस कार्य में प्रायोजक या विज्ञापन दाता का सहयोग सन्देहात्मक है। वैसे यदि आपके सम्पर्क में कार्टून प्रेमी प्रायोजक या विज्ञापन दाता हैं तो उनको इस पावन कार्य में पुण्य कमाने का न्यौता हैं। 
उल्लेखनीय है कि मेरा यह प्रयास हम सभी या अधिकतम कार्टूनिस्टों का एक अच्छा मंच बनाने की दिशा में एक कदम है व्यवसाय या धन्धा नहीं।
कुछ और जानना-पूछना चाहें तो बिना संकोच सम्पर्क करें- फ़ेसबुक के माध्यम से या cartoonistchander@gmail.com
(यहां मेरे हिन्दी पाक्षिक ‘मीडिया नेटवर्क’ के एक पुराने अंक के २ पृष्ठ दिये गये हैं, देखें)
लिन्क- http://www.medianetworkweb.blogspot.in/
• सभी कार्टूनिस्टों का स्वागत है।                                                 
कार्टूनिस्ट मित्रों का उत्साह मुझे उत्साहित कर देता है। अनेक मित्रों के विचार (आइडिया) अच्छे-बहुत अच्छे हैं पर वे चित्रण (ड्रॉइंग) के मामले में मात खा जाते हैं। कार्टून का अर्थ टेढ़ी-मेढ़ी मनचाही रेखाएं खींचना नहीं है। यह कला का ही एक महत्वपूर्ण अंग है। अच्छा हो वे मित्र कला की कोई पुस्तक पढ़ें-देखें और खूब अभ्यास भी करें। बिना रेखांकन के अभ्यास के निपुणता नहीं आ सकती। वरिष्ठ कार्टूनिस्टों के बनाए छपे कार्टून ध्यान से देखें। आस-पास कोई चित्रकार-कार्टूनिस्ट हो तो सम्पर्क कर सहायता लें। मैं चाहता हूं कि सभी ‘कार्टूनिस्ट’ शानदार कार्टून बनाएं और आत्मसंतुष्टि के साथ-साथ सभी की प्रशंसा पाएं।
http://cartooninstitute.blogspot.in/
 

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

विपश्यना

विपश्यना की ध्यान-विधि
विश्‍व भर में विपश्यना शिविरों का संचालन स्वैच्छिक दान से होता है। किसी से कोई पैसा नही लिया जाता। शिविरों का पूरा खर्च उन साधकों के दान से चलता है जो पहले किसी शिविर से लाभान्वित होकर दान देकर बाद में आने वाले साधकों को लाभान्वित करना चाहते है। न तो आचार्य और न ही उनके सहायक आचार्य कोई पारिश्रमिक प्राप्‍त करते हैं। ये तथा शिविरों मे सेवा देने वाले पुराने साधक अपना समय देने के लिए स्वतः आगे आते हैं। यह परिपाटी उस शुद्ध परम्परा से मेल खाती है जिसमे यह शिक्षा बिना किसी वाणिज्यिक आधार के, मुक्त-हस्त से और क्रतज्ञता तथा दान की भावना से ओतप्रोत धनराशि के आधार पर बांटनी होती है।

धम्म कल्याण ध्यान केन्द्र
साधना
विपश्यना की ध्यान-विधि एक ऐसा सरल एवं कारगर उपाय है जिससे मन को वास्तविक शांति प्राप्‍त होती है और एक सुखी उपयोगी जीवन बिताना सम्भव हो जाता है। विपश्यना का अभिप्राय है कि जो वस्तु सचमुच जैसी हो, उसे उसी प्रकार जान लेना। आत्म-निरीक्षण द्वारा मन को निर्मल करते-करते ऐसा होने ही लगता है। हम अपने अनुभव से जानते हैं कि हमारा मानस कभी विचलित हो जाता है, कभी हताश, कभी असन्तुलित। इस कारणवश जब हम व्यथित हो उठते है तब अपनी व्यथा अपने तक सीमित नहीं रखते, दूसरो को बांटने लगते हैं। निश्चय ही इसे सार्थक जीवन नही कह सकते। हम सब चाहते हैं कि हम स्वयं भी सुख-शांति का जीवन जिएं और दूसरों को भी ऐसा जीवन जीने दें, पर ऐसा कर नहीं पाते। अतः प्रश्‍न यही रह जाता है कि हम कैसे संतुलित जीवन बिताएं?
विपश्यना हमें इस योग्य बनाती है कि हम अपने भीतर शांति और सामंजस्य का अनुभव कर सकें। यह चित्त को निर्मल बनाती है। यह चित्त की व्याकुलता और इसके कारणों को दूर करती जाती है। यदि कोई इसका अभ्यास करता रहे तो कदम-कदम आगे बढ़ता हुआ अपने मानस को विकारों से पूरी तरह मुक्त करके नितान्त विमुक्त अवस्था का साक्षात्कार कर सकता है।
ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि
विपश्यना भारत की एक अत्यन्त पुरातन ध्यान-विधि है। इसे आज से लगभग 2,500 वर्ष पूर्व भगवान गौतम बुद्ध ने पुनः खोज निकाला था। उन्होने अपने शासन के पैंतालीस वर्षों मे जो अभ्यास स्वयं किया और लोगों को करवाया- यह उसका सार है। बुद्ध के समय में बड़ी संख्या में उत्तरी भारत के लोग विपश्यना के अभ्यास से अपने-अपने दुःखो से मुक्त हुए और जीवन के सभी क्षेत्रों मे उँची उपलब्धियां प्राप्त कर पाए। समय के साथ-साथ यह ध्यान विधि भारत के पड़ौसी देशों-बर्मा, श्रीलंका, थाईलैण्ड आदि मे फैल गयी और वहां पर भी इसके ऐसे ही कल्याणकारी परिणाम सामने आए। बुद्ध के परिनिर्वाण के लगभग पांच सौ वर्ष बाद विपश्यना की कल्याणकारी विधि भारत से लुप्‍त हो गई। दूसरे देशों में भी इस विधि की शुद्धता नष्ट हो गयी | केवल बर्मा मे इस विधि के प्रति समर्पित आचार्यों की एक कड़ी के कारण यह अपने शुद्ध रूप में कायम रह पायी। पिछले दो हज़ार वर्षों मे वहां के निष्ठावान आचार्यों की परम्परा ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस ध्यान-विधि को अपने अक्षुण्ण रूप मे बनाए रखा। इसी परम्परा के प्रख्यात आचार्य सयाजी ऊ बा खिन ने लोगों को विपश्यना सिखलाने के लिए सन् 1969 मे श्री सत्यनारायण गोयन्का को अधिकृत किया था।
सत्य नारायण गोयन्का

हमारे समय के कल्याणमित्र भी सत्यनारायण गोयन्का के प्रयत्नो से केवल भारत के ही नहीं, बल्कि 80 से भी अधिक अन्य देशों के लोगों को भी फिर से विपश्यना का लाभ मिलने लगा है। सन् 1971 मे अपने प्राण छोड़ने से पूर्व सयाजी अपने स्वप्न को साकार होता देख पाए। उनकी प्रबल इच्छा थी कि विपश्यना अपनी मातृभूमि भारत मे लौटे और लोगों को अपनी अनेकानेक समस्याओं को सुलझाने में सहायता करे। उन्हें विश्वास था कि यह भारत से विश्‍व भर मे फैल जाएगी और जन-जन का कल्याण करने लगेगी।
श्री गोयन्का जी ने भारत मे जुलाई 1969 से विपश्यना शिविर लगाने आरम्भ किए। दस वर्ष बाद उन्होंने विदेशों में भी इसका प्रशिक्षण देना आरम्भ कर दिया। पिछले 23 वर्षों में उन्होंने 350 से भी अधिक दस-दिवसीय विपश्यना शिविरों का संचालन किया और 120 से अधिक सहायक आचार्यों को इस योग्य बनाया कि वे विश्‍व भर में 1,200 से अधिक शिविर ले पाए हैं। इसके अतिरिक्त विपश्यना के अभ्यास के लिए 135 केन्द्र स्थापित हो चुके हैं जिनमें से 70 भारत में और शेष 65 अन्य देशों में हैं। विपश्यना का अनमोल रत्न, जो चिरकाल तक बर्मा जैसे छोटे से देश मे सुरक्षित रहा, अब इसका पूरे संसार मे अनेक स्थानों पर लाभ उठाया जा रहा है। आज तो उन लोगों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है जिनको स्थायी रूप से सुख-शांति प्रदान करने वाली इस जीवन जीने की कला को सीखने का अवसर मिल रहा है।
पुरातन काल मे भारत को जगद्रुरु कहलाए जाने का सौभाग्य प्राप्‍त था | हमारे काल मे सत्य की गंगा भारत से एक बार फिर प्यासे जगत की ओर प्रवाहित होने लगी है।
अभ्यास
ध्यान केन्द्र के हॉल का भीतरी दृश्य
विपश्यना सीखने के लिए यह आवश्यक है कि किसी योग्यता-प्राप्‍त आचार्य के सान्निध्य में एक दस-दिवसीय आवासीय शिविर में भाग लिया जाये।
शिविर के दौरान साधकों को शिविर-स्थल पर ही रहना होता है और बाहर की दुनिया से सम्पर्क तोड़ना होता है। उन्हें पढ़ाई-लिखाई से विरत रहना होता है और निजी धार्मिक अनुष्ठानों तथा क्रियाकलापों को स्थगित रखना होता है। उन्हें एक ऐसी दिनचर्या में से गुज़रना पड़ता है, जिसमे दिन मे कई बार, कुल मिलाकर लगभग दस घंटे तक बैठे-बैठे ध्यान करना होता हैं। उन्हें मौन का भी पालन करना होता है, अर्थात अन्य साधकों से बातचीत नही कर सकते। परन्तु अपने आचार्य के साथ साधना-सम्बन्धी प्रश्नों और व्यवस्थापकों के साथ भौतिक समस्याओं के बारे मे आवश्यकतानुसार बातचीत कर सकते हैं।
प्रशिक्षण के तीन सोपान होते हैं। पहला सोपान- साधक उन कार्यों से दूर रहे जिनसे उनकी हानि होती हो। इसके लिए वे पांच शील पालन करने का व्रत लेते है, अर्थात जीव-हिंसा, चोरी, झूठ बोलना, अब्रह्मचर्य तथा नशे-पत्ते के सेवन से विरत रहना। इन शीलों का पालन करने से मन इतना शांत हो जाता है कि आगे का काम करना सरल हो जाता है। दूसरा सोपान-पहले साढ़े तीन दिनों तक अपनी सांस पर ध्यान केन्द्रित कर 'आनापान' नाम की साधना का अभ्यास करना होता है। इससे बन्दर जैसे मन को नियन्त्रित करना सरल हो जाता है।
शुद्ध जीवन जीना और मन को नियन्त्रित करना- ये दो सोपान आवश्यक हैं और लाभकारी भी। परन्तु यदि तीसरा न हो तो यह शिक्षा अधूरी रह जाती है। तीसरा सोपान है- अंतर्मन की गहराइयों में दबे हुए विकारो को दूर कर मन को निर्मल बना लेना। यह तीसरा सोपान शिविर मे पिछले साढ़े छ: दिनो तक विपश्यना के अभ्यास के रूप मे होता है। इसके अन्तर्गत साधक अपनी प्रज्ञा जगाकर अपने समूचे कायिक तथा चैतसिक स्कंधों का भेदन कर पाता है। साधकों को दिन मे कई बार साधना- सम्बन्धी निर्देश दिए जाते हैं और प्रितिदिन की प्रगति श्री गोयन्काजी की वाणी में टेप पर सायंकालीन प्रवचन के रूप मे जतलाई जाती है। पहले नौ दिन पूर्ण मौन का पालन करना होता है। दसवें दिन साधक बोलना शुरू कर देते हैं जिससे कि वे फिर बहिर्मुखी हो जाते हैं। शिविर ग्यारहवें दिन प्रातःकाल सामाप्त हो जाता है। शिविर का समापन मंगल-मैत्री के साथ किया जाता है, जिसमें शिविर-काल में अर्जित पुण्य का भागीदार सभी प्राणियों को बनाया जाता है।
शिविर
विभिन्न देशों में विपश्यना शिविर नियमित रूप से स्थाई केन्द्रों पर अथवा अन्य स्थानों पर लगाए जाते हैं। सामान्य दस-दिवसीय शिविरों का आयोजन तो होता ही रहता है, परन्तु साधना में आगे बढ़े हुए साधकों के लिए भी समय-समय पर विशिष्ट शिविर और 20, 30, तथा 45 दिन के दीर्ध शिविर लगाए जाते हैं। भारत में बच्चो के लिए आनापान के लघु शिविर नियमित रूप से लगाए जाते हैं जो विपश्यना की भूमिका का काम देते हैं। ये शिविर एक से तीन दिन तक चलते है और 8 से 11 तथा 12 से 15 वर्ष तक की आयु वाले बच्चों के लिए होते हैं।
विश्‍व भर में शिविरों का संचालन स्वैच्छिक दान से होता है। किसी से कोई पैसा नही लिया जाता। शिविरों का पूरा खर्च उन साधकों के दान से चलता है जो पहले किसी शिविर से लाभान्वित होकर दान देकर बाद में आने वाले साधकों को लाभान्वित करना चाहते है। न तो आचार्य और न ही उनके सहायक आचार्य कोई पारिश्रमिक प्राप्‍त करते हैं। ये तथा शिविरों मे सेवा देने वाले पुराने साधक अपना समय देने के लिए स्वतः आगे आते हैं। यह परिपाटी उस शुद्ध परम्परा से मेल खाती है जिसमे यह शिक्षा बिना किसी वाणिज्यिक आधार के, मुक्त-हस्त से और क्रतज्ञता तथा दान की भावना से ओतप्रोत धनराशि के आधार पर बांटनी होती है।
साम्प्रदायिकता-विहीन विधि
चाहे विपश्यना बौद्ध परम्परा में सुरक्षित रही है, फिर भी इसमे कोई साम्प्रदायिक तत्व नही है और किसी भी प्रष्‍ठभूमि वाला व्यक्ति इसे अपना सकता है और उसका उपयोग कर सकता है। बुद्ध ने स्वम "धर्म" सिखाया जिसका तात्पर्य है- मार्ग अथवा सच्चाई। उन्होंने अपने अनुयायियों को 'बौद्ध' नही कहा। वे उन्हे धार्मिक (अर्थात, सच्चाई पर चलने वाले) कहा करते थे। इस साधना-विधि का आधार यह है कि सभी मनुष्यों की समस्याएं एक जैसी है और इन समस्याओं को दूर करने मे सक्षम यह एक ऐसा उपाय है, जिसे हर कोई काम में ले सकता है।
विपश्यना के शिविर ऐसे व्यक्ति के लिए खुले हैं जो ईमानदारी के साथ इस विधि को सीखना चाहे। इसमें कुल, जाति धर्म अथवा राष्‍ट्रीयता आड़े नही आती। हिन्दू, जैन, मुस्लिम, सिक्ख, बौद्ध, ईसाई, यहूदी तथा अन्य सम्प्रदाय वालों ने बड़ी सफलतापूर्वक विपश्यना का अभ्यास किया है। चूंकि रोग सार्वजनीन है, अतः इसका इलाज भी सार्वजनीन ही होना चाहिए। उदाहरणतया जब हम क्रुद्ध होते है तब वह क्रोध - 'हिंदू क्रोध' अथवा 'ईसाई क्रोध' अथवा 'चीनी क्रोध अथवा 'अमरीकन क्रोध' नही होता। इसी प्रकार प्रेम तथा करूणा भी किसी समुदाय अथवा पंथविशेष की बपौती नही है। मन की शुद्धता से प्रस्फुटित होने वाले ये सार्वजनीय मानवीय गुण है। सभी पृष्‍ठभूमियों के विपश्यी साधक जल्दी ही यह अनुभव करने लगते हैं कि उनके व्यक्तित्व में निखार आ रहा है ।
आज का परिवेश
परिवहन, संचार, कृषि तथा चिकित्सा आदि के क्षेत्रों में विज्ञान तथा तकनीक ने जो प्रगति की है उससे भौतिक स्तर पर मानव-जीवन में भारी परिवर्तन आया है। परन्तु यह प्रगति एक छलावा है। वस्तुस्थिति तो यह है कि विकसित तथा सम्रद्ध देशों में भी भीतर-ही-भीतर आज के नर-नारी विकट मानसिक एव भावनात्मक तनावों में से गुजर रहे हैं।
जातीयता, व्यक्तिवाद, भाई-भतीजाबाद और जात-पांत को अत्यधिक महत्व देने से पैदा हुई समस्याओं तथा अन्य वाद-विवादों से इस देश के नागरिक प्रभावित हुए हैं। गरीबी, लड़ाई, नर-संहार के आयुध, रोग, नशीली दवाओं के शिकंजे, आतंकवाद की भयानकता, महामारी के रूप में बढ़ता हुआ पर्यावरण-प्रदूषण और नैतिक मूल्यों का गिरता हुआ स्तर-ये सभी सभ्यता के भविष्य पर कालिख पोत रहे है। हमारे उपग्रह के निवासी कैसी मर्मान्‍तक पीड़ाओ और गंभीर निराशा के दौर में से गुज़र रहे है, इसे जानने के लिए किसी भी दैनिक समाचार पत्र के मुख पृष्ठ पर नज़र दौड़ाना ही पर्याप्‍त है।
ऊपर-ऊपर से लगता है कि इन समस्याओं का समाधान नहीं है। पर क्या सचमुच ऐसा है ? इसका साफ-साफ उत्‍तर है-नहीं। आज सारे विश्‍व में परिवर्तन की हवा का चलना साफ ज़ाहिर है। सब जगह लोग इस बात के लिए आतुर है कि कोई ऐसा उपाय हाथ लगे जिससे शांति और सामंजस्य वापस आएं, मनुष्य के सादगुणों की सार्थकता में फिर से विश्वास जमे और सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा आर्थिक सभी प्रकार के उत्पीड़नो से मुक्ति मिले और सुरक्षा का वातावरण पैदा हो। विपश्यना एक ऐसा उपाय हो सकता है।
विपश्यना तथा सामाजिक परिवर्तन
विपश्यना की ध्यान विधि एक ऐसा रास्ता है जो सभी दुःखों से छुटकारा दिलाता है। इससे राग, द्वेष और मोह दूर होते है और यही हमारे दुःखो का कारण हैं। जो कोई इनका अभ्यास करते रहते हैं, वे थोड़ा-थोड़ा करके अपने दुःखो का कारण दूर करते रहते हैं और बड़ी दृढता के साथ अपने मानसिक तनावों की जकड़न से बाहर निकल कर सुखी, स्वस्थ और सार्थक जीवन जीने लगते हैं। इस तथ्य की पुष्टि अनेक उदाहरणों से होती है। 
भारत में जेलों में भी प्रयोग किए गये हैं। सन् 1975 में श्री गोयन्का ने केन्द्रीय कारागार, जयपुर में 120 बंदियों का ऐतिहासिक शिविर लिया था। भारत की दंड-व्यवस्था के इतिहास में ऐसा प्रयोग पहली बार हुआ। इसके बाद सन् 1976 में राजस्थान पुलिस अकादमी, जयपुर में पुलिस विभाग के अधिकारियों के लिए शिविर का आयोजन किया गया। सन् 1977 में केन्द्रीय कारागार, जयपुर में दूसरा शिविर लगा। इन शिविरों को आधार बना कर राजस्थान विश्‍व-विद्यालय ने कई प्रकार के समाजशास्त्रीय अध्ययन किए। सन् 1990 में केन्द्रीय कारागार, जयपुर में एक अन्य शिविर लगा जिसमें उम्र-क़ैद भुगत रहे 40 बंदियों और 10 जेल अधिकारियों ने भाग लिया। इसमें भी बहुत अच्छे परिणाम सामने आए। सन् 1991 में साबरमती केन्द्रीय कारागार, अहमदाबाद में भी उम्र-कैदियों के लिए शिविर लगाया गया और इसे गुजरात विद्यापीठ के शिक्षा विभाग ने अनुसंधान का विषय बनाया। ऐसे ही 1992 में बड़ोदा के केन्द्रीय कारागार में शिविर लगा जिसके परिणाम को देख कर शीघ्र ही दूसरा शिविर लगाने की माँग हुई। राजस्थान तथा गुजरात में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि शिविरार्थियों के द्रष्टिकोण तथा व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन आया है। इससे यह संकेत मिलता है कि विपश्यना सकारात्क सुधार लाने का एक ऐसा उपाय है जिससे अपराधी भी समाज के अच्छे सदस्य बन सकते है। श्री गोयन्का जी को विपश्यना सिखलाने वाले आचार्य सयाजी ऊ बा खिन का स्वयं का सरकारी सेवाकाल इस बात का प्रमाण है कि सरकारी तन्त्र पर इस ध्यान-विधि से कैसे सुधार आने लगता है। सयाजी अनेक सरकारी विभागों के अध्यक्ष थे। अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को विपश्यना साधना सिखला कर वे उनमें कर्तव्य-निष्‍ठा, अनुशासन तथा नैतिकता का और अधिक विकास करने में सफल हुए। इसके परिणामस्वरूप कार्यक्षमता में आभूतपूर्व व्रद्धि हुई और भ्रष्‍टाचार समाप्त हुआ। इसी प्रकार राजस्थान सरकार के ग्रह विभाग में महत्वपूर्ण पदों पर काम करने वाले कुछ अधिकारियों के विपश्यना शिविरों में भाग लेने से निर्णय लेने और काम निपटाने की गति में तेज़ी आई और कर्मचारियों के आपसी सम्बन्ध भी सुधरे।
विपश्यना विशोधन विन्यास ने स्वास्थ्य, शिक्षा, मादक पदार्थों का सेवन तथा संस्थानों की प्रबन्ध-व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में विपश्यना के गुणात्मक प्रभाव के बारे में अन्य उदाहरणों का भी संकलन किया है।
ये प्रयोग इस बात को उजागर करते है कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए पहले व्यक्ति को पकड़ना चाहिए, याने प्रत्येक व्यक्ति को सुधरना चाहिए। केवल उपदेशों से सामाजिक परिवर्तन नही लाया जा सकता। छात्रों में भी अनुशासन तथा सदाचार केवल किताबी व्याख्यानों से नहीं ढाला जा सकता। केवल दंड के भय से अपराधी अच्छे नागरिक नहीं बन सकते और न ही दण्डात्मक मानदंड अपना कर साम्प्रदायिक फूट को दूर किया जा सकता है। ऐसे प्रयतनों की विफलता से इतिहास भरा पड़ा है।
'व्यक्ति' ही कुंजी है। उसके साथ वात्सल्य एवं करुणा का बर्ताव किया जाना चाहिए। उसे अपने आपको सुधारने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। शील सदाचार के नियमों का पालन करवाने के लिए उसे उपदेश नही, बल्कि उसके भीतर अपने आप में परिवर्तन लाने की सच्ची ललक जगानी चाहिए। उसे सिखलाना चाहिए कि अपनी खोज-बीन कैसे की जाती है, ताकि एक ऐसी प्रक्रिया हाथ लग जाए, जिससे परिवर्तन का क्रम शुरू होकर चित्त निर्मल हो सके। इस प्रकार लाया हुआ परिवर्तन ही चिरस्थायी हो सकता है|
विपश्यना में लोगों के मानस और चरित्र को बदलने की क्षमता है।
• सौजन्य- लिन्क: धम्म कल्याण

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