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शुक्रवार, 21 मई 2010

प्रशंसा

ठीक नहीं प्रशंसा में कंजूसी
प्रशंसा के अनेक दूरगामी परिणाम भी प्राप्त होते हैं। अपने आसपास थोड़ा ध्यान दें तो हम पाते हैं कि अनेक लोग पूरी निष्ठा, ईमानदारी, बहादुरी, कुशलता, सूझबूझ, कल्पनाशीलता, रचनात्मकता आदि के साथ सोंपा गया कार्य कर रहे हैं। परन्तु प्रायः उनकी प्रशंसा नहीं की जाती। हां, यदि काम करते समय यदि कोई छोटी-सी भूल हो जाए तो दसके लिए तुरन्त टोक दिया जाता है या अन्य हल्की या कठोर प्रतिक्रिया सामने आ जाती है।
मनोवैज्ञानिक और शिक्षाविद मानते हैं कि सच्ची प्रशंसा, उचित सम्मान और प्रोत्साहन हमारी नयी पीढ़ी के लिए ही नहीं अन्य लोगों के लिए भी प्रगति तथा हित की दृष्टि से उपयोगी है। अध्यापक, अभिभावक, नियोक्ता आदि भी इस बात से अनभिज्ञ नहीं हैं। प्रशंसा और प्रोत्साहन के अभाव ने अनगिनत प्रतिभाओं को कुंठित किया है। प्रशंसा करते समय उचित सावधानी और अपने विवेक का उपयोग करना औरों के लिए हितकर होगा। अपने किसी स्वार्थ के लिए किसी व्यक्ति की झूठी प्रशंसा करना एक घटिया काम है। प्रशंसा वास्तविक और सच्ची होनी चाहिए।

हमारे घर-परिवार, विभिन्न कार्य स्थलों, विद्यालयों आदि यानी लगभग हर जगह प्रशंसा करने में बहुत ज्यादा कंजूसी बरती जाती है। यह अच्छी बात नहीं है। प्रशंसा करने में कुछ अतिरिक्त खर्च नहीं होता जबकि अनेक दृष्टियों से यह हमारे और औरों के लिए लाभदायक ही सिद्ध होती है। प्रसंशा के अनेक दूरगामी परिणाम भी प्राप्त होते हैं। अपने आसपास थोड़ा ध्यान दें तो हम पाते हैं कि अनेक लोग पूरी निष्ठा, ईमानदारी, बहादुरी, कुशलता, सूझबूझ, कल्पनाशीलता, रचनात्मकता आदि के साथ सोंपा गया कार्य कर रहे हैं। परन्तु प्रायः उनकी प्रशंसा नहीं की जाती। हां, काम करते समय उनसे यदि कोई छोटी-सी भूल हो जाए तो उसके लिए तुरन्त टोक दिया जाता है या अन्य हल्की या कठोर प्रतिक्रिया सामने आ जाती है। सम्भव है आपने भी एकाधिक बार ऐसी स्थितियों का सामना किया हो। वस्तुतः ऐसा करना ठीक नहीं है। अच्छे कार्य या व्यवहार के लिए प्रशंसा करनी ही चाहिए।



ऐसा भी होता है कि अनेक बार संघर्ष और प्रयास करने पर भी सफलता नहीं मिलती, ऐसे में सम्बन्धित व्यक्ति की यदि प्रशंसा न भी की जाए तो उसका उत्साह बढ़ाते हुए फिर प्रयास करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इतिहास ऐसे लोगों के कार्यों से भरा पड़ा है जिन्होंने जीवनभर खूब काम किया। उन्हें तब पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उनके मरने के बाद लोगों ने उनकी जमकर प्रशंसा की और उन्हें महान बना दिया। ऐसे अनेक वैज्ञानिक, संगीतकार, चित्रकार, गायक, कवि, लेखक आदि अपनी मृत्यु के उपरान्त ही प्रशंसा पा सके और विश्वप्रसिद्ध हुए। उनके कार्यों और उपलब्धियों को लोगों ने मुक्तकण्ठ से सराहा और उनकी सफलताओं से नयी पीढ़ी को प्ररित होने के लिए कहा। हमारे आसपास भी ऐसे प्रतिभावान युवाओं की कमी नहीं है जो बहुत कुछ करना चाहते है और वे सक्षम भी हैं। पर लोगों के द्वारा की गयी आलोचना, उपहास, ईर्ष्या आदि उनकी गति में बाधा बन जाते है।

जहां हम दूसरों की प्रशंसा करने और उन्हें प्रेरित करने में हिचकिचाते हैं वहीं उनकी निन्दा करने, टांग खींचने, आलोचना करने, कोसने, हतोत्साहित करने, टीकाटिप्पणी करने आदि में कभी पीछे नहीं रहते। इस काम के लिए प्रायः हमारे पास समय की कमी भी नहीं होती। हम किसी व्यक्ति के किसी कार्य या व्यवहार के बारे में नापसन्द होने पर जिस तत्परता से अप्रसन्नता के साथ प्रतिक्रिया देते हैं तो बड़ा ही स्पष्ट ढंग अपनाते हैं। सोचिए, उतनी ही तत्परता से हम सकारात्मक भूमिका निभाएं तो परिणाम निःसन्देह बेहद सुखद होंगे। हमें स्वयं अपने भीतर पश्चाताप की बजाय अनूठे सुख की अनुभूति होगी। सो मुसकराकर देखिए, औरों का समर्थन और प्रशंसा कीजिए और जीवन को और सुन्दर बनाइए। अपने मित्रों, सहयोगियों, सहकर्मियों सहित सभी की आवश्यकतानुसार उचित अवसर पर प्रशंसा कीजिए। क्या आप स्वयं यह जानना नहीं चाहते कि लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं? ठीक इसी प्रकार और लोग भी यह जानना चाहते हैं कि आप उनके बारे में क्या सोचते हैं? कोई व्यक्ति प्रशंसा के योग्य है तो उदार बनिए और सही समय पर उसकी प्रशंसा करने अब कंजूसी बरतना छोड़ ही दीजिए।

• टी.सी. चन्दर 

गुरुवार, 25 मार्च 2010

बदमाश कलाकार

हुसैन पर हाय-तौबा 
देवी-देवताओं की अश्लील पेंटिंगों को हुसैन की संकीर्ण सोच की उपज बता रहे हैं ए सूर्यप्रकाश

पहली पेंटिंग का शीर्षक दुर्गा है, जिसमें दुर्गा देवी को एक टाइगर के साथ रति क्रिया रत दिखाया गया है। रेस्क्यूइंग सीता पेंटिंग में नग्न सीता को हनुमान की पूंछ पकड़े चित्रित किया गया है। हनुमान की पूंछ शालीनता की तमाम सीमाओं को लांघते हुए एक लैंगिग प्रतीक के रूप में प्रस्तुत की गई है। भगवान विष्णु को आम तौर पर चार हाथों के साथ चित्रित किया जाता है, जिनमें शंख, पद्म, गदा और चक्र होते हैं। किंतु हुसैन की पेंटिंग में विष्णु के हाथ काट दिए गए हैं।

मकबूल फिदा हुसैन भारत में छद्म पंथनिरपेक्ष भीड़ के नायक रहे हैं। इसीलिए अंग्रेजी मीडिया का एक वर्ग उनके कतर देशांतर पर प्रलाप कर रहा है और हिंदुओं पर उनके पीछे पड़ने का आरोप मढ़ रहा है। कुछ टीवी एंकर हुसैन के भारत की नागरिकता छोड़ कर कतर की नागरिकता लेने पर चीत्कार मचा रहे हैं किंतु वे हुसैन की कलात्मक स्वच्छंदता की सच्चाई बताने के इच्छुक नहीं हैं। इसलिए अब समय है कि हुसैन के बारे में कुछ गरम पहलुओं से परदा उठाएं।

श्रीमान हुसैन को भारत से भागने के लिए किसने मजबूर किया? एंटी हिंदूज पुस्तक के लेखक प्रफुल गोर्दिया और केआर पांडा कुछ महत्वपूर्ण सुराग और इस सवाल का विस्तार से उत्तर देते हैं। इस पुस्तक में न केवल संस्कार भारती के डीपी सिन्हा की प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित की गई है, बल्कि हुसैन की बेहद घिनौनी पेंटिगों की तस्वीरें भी छपी हैं। असलियत में, यह प्रेस विज्ञप्ति चित्रकार के खिलाफ विस्तृत आरोपपत्र ही है क्योंकि इसमें पेंटिंगों को एक से बढ़कर एक भौंडी और निंदनीय बताया गया हैं। यहां इस संगठन द्वारा आठ सर्वाधिक आपत्तिजनक पेंटिंगों की सूची जारी की गई है।

पहली पेंटिंग का शीर्षक दुर्गा है, जिसमें दुर्गा देवी को एक टाइगर के साथ रति क्रिया रत दिखाया गया है। रेस्क्यूइंग सीता पेंटिंग में नग्न सीता को हनुमान की पूंछ पकड़े चित्रित किया गया है। हनुमान की पूंछ शालीनता की तमाम सीमाओं को लांघते हुए एक लैंगिग प्रतीक के रूप में प्रस्तुत की गई है। भगवान विष्णु को आम तौर पर चार हाथों के साथ चित्रित किया जाता है, जिनमें शंख, पद्म, गदा और चक्र होते हैं। किंतु हुसैन की पेंटिंग में विष्णु के हाथ काट दिए गए हैं। विकृत और थकेहारे विष्णु अपनी पत्नी लक्ष्मी और वाहन गरुड़ की ओर देख रहे हैं। भगवान विष्णु के हाथ-पैर काटना रचनात्मक स्वतंत्रता है या फिर हिंदू संवेदना का जानबूझ कर अपमान करना है? सरस्वती जिन्हें हिंदू एक देवी के रूप में पूजते हैं, श्वेत साड़ी में चित्रित की जाती हैं। इन्हें भी हुसैन ने अपनी पेंटिंग में नग्न दर्शाया है।

एक अन्य पेंटिंग में नग्न देवी लक्ष्मी देव गणेश के सिर पर सवार हैं। इस दृश्य से भी कामुकता झलकती है। हनुमान-4 शीर्षक से एक पेंटिंग में तीन मुख वाले हनुमान और एक नग्न युगल चित्रित किया गया है। महिला की पहचान संदेह से परे है। हनुमान का जननांग महिला की ओर दिखाया गया है। इसमें अश्लीलता बिल्कुल स्पष्ट झलकती है। हनुमान-13 शीर्षक वाली पेंटिंग में बिल्कुल नग्न सीता नग्न रावण की जांघ पर बैठी हैं और नग्न हनुमान उन पर वार कर रहे हैं। एक अन्य पेंटिंग जार्ज वाशिंगटन एंड अर्जुन आन द चैरियट में महाभारत के प्रसिद्ध गीता प्रसंग की पृष्ठभूमि में भगवान कृष्ण का स्थान वाशिंगटन ने ले लिया है क्योंकि भगवान कृष्ण की आंखों में कोई देवत्व नहीं है और उनकी अवमानना करते हुए उन्हें महज एक मानव जार्ज वाशिंगटन के रूप में पेश किया गया है।

क्या हुसैन का यह मूर्तिभंजन एकसमान है? ऐसा बिल्कुल नहीं है। बात जब गैर हिंदू विषयों की आती है तो हुसैन आदर और सम्मान के प्रतिमान स्थापित कर लेते हैं। वह पैगंबर मोहम्मद की बेटी फातिमा को पवित्रता और शिष्टता के साथ चित्रित किया है, जो कपड़े पहने हुए हैं। यहां चित्रकार कोई छूट नहीं लेता। वह तब भी कोई छूट नहीं लेता जब उनकी बेटी और माता का चित्रण करता है। हुसैन की मदर टैरेसा पेंटिंग कला का लाजवाब नमूना है, जिसमें मदर टैरेसा करुणा की प्रतिमूर्ति लगती हैं। अगर ऐसा है तो हुसैन ने हिंदू देवी-देवताओं को इस कदर घिनौने अंदाज में क्यों चित्रित किया? इसका जवाब एक और पेंटिंग में मिलता है। एक पेंटिंग में आइंस्टीन, गांधी, माओ और हिटलर चित्रित किए गए हैं, जिनमें से केवल हिटलर को नग्न दिखाया गया है। क्या हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जिन चरित्रों को हुसैन घिनौना मानते हैं उन्हें नग्न चित्रित करते हैं? इन निंदनीय कला कर्म को पुन‌र्प्रकाशित करने और संस्कार भारती की विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति जारी करने वाले प्रफुल गोर्दिया और केआर पांडा एमएफ हुसैन को विकृत कामवासना से ग्रस्त व्यक्ति बताते हैं। इन पेंटिंग के फोटोग्राफ मौलिक रूप से एक ऐसी पुस्तक में प्रकाशित हुए थे, जिसे खुद हुसैन ने डिजाइन किया था। लेखकों ने सिन्हा द्वारा पेश किए गए आठ उदाहरणों में अपनी तरफ से भी तीन जोड़े हैं। इनमें एक पेंटिंग में सांड को पार्वती से सहवास करते दिखाया गया है, जबकि शंकर उनकी तरफ देख रहे हैं। दूसरी में हनुमान के जननांग को एक औरत की ओर दर्शाया गया है और एक पेंटिंग में नग्न कृष्ण के हाथ-पैर कटे हुए दिखाए गए हैं।

लेखक नंग्नता, अश्लीलता और कामविकृति में भेद की तरफ ध्यान खींचते हैं। वे कहते हैं, जब अश्लीलता या कामविकृति के साथ देवी-देविताओं को चित्रित किया जाता है तो यह आस्था के साथ खिलवाड़ करने की श्रेणी में आता है। जैसाकि गोर्दिया और पांडा रेखांकित करते हैं, हुसैन को संदेह का लाभ देना बिल्कुल संभव नहीं है। आइंस्टीन, गांधी, माओ और हिटलर के चित्रण वाली पेंटिंग अकाट्स साक्ष्य है। पहले तीन के शरीर पर कपड़े हैं, जबकि हिटलर नग्न है। क्या इसका यह मतलब नहीं है कि जिनसे वह घृणा करते हैं, उन्हें नग्न चित्रित करते हैं? वे पूछते हैं, क्या हिंदू का सम्मान करने वाला कोई भी व्यक्ति हुसैन को माफ कर सकता है? इसका जवाब स्पष्ट तौर पर ना है। तो हुसैन की कला से प्रताडि़त किसी हिंदू को क्या करना चाहिए? कुछ ऐसे असभ्य लोगों को छोड़कर जिन्होंने कानून अपने हाथ में लेकर चित्रकार की कुछ पेंटिंग प्रदर्शनियों में तोड़फोड़ की, अधिकांश हिंदुओं की प्रतिक्रिया वही थी, जो एक लोकतंत्र में होनी चाहिए। उन्होंने अदालत की शरण ली और चित्रकार के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कराए। उन्होंने कानून का सहारा लिया जो नागरिकों को अन्य नागरिकों की पंथिक संवेदनाओं पर आघात करने से रोकता है। उन्हें जान से मारने की धमकी नहीं दी गई और इस तरह के भद्दी घोषणाएं नहीं की गई जैसी उत्तर प्रदेश में एक मुसलमान ने डेनमार्क के काटूर्निस्ट का सिर कलम करने वाले को 51 करोड़ रुपए देने की पेशकश के रूप में की थी, जिसने पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बनाया था।

अगर आप कुछ टीवी एंकरों के हावभाव पर गौर करें तो इस ईश-निंदा के घटिया तरीके पर हिंदुओं की लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया के लिए कोई सराहना नहीं की जानी चाहिए, बल्कि अदालत में खींचने के लिए इनकी भ‌र्त्सना की जानी चाहिए। हुसैन के मित्र और प्रशंसक जो भी कहें, सच्चाई यह है कि हिंदू भावनाओं के साथ इस प्रकार की घृणित खिलवाड़ के कारण वह कानूनी रूप से भगोड़ा घोषित हैं। जबसे उन पर मामले दर्ज किए गए हैं, वह फरार चल रहे हैं। बहुत से हिंदू जो हुसैन की इस घिनौनी कला से परिचित हैं, उन्हें कतरनाक पेंटर बताते हैं। इसलिए कहा जा रहा है कि उनके लिए कतर ही उनकी अंतिम मंजिल थी! किंतु अगर हम अपनी पंथनिरपेक्ष परंपरा को मान देते हैं तो हमें उन्हें बचकर भाग निकलने नहीं देना चाहिए। कानून की लंबी बांह को कतर तक जाना चाहिए। हमें उनका प्रत्यारोपण करके 80 करोड़ भावनाओं पर चोट पहुंचाने के लिए उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।
साभार:- दैनिक जागरण

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

पढ़ाई

लाभदायक है पढ़ने की आदत
प्रायः अधिकांश महिलाएं पढ़ने के मामले में यही शिकायत करती हैं कि क्या करें, पढ़ने के लिए समय ही नहीं मिलता! कुछ महिलाओं का कहना है कि रोज अखबार पढ़कर ही हमें आखिर हासिल क्या होना है? हमें कौन से कम्पटीशन में बैठना है या किसी परीक्षा की तैयारी करनी है! सुबह से शाम तक घर-बाहर के काम-काज में खटना है। जबकि घरेलू महिलाओं के लिए अखबार पढ़ना भी काफी उपयोगी सिद्ध होता है।



अनगिनत लोग ऐसे हें जिन्हें सुबह जल्दी अखबार पढ़ने को न मिले तो उनकी बेचैनी और परेशानी देखने योग्य होती है। तमाम टीवी समाचार चैनलों और इन्टरनेट के निरन्तर बढ़ते उपयोग के बावजूद दुनिया भर के छोटे-बड़े समाचारों से अवगत होना बहुत आसान हो गया है। परन्तु अखबार पढ़ने का अपना अलग आनन्द है। एक अलग शौक है। अपने आस-पास और देश-विदेश की खबरें, जानकारी, सूचना आदि जिस प्रकार एक अखबार से हमें मिलते हैं वैसे किसी अन्य माध्यम से नहीं मिल पाते। त्वरित व सीधे समाचार-विचार प्रसारण की दृष्टि से भले ही टीवी का अपना विशेष महत्व है पर वह अनेक दृष्टियों से अखबार की जगह नहीं ले सकता। अखबार पढ़ने का एक विशेष सुख होता है।

हमारे यहां पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अखबार पढ़ने के प्रति कम रुझान देखा जाता है। कमोवेश यही हाल हमारी नयी पीढ़ी का भी है। पढ़ने का अवसर मिलने पर वे फिल्म-टीवी, जीवन शैली या महिलाओं सम्बन्धी सामग्री पढ़ने का ही प्रमुखता देते हैं। महिलाओं का सुबह का समय काफी व्यस्तता भरा होता है। चाय, नाश्ता, खाना आदि बनाना, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, उसके बाद अन्य कामों के साथ-साथ दोपहर और शाम या रात के भोजन की तैयारी करना। जिन घरों में नौकरानी होती है या कामवाली आती है वहां कुछ सुविधा मिल जाती है। पर बचे हुए समय का सही उपयोग नहीं हो पाता है। रात का काफी समय पिछले कुछ वर्षों से सास-बहू या ऐसे ही अन्य टीवी धारावाहिकों की भैंट चढ़ जाता है। पढ़ने का समय ही कहां बचता है। फिर भी ऐसी अनेक महिलाएं हैं जो अपनी व्यस्त दिनचर्या में से भी पढ़ने का सुख पाने के लिए थोड़ा-बहुत समय अवश्य निकाल लेती हैं।

प्रायः अधिकांश महिलाएं पढ़ने के मामले में यही शिकायत करती हैं कि क्या करें, पढ़ने के लिए समय ही नहीं मिलता! कुछ महिलाओं का कहना है कि रोज अखबार पढ़कर ही हमें आखिर हासिल क्या होना है? हमें कौन से कम्पटीशन में बैठना है या किसी परीक्षा की तैयारी करनी है! सुबह से शाम तक घर-बाहर के काम-काज में खटना है। जबकि घरेलू महिलाओं के लिए अखबार पढ़ना भी काफी उपयोगी सिद्ध होता है। घरेलू महिलाओं को कामकाजी महिलाओं की अपेक्षा कहीं अधिक समय घर में ही गुजारना पड़ता है। बाकी दुनिया से उनका सम्बन्ध अखबार, पत्रिकाओं, टीवी, रेडियो आदि से ही जुड़ा रह सकता है। अपने आसपास की घटनाओं के साथ-साथ देश-विदेश की घटनाओं से अवगत होना हमें जागरूक और एक जिम्मेदार नागरिक बनाता है।

संयुक्त परिवारों के अभाव में घरेलू महिला आज पहले की अपेक्षा कम सुरक्षित हैं। ठग, उठाईगीर, चोर और अन्य असामाजिक तत्व या अपराधी आज पहले की अपेक्षा अधिक सक्रिय हैं। वे अपना उल्लू सीधा करने के लिए तरह-तरह की नयी-नयी तरकीबें आजमाते रहते हैं। लगभग रोज ही अखबारों में इस प्रकार की घटनाओं के समाचार संक्षेप में या विस्तार से उन असामाजिक तत्वों द्वारा अपनाए गये तरीकों की जानकारी के साथ छपते रहते हैं।

ऐसे समाचार घरेलू महिलाओं को जागरूक बनाने के साथ-साथ सावधान भी करते हैं। जरूरी नहीं कि कोई सारे काम छोड़कर सुबह-सुबह अखबार लेकर बैठ जाए। यदि ऐसा किया जाए तो पूरे परिवार की दिनचर्या ही बदल जाएगी और अनेक प्रकार की परेशानियां सामने आ खड़ी होंगी। सब अस्तव्यस्त हो जाएगा। अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाते हुए प्रतिदिन कुछ समय अखबार, पत्रिकाएं, अच्छी उपयोगी पुस्तकें पढ़ने निकालना एक अच्छी आदत बन सकती है। इसे अपनी दिनचर्या में मामूली फेरबदल करके असानी से हासिल किया जा सकता है।

यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि बहुत पढ़ लिए और अब पढ़ने में समय क्यों बरबाद करे। ज्यादा पढ़कर करना भी क्या है! अनेक महिलाएं अखबार-पत्रिकाओं में विशेष रूप से भविष्य फल, फैशन, फिल्म-टीवी, सौंदर्य, व्यंजन विधियां, कविता-कहानी आदि विविध सामग्री पढ़ने तक ही सीमित रहती हैं। एक अन्य आकर्षण होता है-सेल या डिस्काउंट के विज्ञापनों का। हालांकि यह भी ग्राहकों को मूर्ख बनाने के चालाकी भरे तरीके हैं। सामान्य ज्ञान, अपने आसपास की छोटी-बड़ी घटनाओं की जानकारी, देश-विदेश की खबरें, फीचर, लेख आदि के साथ-साथ अन्य सामयिक सामग्री की प्रायः अनदेखी की जाती है।

सामान्य ज्ञान के अभाव में प्रायः चार लोगों के बीच नजरें चुरानी पड़ती हैं या गलत जानकारी प्रस्तुत करने पर मजाक का पात्र भी बनना पड़ता है। अनेक क्षेत्रों में महिलाएं पुरुषों के बराबर हैं और कुछ क्षेत्रों में उनसे भी आगे हैं। सामान्य ज्ञान, अपने आस-पास के परिवेश और घटनाक्रम से शिक्षित होने पर भी पिछड़ी हुई हैं। सामाजिक विषयों पर चर्चा करना उन्हें प्रायः जमता नहीं है। राजनीति, खेल, व्यवसाय, अर्थ, तकनीक, दूरसंचार, स्वास्थ्य, विभिन्न गतिविधियों आदि के बारे में जानने के प्रति रुचि के अभाव के कारण उनका दायरा सौदर्य, पाक कला, फिल्म-टीवी, फैशन, गृहसज्जा, भविष्य फल आदि तक ही सीमित होकर रह जाता है। सामाजिक-आथिक मुद्दों के बारे में उन्हें तनिक भी जानकारी नहीं हो पाती।

पढ़ने की आदत महिला, पुरुष, युवा, किशोर, प्रौढ़, वृद्ध यानी हर उम्र के लोगों के लिए विभिन्न प्रकार से उपयोगी सिद्ध होती है। नौकरी-व्यवसाय ही नहीं जीवन के हर क्षेत्र में यह पढ़ने की आदत कम या अधिक काम ही आती है। एक आम उपभेक्ता के नाते भी पढ़ने और प्ढ़ते रहने की आदत बहुत काम आती है। पढ़ने और मनन करने की आदत के कारण ही अनगिनत लोग मशहूर लेखक, पत्रकार आदि सृजनशील व्यक्ति बनाया है। देश में तमाम पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं, इन्टरनेट पर अनेक पोर्टल हैं जिन्हें नियमित रूप से अपने पाठकों के लिए विविध स्तरीय सामग्री की आवश्यकता बनी रहती है।

पढ़ते-पढ़ते लिखने को प्रेरित होकर अनेक महिला-पुरुष लेखक बन गये और वे घर बैठे पर्याप्त धन और नाम भी कमा रहे हैं। बिना पूंजी लगाए, बिना कार्यालय या वर्कशॉप खोले वे अपना काम अपनी सुविधा के अनुसार कर रहे हैं। इस प्रकार के कार्य से जहां सृजनशीलता के साथ आत्मसन्तुष्टि सम्मान तो मिलता ही है, यह धन की प्राप्ति का जरिया भी बन जाता है। यही नहीं कैरियर की दृष्टि से भी पढ़ने-लिखने की आदत बहुत उपयोगी सिद्ध होती है।
• टी.सी. चन्दर/प्रभासाक्षी

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

कार्टूनिस्ट सम्मानित

कार्टूनिस्ट चन्दर सम्मानित


हाल ही में कार्टूनिस्ट चन्दर को पं. मदन मोहन मालवीय जयंती के उपलक्ष में अंशकालिक पत्रकार प्रोत्साहन पुरस्कार समारोह में ‘सर्वश्रेष्ठ कार्टूनिस्ट’ के रूप में सम्मानित किया गया।

गुरुवार, 24 दिसम्बर 2009 को ग़ाजियाबाद स्थित मेवाड़ इंस्टीट्यूट में पं. मदन मोहन मालवीय जयंती के उपलक्ष में अंशकालिक पत्रकार प्रोत्साहन पुरस्कार समारोह आयोजित हुआ। सरस्वती माँ के समक्ष मुख्य अतिथि माननीय डॉ. भीष्म नारायण सिंह द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं मालवीय जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद मालवीय जयन्ती का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। मेवाड़ संस्थान के अध्यक्ष अशोक कुमार गदिया ने संस्थान की ओर से मुख्य अतिथि डॉ. भीष्म नारायण सिंह व सभी सम्मानित अतिथियों का हार्दिक अभिनन्दन करते हुए इस अवसर पर पुरस्कार पाने वाले पत्रकारों को हार्दिक बधाई दी। उन्होंने कहा कि महामना मदन मोहन मालवीय विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी थे, उनके जीवन को पढ़ने पर लगता है कि वे आदर्श विद्यार्थी, पुत्र, पति, देश भक्त पत्रकार, वकील, कवि एवं कुशल राजनीतिज्ञ थे। वे शिक्षा के क्षेत्र में युगदृष्टा थे जिन्होंने 1916 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की कल्पना की और उसको मू्र्त रूप दिया। दान और सहयोग प्राप्त करने में उनके मुकाबले में आजतक कोई व्यक्ति नहीं हुआ।

वरिष्ठ पत्रकार और इंडिया टुडे पत्रिका के कार्यकारी सम्पादक जगदीश उपासने, जानेमाने कार्टूनिस्ट काक (हरीश चन्द्र शुक्ला ‘काक’) एवम् श्री रवीन्द्र त्रिपाठी की 3 सदस्यीय चयन समिति के निर्णय के अनुसार मुख्य अतिथि माननीय डॉ. भीष्म नारायण सिंह (पूर्व राज्यपाल-तमिलनाडु एवं असम) आशीश मणि त्रिपाठी (संवाददाता-हिन्दी), मनोज सिन्हा ( संवाददाता-अंग्रेजी), उमेश चतुर्वेदी (फीचर लेखक) और चन्दर/टी.सी. चन्दर (कार्टूनिस्ट) को सम्मानित किया गया। सभी को 5100.00 रुपये नकद राशि, शॉल, प्रशस्ति पत्र और मेवाड़ इंस्टीट्यूट का प्रतीक चिन्ह प्रदान किये। यह कार्यक्रम वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की प्रेरणा और सहयोग से आयोजित किया गया।

मुख्य अतिथि डॉ. भीष्म नारायण सिंह ने महामना के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मालवीय जी विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। मालवीय जी के जीवन से हमें शिक्षा लेनी चाहिए कि निःस्वार्थ रूप से हम परमार्थ कारण के लिए संलग्न रहें। वह एक महान कर्मयोगी थे। उनमें विलक्षण प्रतिभा थी। उसी प्रतिभा के आधार पर उन्होंने एक महान विश्वविद्यालय की स्थापना की जो आज उनकी स्मृति का श्रेष्ठ उदाहरण है। उनकी पत्रकारिता आज भी हमें प्रेरित करती है कि हम देश प्रेम और सेवा के लिए कार्यरत रहें।

जगदीश उपासने ने अपने सम्बोधन में कहा कि पत्रकारिता को नयी तकनीक तेजी से प्रभावित कर रही है। बदलते दौर में तकनीक का रोल लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। अब पत्रकारिता बड़े निवेश का विषय हो गया है। इसलिए कई बार लोंगो को यह शिकायत होती है कि पत्रकार पूरी ईमानदारी से पत्रकारिता नहीं कर रहा है। शिकायत करने वाले ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि अब पत्रकारिता में पूँजी का रोल बढ़ गया है। फिर भी मनुष्य पत्रकारिता के केन्द्र में हमेशा से रहा है और हमेशा बना रहेगा।

कार्यक्रम संचालन शिक्षा शास्त्र विभाग की प्राध्यापिका सुश्री मुग्धा आनंद ने किया।




दो शब्द: कार्टूनिस्ट चन्दर



श्रोता: कार्टूनिस्ट चन्दर और कार्टूनिस्ट काक


पत्नी  मंजू गोपालन और चन्दर





फ़ुर्सत: (बायें से) कार्टूनिस्ट काक, कार्टूनिस्ट चन्दर और पत्रकार संजय तिवारी (विस्फ़ोट.कॉम)

सहयात्रा में पढ़िए