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रविवार, 13 नवंबर 2011

मिडियापन

ईसाई धर्म प्रचारक के कब्जे से छुड़ाई गयीं नेपाली लड़कियाँ
भारतीय मीडिया मौन 
कोयम्बटूर (तमिलनाडु) स्थित माइकल जॉब सेंटर एक ईसाई मिशनरी और अनाथालय है। यह केन्द्र एक स्कूल भी चलाता है, हाल ही में इस केन्द्र पर हुई एक छापामार कार्रवाई में नेपाल के सुदूर पहाड़ी इलाकों से लाई गई 23 बौद्ध लड़कियों को छुड़वाया गया। नेपाल के अन्दरूनी इलाके के गरीब बौद्धों को रुपये और बेटियों की शिक्षा का लालच देकर एक दलाल वीरबहादुर भदेरा ने उन्हें डॉक्टर पीपी जॉब के हवाले कर दिया।

मिशनरी अनाथालय चलाने वाले इस एवेंजेलिस्ट पीपी जॉब ने इन लड़कियों का सौदा 100-100 पौण्ड में उस दलाल से किया था। दलाल ने उन गरीब नेपालियों से कहा था कि उनकी लड़कियाँ काठमाण्डू में हैं, जबकि वे वहाँ से हजारों किमी दूर कोयम्बटूर पहुँच चुकी थीं। ज़ाहिर है कि अनाथालय चलाने वाले इस "सो कॉल्ड" फ़ादर ने यह सौदा काफ़ी फ़ायदे का किया था, क्योंकि इसने अपने अनाथालय का धंधा चमकाने के लिए इन लड़कियों का पंजीकरण "नेपाली ईसाई" कहकर किया, तथा अपने विदेशी ग्राहकों को यह बताया कि ये सभी लड़कियाँ उन नेपाली ईसाईयों की हैं जिन्हें वहाँ के माओवादियों ने मार दिया था। इसलिए इन अनाथ, बेसहारा, बेचारी नेपाली बच्चियों को गोद लें (ज़ाहिर है मोटी रकम देकर)। इस फ़ादर ने इन लड़कियों के नाम बदलकर ईसाई नामधारी कर दिया और फ़िर अपने अनाथालय के नाम से अमेरिका और ब्रिटेन से मोटा चन्दा लिया।
फ़ादर पीपी जॉब ने मिशनरी की वेबसाइट पर इन लड़कियों को बाकायदा नम्बर और उनके झूठे प्रोफ़ाइल दे रखे थे, ताकि मिशनरी के सेवाभावी कार्यों(?) से प्रभावित और द्रवित होकर विदेशों से चन्दा वसूला जा सके। इस संस्था की एक शाखा ब्रिटेन के समरसेट इलाके में "लव इन एक्शन" के नाम से भी स्थापित है। इनमें से इक्का-दुक्का लड़कियों को फ़र्जी ईसाई बनाकर उन्हें वहाँ शिफ़्ट किये जाने की योजना थी, ताकि मिशनरी अनाथालय की विश्वसनीयता बनी रहे, बाकी लड़कियों को भारत में ही "कमाई के विभिन्न तरीकों" के तहत खपाया जाना था। परन्तु ब्रिटेन के एक रिटायर्ड फ़ौजी ले. कर्नल फ़िलिप होम्स को इस पर शक हुआ और उन्होंने अपने भारतीय NGO के कार्यकर्ताओं के जरिये पुलिस के साथ मिलकर यह छापा डलवाया और इस तरह ये 23 लड़कियाँ ईसाई बनने से बच गईं…
कर्नल फ़िलिप यह जानकर चौंके कि इनमें से एक भी लड़की न तो अनाथ है और न ही ईसाई, जबकि चर्च के जरिये चन्दा इसी नाम से भेजा जा रहा था। इनके प्रोफ़ाइल में लिखा है कि "इन लड़कियों के माता-पिता की माओवादियों ने हत्या कर दी है, इन गरीब लड़कियों का कोई नहीं है, हमारे नेपाली मिशनरी ने इन्हें कोयम्बटूर की इस संस्था को सौंपा है…"। छुड़ाए जाने के बाद एक लड़की ने कहा कि, नेपाल में हमें माओवादियों से कोई धमकी नहीं मिली, बल्कि हमारे माता-पिता गरीब हैं इसलिए उन्होंने हमें उस दलाल के हाथों बेच दिया था। वहाँ तो हम बौद्ध धर्म का पालन करते थे, यहाँ ईसाई बना दिया गया… अब हम किस धर्म का पालन करें?"
इस बीच उस दलाल वीरबहादुर भदेरा का कोई अता-पता नहीं है और स्रोतों के मुताबिक वह लड़कियाँ बेचने के इस "पेशे"(?) में काफ़ी सालों से है, उसके खिलाफ़ नेपाल के कई थानों में केस दर्ज हैं। जबकि फ़ादर पीपी जॉब फ़िलहाल अमेरिका में है और उसने इस मामले पर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है।
यहाँ आकर चर्च की गतिविधियों एवं मिशनरी अनाथालय चलाने वालों की मंशा पर शक के साथ-साथ इनकी कार्यप्रणाली तथा केन्द्र-राज्य की सरकारों का इन पर नियंत्रण भी सवालों के घेरे में है। क्योंकि भारत सरकार के बाल विकास मंत्रालय को फ़ादर पीपी जॉब ने जो जानकारी भेजी उसके अनुसार ये लड़कियाँ "हिमालयन ओरफ़ेनेज डेवलपमेंट सेंटर, हुमला" से लाई गईं, जिसके निदेशक हैं श्री वीरबहादुर भदेरा…"। समरसेट (ब्रिटेन) की इसकी सहयोगी संस्था ने 2007 से 2010 के बीच 18,000 पाउण्ड का चन्दा एकत्रित किया।
इस मामले में जहाँ एक ओर ईसाई जनसंख्या बढ़ाने के लिए "किसी भी स्तर तक" जाने वाले एवेंजेलिस्ट बेनकाब हुए हैं, वहीं दूसरी ओर गरीबी की मार झेल रहे उन लोगों की मानसिकता पर भी दया आती है जब उन्होंने इन लड़कियों को स्वीकार करने से ही इंकार कर दिया। फ़िलहाल यह सभी लड़कियाँ भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग के केन्द्र में हैं, लेकिन ऐसी कोई उम्मीद नहीं है कि उस कथित "फ़ादर" अथवा उस अनाथालय पर कोई कठोर कार्रवाई होगी…
हमेशा की तरह सबसे घटिया भूमिका भारत के "सबसे तेज़" मीडिया की रही, जिसने इस घटना का कोई उल्लेख तक नहीं किया, परन्तु यदि यही काम किसी "हिन्दू आश्रम" या किसी "पुजारी" ने किया होता तो NDTV समेत सभी चमचों ने पूरे हिन्दू धर्म को ही कठघरे में खड़ा कर दिया होता…। शायद "सेकुलरिज़्म" इसी को कहते हैं… 
सुरेश चिपलूणकर 
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लेख का स्रोत :- http://www.telegraph.co.uk/news/worldnews/asia/india/8856050/The-Indian-preacher-and-the-fake-orphan-scandal.html
http://www.hindustantimes.com/world-news/Nepal/Orphan-girls-rescued-from-TN/Article1-762956.aspx

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

बिजली गॉन, मीटर ऑन

बीएसईएस की कारगुजारी 
बिजली का कनेक्शन काटते समय मीटर की रीडिंग ४४७ यूनिट थी। २ दिन बाद अचानक सूबे सिंह की नज़र मीटर पर पड़ी तो उनके होश उड़ गये। बिना बिजली कनेक्शन के मीटर दौड़ रहा था और उसमें रीडिंग १२५७ थी। उन्होंने अपने इष्ट-मित्र-पड़ोसियों को बुलाकर यह करामात दिखाई। सभी यह देख आश्चर्यचकित और आक्रोषित थे। 
निजी बिजली कम्पनी बीएसईएस (मालिक अम्बानी) के ऊपर दिल्ली की मुख्य मन्त्री श्रीमती शीला दीक्षित की असीम कृपा है। खुलेआम इस कम्पनी का वे पक्ष लेती हैं। तेज दौड़ते बिजली के मीटरों से लोग लम्बे समय से परेशान हैं। मनमाने बिलों से परेशान हैं। पर राहत की बजाय लोगों के हाथ सिर्फ़ परेशानियां ही आती हैं।





पिछले दिनों बिजली का बिल समय पर जमा न कर पाने के कारण दिल्ली के नजफ़गढ़ क्षेत्र के गांव खड़खड़ी रोंद निवासी सूबे सिंह के घर का कनेक्शन काट दिया गया। बिजली का कनेक्शन काटते समय मीटर की रीडिंग ४४७ यूनिट थी। २ दिन बाद अचानक सूबे सिंह की नज़र मीटर पर पड़ी तो उनके होश उड़ गये। बिना बिजली कनेक्शन के मीटर दौड़ रहा था और उसमें रीडिंग १२५७ थी। उन्होंने अपने इष्ट-मित्र-पड़ोसियों को बुलाकर यह करामात दिखाई। सभी यह देख आश्चर्यचकित और आक्रोषित थे।
वे तत्काल इस मामले की शिकायत करने ३ बार उजवा और नजफ़गढ़ दफ़्तर गये। किसी बिजली अधिकारी ने उनकी बात नहीं सुनी। मीटर की जांच के लिए पहले ५० रुपये शुल्क जमा कराकर शिकायत करने को  को कहा गया। सूबे सिंह ने अनेक परेशानियां झेलते हुए बिजली दफ़्तर के अधिकारियों के निर्देशों का पालन किया। फ़िर उन्हें बिजली के बिल की बकाया राशि २३०० रुपये भी जमा कराने को कहा गया। वह भी उन्होंने जमा करा दी। इसके बाद बिजली अधिकारी उनके घर गये और दिया गया विवरण सही पाकर तत्काल मीटर बदलने का पर्चा काट दिया। सूबे सिंह के घर का दो दिन जमकर चला बिजली का फ़िलहाल बन्द है। पर बिजली का दोषयुक्त यह मीटर ये पंक्तियां लिखे जाने तक यानी आज २० अक्टूबर २०११ तक भी नहीं बदला गया है।
यही है जनसेवा करने वाली सरकार के तमाम कामों का एक नमूना।
• सुरेश त्रेहान
नाहरगढ़ साप्ताहिक, नयी दिल्लीhttps://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhjDbnGJezER5tnFfLoVkZmTzrfozPpx36_JmwYbzUKV2hQFxQ_nPfVAQ5_6x_2wXRB9yAAzgCbmSdSLK9NyXof_zNFFDZsBg287toso4_BzI59McGjHqtkRZxnsYx9nwv7WlaN3gsYzY0/s320/logo%202%20-%20925.jpg



युवराज

युवराज की मर्जी के सामने
संसद की क्या हैसियत
सोनिया-राहुल का व्यवहार संसद के प्रति इतना नकारात्मक और उपेक्षा वाला है तो फ़िर वे आए दिन अन्य राज्य सरकारों को नैतिकता का उपदेश कैसे दे सकते हैं? मनरेगा जैसी ना जाने कितनी योजनाएं हैं, रायबरेली-अमेठी की सड़कों की हालत खस्ता है, फ़िर भी पता नहीं क्यों राहुल बाबा ने यहाँ अपनी निधि का पैसा खर्च क्यों नहीं किया?
जैसा कि आप सभी ज्ञात है कि हम अपने सांसद चुनते हैं ताकि जब भी संसद सत्र चल रहा हो वे वहाँ नियमित उपस्थिति रखें, अपने क्षेत्र की समस्याओं को संसद में प्रश्नों के जरिये उठाएं, तथा उन्हें मिलने वाली सांसद निधि की राशि का उपयोग गरीबों के हित में सही ढंग से करें।
सूचना के अधिकार तहत प्राप्त एक जानकारी के अनुसार, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को नियुक्त करने वाली सुप्रीम कमाण्डर, तथा देश के भावी युवा(?) प्रधानमंत्री, इस मोर्चे पर बेहद फ़िसड्डी साबित हुए हैं। 15वीं लोकसभा की अब तक कुल 183 बैठकें हुई हैं, जिसमें सोनिया की उपस्थिति रही 77 दिन (42%), जबकि राहुल बाबा 80 दिन (43%) उपस्थित रहे (मेनका गाँधी की उपस्थिति 129 दिन एवं वरुण की उपस्थिति 118 दिन रही)। इस मामले में सोनिया जी को थोड़ी छूट दी जा सकती है, क्योंकि संसद के पूरे मानसून सत्र में वे अपनी रहस्यमयी बीमारी की वजह से नहीं आईं। 
इसी प्रकार संसद में प्रश्न पूछने के मामले में रिकॉर्ड के अनुसार वरुण गाँधी ने 15वीं संसद में अब तक कुल 89 प्रश्न पूछे हैं और मेनका गाँधी ने 137 प्रश्न पूछे हैं, जबकि दूसरी ओर संसद के लगातार तीन सत्रों में मम्मी-बेटू की जोड़ी ने एक भी सवाल नहीं पूछा (क्योंकि शायद उन्हें संसद में सवाल पूछने की जरुरत ही नहीं है, उनके
गुलाम उन्हें उनके घर जाकर रिपोर्ट देते हैं) जहाँ तक बहस में भाग लेने का सवाल है, मेनका गाँधी ने कुल 12 बार बहस में हिस्सा लिया और वरुण गाँधी ने 2 बार, वहीं सोनिया गाँधी ने किसी भी बहस में हिस्सा नहीं लिया, तथा अमूल बेबी ने सिर्फ़ एक बार (अण्णा हजारे के वाले मसले पर) चार पेज का लिखा हुआ भाषण पढ़ा।
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEitHFP7zGvgFFZpQZqzvHp_6ZgG2fT9HvGpp5IKNl9WcU1DZuhDFSarWroDAJbaseJHIaHW7cOUCd-PrvoLCtsk5VSjpVj-qkftkGaFClQd2R6OT1mCLKPztXSsqhJMhhlOKOzkTnCkhVvg/s400/amul+baby+15042011.jpgसांसदों के कामों को आँकने में सांसद निधि एक महत्वपूर्ण घटक होता है। इस निधि को सांसद अपने क्षेत्र में स्वविवेक से सड़क, पुल अथवा अस्पताल की सुविधाओं पर खर्च कर सकते हैं। जून 2009 से अगस्त 2011 तक प्रत्येक सांसद को 9 करोड़ की सांसद निधि आवंटित की गई। इसमें से सोनिया गाँधी ने अब तक सिर्फ़ 1.94 करोड़ (21%) एवं राहुल बाबा ने 0.18 करोड़ (मात्र 3%) पैसे का ही उपयोग अपने क्षेत्र के विकास हेतु किया है। वहीं मेनका गाँधी ने इस राशि में से 2.25 करोड़ (25%) तथा वरुण ने अपने संसदीय क्षेत्र के लिए 3.17 करोड़ (36%) खर्च कर लिए हैं।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सत्ताधारी गठबंधन की प्रमुख होने के बावजूद सोनिया-राहुल का व्यवहार संसद के प्रति इतना नकारात्मक और उपेक्षा वाला है तो फ़िर वे आए दिन अन्य राज्य सरकारों को नैतिकता का उपदेश कैसे दे सकते हैं? मनरेगा जैसी ना जाने कितनी योजनाएं हैं, रायबरेली-अमेठी की सड़कों की हालत खस्ता है, फ़िर भी पता नहीं क्यों राहुल बाबा ने यहाँ अपनी निधि का पैसा खर्च क्यों नहीं किया? जबकि मेनका-वरुण का परफ़ॉर्मेंस उनके अपने-अपने संसदीय क्षेत्रों में काफ़ी बेहतर है। परन्तु "महारानी" और "युवराज" की जब मर्जी होगी तब वे संसद में आएंगे और इच्छा हुई तो कभीकभार सवाल भी पूछेंगे, हम-आप उनसे इस सम्बन्ध में सवाल करने वाले कौन होते हैं…। जब उन्होंने आज तक सरकारी खर्च पर होने वाली विदेश यात्राओं का हिसाब ही नहीं दिया, तो संसद में उपस्थिति तो बहुत मामूली बात है…। "राजपरिवार" की मर्जी होगी तब जवाब देंगे… संसद की क्या हैसियत है उनके सामने?


अब समझ में आया कि आखिर मनमोहन सिंह साहब सूचना के अधिकार कानून की बाँह क्यों मरोड़ना चाहते हैं। कुछ सिरफ़िरे लोग सोनिया-राहुल से सम्बन्धित इसी प्रकार की ऊलजलूल सूचनाएं माँग-माँगकर, सरकार का टाइम खराब करते हैं, सोनिया का ज़ायका खराब करते हैं और उनके गुलामों का हाजमा खराब करते हैं… 

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