जय जवान-जय किसान
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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013
शनिवार, 12 जनवरी 2013
विवेकानन्द जयती
मेवाड़ संस्थान में मनायी गयी
स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयती

वसुन्धरा (गाजियाबाद) स्थित मेवाड़ संस्थान के मेवाड़ ऑडिटोरियम में स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयंती १२ जनवरी २०१३ को बड़े धूम धाम से मनायी गयी।
इस अवसर पर स्वामी निखिलानन्द सरस्वती (चिनमय मिशन) और डा. अश्वनी महाजन (डी.ए,वी. कॉलेज, दिल्ली विश्व विद्यालय), मुख्य अतिथि के रूप में विद्यमान थे। दीप प्रज्ज्वलन, स्वागत अभिवादन, वन्दे मातरम् एवं सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ।
संस्थान के विभिन्न छात्र-छात्राओं ने अनेकानेक प्रकार से स्वामी जी के जीवन एवं उनके कार्यों तथा शिक्षाओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया। इस संदर्भ में संस्थान के छात्र-छात्राओं ने स्वामी जी के जीवन पर एक नाटक का मंचन भी किया। इस अवसर पर स्वामी जी द्वारा दी गयी सूक्तियों एवं निबन्ध प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया। निबन्ध प्रतियोगिता में अजय कुमार शिक्षा विभाग को प्रथम, आकांक्षा शर्मा, एम.एस.सी. बायोटेक को द्वितीय, वरूण कुमार कम्प्यूटर विभाग को तृतीय, दीप्ति गुप्ता एल.एल.बी. ५ वर्षीय को चेयरमैन अवार्ड प्रदान किया गया। सूक्ति प्रतियोगिता में केशव बी.बी.ए. प्रथम, आकांक्षा, एम.एस.सी. बायोटेक द्वितीय एवं जे.ई.जया एल.एल.बी. ५ वर्षीय को तृतीय पुरस्कार दिया गया। इस अवसर पर प्रतियोगिता में सहभागी सभी छात्र-छात्राओं को नगद पुरस्कार प्रदान किये गये।
मुख्य अतिथि स्वामी निखिलानंद सरस्वती जी ने सभी छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज इस अवसर पर विवेक को प्रखर करने की जरूरत है। सही सोच सकारात्मक बुद्धि और निर्णय लेने की क्षमता हमें विवेकानन्द जी से सीखने को मिलती है। आज जरूरत है स्वंय को समझने की। इस सम्बन्ध में उन्होंने अनेक उदाहरण देकर समझाने का प्रयास किया।
कार्यक्रम का समापन करते हुए संस्थान के अध्यक्ष श्री अशोक कुमार गादिया ने स्वामी विवेकानन्द के जीवन से सम्बन्धित शिक्षाओं का वर्णन करते हुए कहा कि तुममें से ही किसी को विवेकानन्द बनना है। उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंस एवं नरेन्द्र से विवेकानन्द बनने की घटनाओं का वर्णन किया। अध्यक्ष ने स्वामी विवेकानन्द द्वारा मद्रास में दिये गये उनके भाषण को भी पढ़कर सुनाया और कहा कि इस अंश को सभी छात्र-छात्राओं को पढ़ना चाहिए। इसमें देश-प्रेम मानव सेवा कूट-कूटकर भरी है। जिस धर्म को साधु-संन्यासियों का धर्म कहा जाता था उसी धर्म का विवेकानन्द ने विश्व में परचम फहराया। आज जरूरत है उनके विचारों को समाज में लागू करने की।
विचार गोष्ठी
स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयंती के स्मरणोत्सव पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन भी सायं 4 बजे किया गया। प्राथमिक औपचारिकताओं के बाद विचार गोष्ठी का शुभारम्भ करते हुए मुख्य अतिथि प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं वक्ता प्रो. नरेन्द्र कोहली ने स्वामी विवेकानन्द के जीवन, वैराग्य, धर्म, विज्ञान, योग, वेदान्त, मीमांसा एवं दर्शन का विस्तृत वर्णन करते हुए कहा कि विवेकानन्द निश्चित रूप से उच्चकोटि के सन्त थे। उनकी सोच वैज्ञानिक सोच रही है, जिसकी आज के समय में नितान्त जरूरत है। प्रो. कोहली ने विचार गोष्ठी के दौरान धर्म, अध्यात्मिकता, योग, वेदान्त एवं दर्शन जैसे विषयों पर प्रश्नोत्तर के माध्यम से श्रोताओं की शंकाओं का समाधान भी किया।
कार्यक्रम के अन्त में संस्थान के अध्यक्ष श्री अशोक कुमार गादिया ने कहा कि ऐसी विचार गोष्ठियाँ समय-समय पर होती रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विवेकानन्द जैसे राष्ट्र सन्त की १५०वीं जयंती के अवसर पर इस विचार गोष्ठी की आवश्यकता और बढ़ जाती है। उन्होने कार्यक्रम में पधारे सभी लोगों को हार्दिक धन्यवाद दिया।
इस अवसर पर संस्थान के सभी छात्र-छात्राएं, अध्यापक, निदेशक डा. अलका अग्रवाल, डायरेक्टर जनरल ऑफ लॉ भारत भूषण एवं अनेक बुद्धिजीवी उपस्थित थे। कार्यक्रम का सफल संचालन शिक्षा विभाग की प्रवक्ता सुश्री तानिया गुप्ता और श्री बाबू लाल ने किया।
प्रस्तुति: टी.सी. चन्दर
स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयती

वसुन्धरा (गाजियाबाद) स्थित मेवाड़ संस्थान के मेवाड़ ऑडिटोरियम में स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयंती १२ जनवरी २०१३ को बड़े धूम धाम से मनायी गयी।
इस अवसर पर स्वामी निखिलानन्द सरस्वती (चिनमय मिशन) और डा. अश्वनी महाजन (डी.ए,वी. कॉलेज, दिल्ली विश्व विद्यालय), मुख्य अतिथि के रूप में विद्यमान थे। दीप प्रज्ज्वलन, स्वागत अभिवादन, वन्दे मातरम् एवं सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ।
संस्थान के विभिन्न छात्र-छात्राओं ने अनेकानेक प्रकार से स्वामी जी के जीवन एवं उनके कार्यों तथा शिक्षाओं पर प्रकाश डालने का प्रयास किया। इस संदर्भ में संस्थान के छात्र-छात्राओं ने स्वामी जी के जीवन पर एक नाटक का मंचन भी किया। इस अवसर पर स्वामी जी द्वारा दी गयी सूक्तियों एवं निबन्ध प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया। निबन्ध प्रतियोगिता में अजय कुमार शिक्षा विभाग को प्रथम, आकांक्षा शर्मा, एम.एस.सी. बायोटेक को द्वितीय, वरूण कुमार कम्प्यूटर विभाग को तृतीय, दीप्ति गुप्ता एल.एल.बी. ५ वर्षीय को चेयरमैन अवार्ड प्रदान किया गया। सूक्ति प्रतियोगिता में केशव बी.बी.ए. प्रथम, आकांक्षा, एम.एस.सी. बायोटेक द्वितीय एवं जे.ई.जया एल.एल.बी. ५ वर्षीय को तृतीय पुरस्कार दिया गया। इस अवसर पर प्रतियोगिता में सहभागी सभी छात्र-छात्राओं को नगद पुरस्कार प्रदान किये गये।मुख्य अतिथि स्वामी निखिलानंद सरस्वती जी ने सभी छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज इस अवसर पर विवेक को प्रखर करने की जरूरत है। सही सोच सकारात्मक बुद्धि और निर्णय लेने की क्षमता हमें विवेकानन्द जी से सीखने को मिलती है। आज जरूरत है स्वंय को समझने की। इस सम्बन्ध में उन्होंने अनेक उदाहरण देकर समझाने का प्रयास किया।
कार्यक्रम का समापन करते हुए संस्थान के अध्यक्ष श्री अशोक कुमार गादिया ने स्वामी विवेकानन्द के जीवन से सम्बन्धित शिक्षाओं का वर्णन करते हुए कहा कि तुममें से ही किसी को विवेकानन्द बनना है। उन्होंने श्री रामकृष्ण परमहंस एवं नरेन्द्र से विवेकानन्द बनने की घटनाओं का वर्णन किया। अध्यक्ष ने स्वामी विवेकानन्द द्वारा मद्रास में दिये गये उनके भाषण को भी पढ़कर सुनाया और कहा कि इस अंश को सभी छात्र-छात्राओं को पढ़ना चाहिए। इसमें देश-प्रेम मानव सेवा कूट-कूटकर भरी है। जिस धर्म को साधु-संन्यासियों का धर्म कहा जाता था उसी धर्म का विवेकानन्द ने विश्व में परचम फहराया। आज जरूरत है उनके विचारों को समाज में लागू करने की।
विचार गोष्ठी
स्वामी विवेकानन्द की १५०वीं जयंती के स्मरणोत्सव पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन भी सायं 4 बजे किया गया। प्राथमिक औपचारिकताओं के बाद विचार गोष्ठी का शुभारम्भ करते हुए मुख्य अतिथि प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं वक्ता प्रो. नरेन्द्र कोहली ने स्वामी विवेकानन्द के जीवन, वैराग्य, धर्म, विज्ञान, योग, वेदान्त, मीमांसा एवं दर्शन का विस्तृत वर्णन करते हुए कहा कि विवेकानन्द निश्चित रूप से उच्चकोटि के सन्त थे। उनकी सोच वैज्ञानिक सोच रही है, जिसकी आज के समय में नितान्त जरूरत है। प्रो. कोहली ने विचार गोष्ठी के दौरान धर्म, अध्यात्मिकता, योग, वेदान्त एवं दर्शन जैसे विषयों पर प्रश्नोत्तर के माध्यम से श्रोताओं की शंकाओं का समाधान भी किया।
कार्यक्रम के अन्त में संस्थान के अध्यक्ष श्री अशोक कुमार गादिया ने कहा कि ऐसी विचार गोष्ठियाँ समय-समय पर होती रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विवेकानन्द जैसे राष्ट्र सन्त की १५०वीं जयंती के अवसर पर इस विचार गोष्ठी की आवश्यकता और बढ़ जाती है। उन्होने कार्यक्रम में पधारे सभी लोगों को हार्दिक धन्यवाद दिया।
इस अवसर पर संस्थान के सभी छात्र-छात्राएं, अध्यापक, निदेशक डा. अलका अग्रवाल, डायरेक्टर जनरल ऑफ लॉ भारत भूषण एवं अनेक बुद्धिजीवी उपस्थित थे। कार्यक्रम का सफल संचालन शिक्षा विभाग की प्रवक्ता सुश्री तानिया गुप्ता और श्री बाबू लाल ने किया।
प्रस्तुति: टी.सी. चन्दर
साई
साई बोल मूरख
हाल ही में हमारे क्षेत्र में एक जुलूस निकला- अंग्रेजी बैण्ड बाजों के साथ। आगे एक वाहन में गणेशजी की प्रतिमा, उसके पीछे साई बोल कहती ज्यादा महिलाएं-लड़कियां और कुछ पुरुष फ़िर साई बाबा की प्रतिमा। ऐसे द्रूश्य तमाम बस्तियों में साई के व्यवसाय के प्रचार के रूप में दिखाई दे जाते हैं। यहीं अक्सर ऐसे छोटे-बड़े जुलूस निकलते रहते हैं। हिन्दू धन्य होते हैं कि उन्हें एक और संकटमोचक (?) मिल गया। कारण, साई को राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि देवताओं के साथ नत्थी कर दिया गया है, जैसे- ॐ साई राम। इस आशय के तमाम चित्र नेट पर मौजूद हैं। साई महिमा की तमाम कहानियां प्रचलित की गई हैं। कुछ टीवी चैनल भी इस धन्धे में शामिल हैं। फ़िल्म-डॉल्यूमेण्टरी बन गयीं। तमाम ब्लॉग-वेबसाइटें मौजूद हैं। फ़ुटपाथ-जमीनों पर कब्जजा कर उसके मन्दिर बनाए जा रहे हैं। यही नहीं लालची लोग हिन्दू मन्दिरों में साई की मूर्तियां स्थापित कर लोगों की अन्ध श्रद्धा से धन्धा बढ़ाने में लगे हुए हैं। साई की मूर्ति मन्दिर में होन एक फ़ैशन का रूप ले चुका है। सनातन धर्म के भजन-कीर्तनों में साई भजन की फ़रमाइश भी उठती है। जमकर महिमामण्डन हो रहा है। मूर्ख बनाया जा रहा है और हम खुशी-खुशी बन भी रहे हैं।

शिरडी के साई
साभार/लिन्क: https://hindurashtra.wordpress.com/2012/04/12/shirdi-sai-baba/
हाल ही में हमारे क्षेत्र में एक जुलूस निकला- अंग्रेजी बैण्ड बाजों के साथ। आगे एक वाहन में गणेशजी की प्रतिमा, उसके पीछे साई बोल कहती ज्यादा महिलाएं-लड़कियां और कुछ पुरुष फ़िर साई बाबा की प्रतिमा। ऐसे द्रूश्य तमाम बस्तियों में साई के व्यवसाय के प्रचार के रूप में दिखाई दे जाते हैं। यहीं अक्सर ऐसे छोटे-बड़े जुलूस निकलते रहते हैं। हिन्दू धन्य होते हैं कि उन्हें एक और संकटमोचक (?) मिल गया। कारण, साई को राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि देवताओं के साथ नत्थी कर दिया गया है, जैसे- ॐ साई राम। इस आशय के तमाम चित्र नेट पर मौजूद हैं। साई महिमा की तमाम कहानियां प्रचलित की गई हैं। कुछ टीवी चैनल भी इस धन्धे में शामिल हैं। फ़िल्म-डॉल्यूमेण्टरी बन गयीं। तमाम ब्लॉग-वेबसाइटें मौजूद हैं। फ़ुटपाथ-जमीनों पर कब्जजा कर उसके मन्दिर बनाए जा रहे हैं। यही नहीं लालची लोग हिन्दू मन्दिरों में साई की मूर्तियां स्थापित कर लोगों की अन्ध श्रद्धा से धन्धा बढ़ाने में लगे हुए हैं। साई की मूर्ति मन्दिर में होन एक फ़ैशन का रूप ले चुका है। सनातन धर्म के भजन-कीर्तनों में साई भजन की फ़रमाइश भी उठती है। जमकर महिमामण्डन हो रहा है। मूर्ख बनाया जा रहा है और हम खुशी-खुशी बन भी रहे हैं।

शिरडी के साई
साभार/लिन्क: https://hindurashtra.wordpress.com/2012/04/12/shirdi-sai-baba/
तुम चाहे कितना भी साई-साई चिल्लाओ गला फाड़ फाड़ के, चाहे दरगाहों पर जाकर कितनी भी चादर चढालो, तुम श्री भगवान को तो क्या उनकी कृपा का एक अंश भी प्राप्त नहीं कर सकते। ये सत्य है साई ने ऐसा क्या कर दिया था जो तुम्हारा गला नहीं दुखता उसकी महिमा गाते गाते? अरे पूरा भारत उस समय अंग्रेज़ों के डंडे खा रहा था, साई ने बचाया था क्या? अगर वो भगवान था या संत था तो उसने गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए क्या किया था? उस समय श्री कृष्ण की प्रिय सर्वदेवमई गोमाताएं काटी जाती थीं उनके ऊपर साई कभी क्यों नहीं बोला? भगवान श्री कृष्ण थे, जब कंस के अनुचर गोमाताओ को ले जाने लगे तो, उन्हें मार कर परलोक पहुंचा दिया था और एक ये साई था कि हजारों गोमाताएं रोज कटती रहीं ये बचाना तो दूर उनके ऊपर कभी बोला तक नहीं? काहे का भगवान या संत था ये ? क्या इस भूमि की सनातनी संतानें इतनी बुद्धिहीन हो गयी हैं कि जिसकी भी काल्पनिक महिमा के गपोड़े सुन ले उसी को भगवान और महान मानकर भेडॉ की तरह उसके पीछे चल देती है? इसमे हमारा नहीं आपका ही फायदा है। श्रद्धा और अंधश्रद्धा में फर्क होता है, श्रद्धालु बनो, भगवान को चुनो, राम और कृष्ण के बनो, साई के बनाकर सिर्फ भूत प्रेत बनाकर ही भटकोगे ….. जय श्री राम कृष्ण ……… जय सनातन धर्म
साई भक्तों के लिए दस प्रश्न – अगर किसी भी साई भक्त के पास इन दस प्रश्नो का उत्तर हैं तो में भी साई का भक्त बनूँगा और उत्तर नहीं है तो कृपया मेरी फ्रेंड लिस्ट से विदा लेले, सचिन शर्मा को ऐसे मित्रो की आवश्यकता नहीं है चाहे कोई भी हो कोई फालतू की बहस नहीं, कुतर्क नहीं, जिसके पास सभी प्रश्नो का सार्थक जवाब हो उत्तर दे। कोई सुझाव नहीं चाहिए और अगर इनके उत्तर नहीं है या इन्हे पढ़ने के बाद शर्म आए तो भगवान की और बढ़ो, कल्याण होग।
1 – साई को अगर ईश्वर मान बैठे हो अथवा ईश्वर का अवतार मान बैठे हो तो क्यों? आप हिन्दू हैं तो सनातन संस्कृति के किसी भी धर्मग्रंथ में साई महाराज का नाम तक नहीं है। तो धर्मग्रंथों को झूठा साबित करते हुए किस आधार पर साई को भगवान मान लिया? और धर्मग्रंथ कहते हैं कि कलयुग में दो अवतार होने है एक भगवान बुद्ध का हो चुका दूसरा कल्कि नाम से अंतिम चरण में होगा।
2 – अगर साई को संत मानकर पूजा करते हो तो क्यों? क्या जो सिर्फ अच्छा उपदेश दे दे या कुछ चमत्कार दिखा दे वो संत हो जाता है? साई महाराज कभी गोहत्या पर बोले? साई महाराज ने उस समय उपस्थित कौन सी सामाजिक बुराई को खत्म किया या करने का प्रयास किया? ये तो संत का सबसे बड़ा कर्तव्य होता है और फिर संत ही पूजने हैं तो कमी थी क्या ? यह फकीर ही मिला ?
3- अगर सिर्फ दूसरों से सुनकर साई के भक्त बन गए हो तो क्यों? क्या अपने धर्मग्रंथो पर या अपने भगवान पर विश्वास नहीं रहा ?
4 – अगर मनोकामना पूर्ति के लिए साई के भक्त बन गए हो तो तुम्हारी कौन सी ऐसी मनोकामना है जो कि भगत्वतसल भगवान शिवजी या श्री विष्णु जी या कृष्ण जी या राम जी पूरी नहीं कर सकते सिर्फ साई ही कर सकता है? तुम्हारी ऐसी कौन सी मनोकामना है जो कि वैष्णो देवी या हरिद्वार या वृन्दावन या काशी या बाला जी में शीश झुकाने से पूर्ण नहीं होगी वो सिर्फ शिरडी जाकर माथा टेकने से ही पूरी होगी।
5 – तुम्हारे पूर्वज सुबह और शाम श्री राम या कृष्ण या शिव शिव ही बोलते थे फिर तुम क्यों सिर्फ प्रचार को सुनकर बुद्धि को भ्रम में डालकर साई-साई चिल्लाने लगे हो?
6 – अगर भगवान कि पूजा करनी है तो इतने प्यारे,दयालु ,कृपालु भगवान है न तुम्हारे पास फिर साई क्यों ? अगर संतों की पूजा करनी है तो साई से महान ऋषि मुनि हैं न साई ही क्यों?
7 -मुस्लिम अपने धर्म के पक्के होते है अल्लाह के अलावा किसी और की और मुंह भी नहीं करते जब कोई अपना बाप नहीं बदल सकता अथवा अपने बाप कि जगह पर किसी और को नहीं देख सकता तो तुम साई को अपने भगवान की जगह पर देखकर क्यों दुखी या क्रोधित नहीं होते?
8 -अगर सनातन धर्मी हो तो सनातन धर्म में तो कहीं साई है ही नहीं। तो आप खुद को सनातन धर्मी कहलाना पसंद करोगे या धर्मनिरपेक्षी साई भक्त?
9 – आप खुद को राम या कृष्ण या शिव भक्त कहलाने में कम गौरव महसूस करते हैं क्या जो साई भक्त होने का बिल्ला टाँगे फिरते हैं? क्या राम और कृष्ण से प्रेम का क्षय हो गया है?
10 – ॐ साई राम ॐ हमेशा मंत्रों से पहले ही लगाया जाता है अथवा ईश्वर के नाम से पहले साई के नाम के पहले ॐ लगाने का अधिकार कहां से पाया? जय साई राम श्री में शक्ति माता निहित है श्री शक्तिरूपेण शब्द है जो कि अक्सर भगवान जी के नाम के साथ संयुक्त किया जाता है तो जय श्री राम में से श्री तत्व को हटाकर साई लिख देने में तुम्हें गौरव महसूस होना चाहिए या शर्म आनी चाहिए?
ये जो फोटो है ऐसे फोटो आजकल चोराहों पर लगाकार भगवान का खुलेआम अपमान और हिन्दुओं को मूर्ख बनाया जा रहा है? मुस्लिम साई के चक्कर में नहीं पड़ते धर्म के पक्के है सिर्फ अल्लाह हिन्दू प्रजाति ही हमेशा मूर्ख क्यो बनती है।
जय श्री राम! जय सनातन धर्म!!
जय श्री राम! जय सनातन धर्म!!
गुरुवार, 10 जनवरी 2013
सरदार पटेल
आज फिर पटेल याद आ गये
डॉ विवेक आर्य
कासिम रिज़वी को ऑपरेशन पोलो के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया जहाँ वह 1957 तक सड़ता रहा। बाद में 1957 में वह माफ़ी मांग कर पाकिस्तान में शरणार्थी बनकर चला गया। 1947 से 1957 तक मजलिस पर प्रतिबन्ध रहा। इसी कासिम रिज़वी की मजलिस पार्टी को 1957 में अब्दुल वाहिद ओवैसी ने दोबारा से शुरू किया और वही अब्दुल वाहिद ओवैसी अकबरुद्दीन और असदुद्दीन का दादा था।
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| नेहरू-गांधी-पटेल |
जब भारत की आबोहवा में पाकिस्तान का नाम लिया जाने लगा तो निज़ाम की मतान्धता में कई गुना की वृद्धि हुई और अपने अत्याचारों को मासूम प्रजा पर जिहादी तरीके से लागू करने के लिए उसने रजाकार के नाम से एक सेना बनाई जो हथियार लेकर गलियों में झुण्ड के झुण्ड बनाकर जिहादी नारे लगते हुए गश्त करने लगे। उनका मकसद केवल एक ही था। हिन्दू प्रजा पर दहशत के रूप में टूट पड़ना। इन रजाकारों का नेतृत्व कासिम रिज़वी नाम का एक मतान्ध मुसलमान कर रहा था। इन रजाकारों ने अनेक हिन्दुओं को बड़ी निर्दयता से हत्या की थी। हज़ारों अबलाओं का बलात्कार किया गया, हजारों निरपराध हिन्दू बच्चों को पकड़ कर सुन्नत तक कर दिया था । यहाँ तक की जनसँख्या का संतुलन बिगाड़ने के लिए बाहर से लाकर मुसलमानों को बसाया गया था।आर्य समाज के हैदराबाद के प्रसिद्द नेता भाई श्यामलाल वकील की जेल में डालकर अमानवीय अत्याचार कर जहर द्वारा हत्या कर दी गयी। MIM - Majlis-e-Ittehād-ul Muslimīn (माजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुसलमिन) की स्थापना 1927 में निज़ाम की सलाह पर उसके कुछ बाशिंदों ने करी थी जिसकी कमान बाद में कासिम रिज़वी के हाथ में आ गयी थी। आर्य समाज ने 1939 में इस हिंदुओ पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध अहिंसात्मक आन्दोलन किया। पूरे भारत से 7.5 हज़ार आर्य क्रांतिकारियों ने निज़ाम की जेलों को भर दिया जिससे की निज़ाम के राज्य में किसी अपराधी को जेल में रखने का स्थान न बचा। अहिंसा का मंत्र जपने वाले महात्मा गाँधी ने आर्यसमाज का खुलकर हैदराबाद सत्याग्रह करने पर विरोध किया जिसकी प्रतिक्रिया स्वरुप कांग्रेस का दफ्तर उसके सभी सदस्यों के त्याग पत्रों से भर गया तब जाकर गाँधी को मालूम हुआ की कांग्रेस के 85% सदस्य आर्य समाजी हैं और उन्होंने अपनी आलोचना को वापिस लिया। आर्यसमाज के इस सत्याग्रह में दो दर्जन के करीब सत्याग्रही शहीद हुए पर अंत में विजयश्री आर्यसमाज को ही मिली। निज़ाम जो दुनिया में अपने से बढ़कर किसी को भी नहीं समझता था उसे नीचा दिखा दिया गया। मजलिस ने आर्यसमाज का पुरजोर विरोध किया पर विजय अंत में सत्य की हुई। हिन्दुओं को उनके अधिकार मिले। पर आन्दोलन के बाद भी रजाकारों का अत्याचार न थमा।
1947 तक आते आते निज़ाम ने पाकिस्तान से हैदराबाद रियासत को मिलाने की बात कह दी और एक 15 मील चोड़ा कॉरिडोर हैदराबाद को पाकिस्तान से जोड़ने के लिए माँगा। कासिम रिज़वी सरदार पटेल को धमकी देने की नीयत से दिल्ली आया और सरदार पटेल से बोला कि अगर निज़ाम की मांगों को न माना गया तो उसके राज्य में रह रहे 6 करोड़ हिंदुओं की खैर नहीं होगी। सरदार पटेल ने मुस्कुराते हुए रिज़वी को कहा कि अगर हिंदुओ को कुछ भी हुआ तो निज़ाम और खुद कासिम रिज़वी अपने बच्चों की खैरियत मनाये। सरदार पटेल का कड़ा रुख देखकर रिज़वी वापिस हैदराबाद भाग गया।![]() |
| अब्दुल वाहिद ओवैसी |
1947 से 1957 तक मजलिस पर प्रतिबन्ध रहा। इसी कासिम रिज़वी की मजलिस पार्टी को 1957 में अब्दुल वाहिद ओवैसी ने दोबारा से शुरू किया और वही अब्दुल वाहिद ओवैसी अकबरुद्दीन और असदुद्दीन का दादा था। पाठक अब यह आसानी से जान गए होगे की किस प्रकार इनकी पार्टी मजलिस ने पहले हिंदुयों पर अत्याचार किया उसके बाद पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाये, और अब भारत में जिहादी गतिविधियों और दंगे फसाद को फैलाने की इनकी मंशा हैं। इनका एक ही हल हैं की इन दोनों भाइयों को कासिम रिज़वी की तरह पकड़ कर या तो जेल में डाल देना चाहिए अथवा पाकिस्तान भेज देना चाहिए और इनकी पार्टी पर राष्ट्र द्रोही गतिविधियों के कारण प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए। यह कार्य अगर कोई कर सकता हैं तो केवल सरदार पटेल कर सकते हैं और इसीलिए आज फिर पटेल याद आ गये।
साभार
link: http://agniveerfans.wordpress.com/2013/01/10/sardar-patel/
http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=Dje382DaAag
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