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शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

अपनी भाषा






• डा. विनोद बब्बर
हर व्यक्ति के लिए आवश्यक ड्राईविंग लाईसेंस पर एक भी शब्द हिन्दी का नहीं। इस सप्ताह हिन्दी, पंजाबी, उर्दू अकादमी तथा साहित्य कला परिषद के संयुक्त तत्वावधान में हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में हिन्दी, पंजाबी अथवा उर्दू का एक भी शब्द नहीं। सब अंग्रेजी में होना क्या साबित करता है? क्या स्व-भाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी में कुछ कमी है?
पिछले दिनों आस्ट्रेलिया की प्रधान मंत्री ने हमारे आत्मसम्मान को ललकारते हुए कहा, ‘भारत अंग्रेज शासित देश है।’ ऐसा तब हुआ जब एक समिति ने आस्ट्रेलिया - भारत संबंधों को और बेहतर बनाने के लिए सभी राजनयिकों को हिन्दी सीखने का सुझाव दिया। इस सुझाव को वहाँ की प्रधानमंत्री ने अस्वीकार करते हुए उक्त टिप्पणी की। सच ही तो है, जो राष्ट्र स्वयं अपनी राष्ट्रभाषा से नजरें चुराता हैं उसे अपने स्वाभिमान को आहत कर देने वाली ऐसी टिप्पणियों के लिए तैयार रहना चाहिए। यह दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्ष बाद भी हम विदेशी भाषा अंग्रेजी की दासता से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। राजधानी दिल्ली का अधिकतर शासकीय कार्य विदेशी भाषा में होता है।
हर व्यक्ति के लिए आवश्यक ड्राईविंग लाईसेंस पर एक भी शब्द हिन्दी का नहीं। इस सप्ताह हिन्दी, पंजाबी, उर्दू अकादमी तथा साहित्य कला परिषद के संयुक्त तत्वावधान में हो रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम के निमंत्रण पत्र में हिन्दी, पंजाबी अथवा उर्दू का एक भी शब्द नहीं। सब अंग्रेजी में होना क्या साबित करता है? क्या स्व-भाषा या राष्ट्रभाषा हिन्दी में कुछ कमी है? सत्य यह है कि हम हीनता-ग्रन्थि के शिकार होकर अनेक भ्रम व पूर्वाग्रहण पाले हुए हैं। आज अंग्रेजी माध्यम के स्कूल लोकप्रिय हो रहे हैं। हमारे बच्चों को हिन्दी में गिनती भी नहीं आती। क्या यह हमारे लिए शर्मनाक बात नहीं है? दरअसल हम भ्रम का शिकार है कि अंग्रेजी अकेली अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है जो पूरी दुनिया में समझी व बोली जाती है। सच्चाई यह है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में छह भाषायें चलती हैं। फ्रेंच, अंग्रेजी, रूसी, चीनी, और अरबी।
भारत की कुल जनसंख्या में आधे से अधिक लोग हिन्दी बोलते समझते व लिखते हैं। अन्य विदेशी भाषियों से हिन्दी कई गुना अधिक बड़ी है फिर भी संयुक्त राष्ट्रसंघ ने हिन्दी को स्वीकृति नहीं दी है तो इसका कारण हमारे प्रयासों का खोखलापन है, हिन्दी का नहीं। कितने लोग मानते हैं कि विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय डाक भाषा अंग्रेजी नहीं, फ्रेंच है। अंग्रेजी तो अपने देश इंग्लैंड में भी बड़ी मुश्किल से राष्ट्रभाषा बन सकी थी। फ्रांस में ऐसे 4000 शब्दों की सूची बनाई गई है जो उनकी भाषा में जबर्दस्ती घुस गए थे। एक विधेयक पारित कर इन शब्दों के फ्रेंच में इस्तेमाल रोकने का आदेश दिया गया।
मेरा स्वयं का अनुभव है कि फ्रांसवासियों में स्व-भाषा के प्रति जबरदस्त आदर है। वे अपनी भाषा को अंग्रेंजी से बेहतर मानते हैं। नीदरलैंड में अंग्रेजी हटाने के लिए एक आंदोलन हुआ क्योंकि उनके अनुसार डच भाषा व संस्कृति को इससे खतरा है। चीन, जापान, कोरिया और वियतनाम में सरकारी फरमान या आदेश अंग्रेजी में आने पर जनता तीव्र विरोध प्रकट करती है। जापानी भाषा दुनिया की सबसे कलिष्ट है। उसकी लिपि में 5000 से अधिक चिन्ह हैं। लेकिन उसके बावजूद वे हर कार्य अपनी भाषा में ही करना पसंद करते हैं।
अंग्रेजी के बिना ही जापान ने जबरदस्त उन्नति की है। उसके इलैक्ट्रोनिक सामान व उपकरण बनाने में विश्व में सर्वोच्च स्थान प्राप्त देश है जिसके माल की खपत हर जगह है। यही दशा चीन की भी है, जो आज सारी दुनिया के बाजारों पर कब्जा जमा रहा है। अनेक देशों जिनमें लीबिया, ईराक व बांग्लादेश शामिल है ने एक झटके में अंग्रेजी को निकाल बाहर कर दिया।
कर्नल गद्दाफी ने तो सेना को छह मास में अंग्रेजी हटाने का आदेश दे दिया। ईराक के पिछले शासक ने तो यहाँ तक कह दिया था कि जिसे अंग्रेजी पढ़नी हो वे ईराक छोड़ दें। बांग्लादेश ने ईसाई मिशनरी के संदर्भ में कहा कि इनकी अंग्रेजी से हमारी बंगाली भाषा को खतरा है। माओत्से तुंग ने सत्ता पर काबिज होते ही पूरे चीन में एक ही चीनी भाषा लागू कर दी, जबकि पहले वहां भी 6-7 क्षेत्रीय भाषाएं थी। एक चीनी भाषा होने के कारण भाषायी एकता होने से सभी चीनी स्वयं को एक सूत्र में जुड़े अनुभव करते हैं। स्पष्ट है कि अंग्रेजी कोई सर्वसम्मत अंतर्राष्ट्रीय भाषा नहीं है, जैसा कि हम समझते हैं। यह भी सभी को ज्ञात है कि अंग्रेजी वैज्ञानिक भाषा भी नहीं है। स्वयं अंग्रेज साहित्यकार बर्नाड शा इसे अराजक भाषा घोषित कर चुके हैं क्योंकि हर ध्वनि के लिए कोई तयशुदा शब्द नहीं है। इसके विपरित हिन्दी पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है। विदेशी भाषा की गुलामी अनावश्यक है। जो लोग यह तर्क देते है कि बेहतर क्षमता के लिए अंग्रेजी आवश्यक है उन्हें कौन समझाये कि तमिलनाडु में तीन मुख्यमंत्री सर्वश्री कामराज, एम.जी.रामचंद्रन व करूणनिधि को अंग्रेंजी का ज्ञान नहीं था तो भी उनका काल किसी भी तरह से कमतर नहीं कहा जा सकता।
कुछ लोग अंग्रेंजी को बनाये रखने के लिए क्षेत्रीय भाषाओं को हिन्दी से लड़ाने की कोशिश कर रहे हैं जबकि तथ्य यह है कि दोनों एक दूसरे की पूरक है। यदि क्षेत्रीय भाषाओं को खतरा है तो विदेशी भाषा से है। राष्ट्रभाषा सम्पूर्ण राष्ट्र के हृदयों को जोड़ती है। सम्पर्क भाषा बनकर आपसी संबंध सुदृढ़ बनाती है। हिंदी पूरे भारत की भाषा है। वह साहित्य की जननी, सभ्यता की पोषिका एवं संस्कृति की प्रेरणा है। श्री गोपालसिंह नेपाली ने एक जगह कहा है - हिंदी में गुजराती का संजीवन है, मराठी का चुहल (विनोद) है, कन्नड का माधुर्य है एवं है संस्कृत का अजस्र स्रोत। प्राकृत ने इसका श्रृंगार किया है और उर्दू ने इसके हाथों में मेंहदी लगाई है। यह आर्यों के स्वरों में गाती है और अनार्यों के ताल पर नाचती है। हिंदी राष्ट्रभाषा है। वस्तुतः हिंदी एक परंपरा का नाम है, एक सततवाहिनी सरिता का नाम है, जिसमें असंख्य नदी-नालों की अंजलियां समर्पित होती रहती हैं, जिसमें पूरे भारत के प्राण तरंगित होते रहते हैं।’ हिन्दी को सबसे ज्यादा प्रोत्साहन अहिन्दीभाषियों ने दिया। 1918 में बंगाली लेखक नलिनी मोहन सान्याल ने लंदन विश्वविद्यालय में हिन्दी में शोध् ग्रंथ प्रस्तुत किया। ब्रह्म समाज के नेता बंगला-भाषी केशवचंद्र सेन से लेकर गुजराती भाषा-भाषी स्वामी दयानंद सरस्वती ने जनता के बीच जाने के लिए जन-भाषा हिन्दी सीखने का आग्रह किया। गुजराती भाषी महात्मा गांधी, मराठी-भाषी काका कालेलकर ने सारे भारत में घूम-घूमकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया।
हिन्दी में काम करेंगे हम पहले संकल्प करें, निर्भय होकर आरम्भ करें, संकोच न मन में अल्प करें। 
पहले यदि कुछ मुश्किल होगी, धीरे-धीरे मिट जाएगी। अभ्यास निरन्तर करने से मज़्बूत पकड़ हो जाएगी।
नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज की भाषा हिन्दी ही थी। महर्षि अरविंद घोष हिन्दी-प्रचार को स्वाधीनता-संग्राम का एक अंग मानते थे। न्यायमूर्ति श्री शारदाचरण मित्र कहा करते थे- यद्यपि मैं बंगाली हूं तथापि इस वृद्धावस्था में मेरे लिए वह गौरव का दिन होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ हिन्दी में वार्तालाप करूंगा।’ बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने भी हिन्दी का समर्थन किया था। आज भी तमिलनाडू निवासी डॉ. बालशौरि रेड्डी से पंजाब के डॉ. हरमहेन्द्र सिह बेदी तक, जम्मू-कश्मीर के डॉ. चमनलाल सप्रू से शिलांग के अकेला भाई तक साहित्य के माध्यम से हिन्दी सेवा में सक्रिय है। वर्धा में स्थापित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय जिसके वर्तमान कुलपति डा.गोपीनाथन मलयालम भाषी है, इस दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। दुनिया के पचास से अधिक देशों हिन्दी में पठन-पाठन की सुविधा है। अनेक देश हिंदी कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं, जिनमें बीबीसी, यूएई क़े हम एफ-एम, जर्मनी के डॉयचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड और चीन के चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिंदी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हिन्दी की वर्तमान दशा के लिए हमारी शिक्षा पद्धति और शासन व्यवस्था-दोनों जिम्मेदार हैं।
अगर देश पर हावी अंग्रेजियत को हटाना है तो शिक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन लाना होगा। पहली से लेकर 10 कक्षा तक की शिक्षा से भारतीय भाषाओं का प्रयोग अनिवार्य करना होगा। विज्ञान, भूगोल आदि की पढ़ाई मातृभाषा में ही कराने का प्रावधान करना होगा। उसके बाद भी अंग्रेजी को एक अतिरिक्त विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। जब एक व्यक्ति अपनी भाषा में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करेगा, तो उस भाषा के प्रति उसका मोह और सम्मान आजीवन बना रहेगा। हिन्दी की मौजूदा स्थिति के लिए प्रशासन भी कम दोषी नहीं है। संसद से लेकर निम्न पदों तक सभी कार्य अंग्रेजी भाषा में किये जाते हैं। क्या संसद में हिन्दी भाषा में काम-काज नहीं यिका जा सकता? तर्क दिया जाता है कि सभी लोग हिन्दी नहीं जानते। क्या कभी उनसे पूछा गया है कि सभी लोग अंग्रेजी भी नहीं जानते।
अंग्रेजी जानने वालों का प्रतिशत हिन्दी भाषा जानने वालों से बेहद कम है, इस तथ्य को जानने के बाद भी मातृभाषा में काम क्यों नहीं किया जाता? अगर समस्या तेलुगू, बंगाली या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की है तो उनके लिए अनुवादक नियुक्त किये जा सकते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास का इस्तेमाल बखूबी कर सकते हैं। हम भारतीयों को अपनी उस मानसिकता में बदलाव लाना होगा कि हिन्दी जानने वाले व्यक्ति का बौद्धिक स्तर अंग्रेजी भाषा जानने वाले व्यक्ति के बराबर नहीं हो सकता, वह शीर्ष पर नहीं पहुंच सकता। इस तरह की मानसिकता में बदलाव लाने की जिम्मेवारी सिर्फ सरकार की नहीं है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार और सम्मान के लिए हम सभी को स्वयं आगे आना होगा। साल में एक बार ‘हिन्दी दिवस मनाने जैसे कर्मकाण्ड से ही हिन्दी को वह सम्मान नहीं मिल सकता, जिसकी वह हकदार है। आईए स्वयं से ही शुरूआत करें।
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साभार, लिन्क: आईबीटीएल हिन्दी

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

नशामुक्ति

खरनाक हैं गुटखा-तम्बाकू-शराब
प्रयास करें तो आप आसानी से इन्हें छोड़ सकते हैं
आपको बीड़ी सिगरेट की तलब न आए, गुटखा खाने की तलब न लगे, शारब पीने की तलब न लगे! इसके लिए बहुत अच्छे दो उपाय है जो आप बहुत आसानी से कर सकते है। पहला यह कि जिनको बार-बार तलब लगती है, जो अपनी तलब पर नियन्त्रण नहीं कर पाते, इसका मतलब उनका मन कमजोर है। तो पहले मन को मजबूत बनाओ। 
लम्बे समय तक तम्बाकू का प्रयोग करने से कई बीमारियां हो सकती हैं। भारत में मरने वाले हर पांच में से दो लोगो की मौत का मुख्य कारण खैनी, गुटखा या तम्बकू है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी ताजा रिपोर्ट में खुलासा किया है कि दुनिया भर में 30 साल से ज्यादा उम्र के लगभग 12 फीसदी लोगों की मौत का कारण खैनी, तम्बाकू, गुटखा आदि हैं। 
भारत में लगभग 16 प्रतिशत लोग इन्हीं तंबाकू उत्पादनों के सेवन से मर रहे हैं। धुआं रहित तंबाकू सेवन के मामले में भारत सबसे अव्वल देशों में से एक है। रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि धुआं रहित तंबाकू उत्पादों में सबसे ज्यादा सेवन खैनी का होता है। लगभग 91 प्रतिशत महिलाएं धुआं रहित तंबाकू का सेवन करती हैं। इनमें पान और खैनी शामिल है। मोटर्लटी एट्रीब्यूटेबल टू टोबको नामक रिर्पोट के अनुसार, तंबाकू सेवन के कारण 6 सकेंड में एक व्यकित की मौत हो रही है। पूरी दुनिया में लगभग 50 लाख लोगों की मौत का कारण तंबाकू का इस्तेमाल है।  अगले 20 वर्षों में सिगरेट, गुटखा, खैनी, बीड़ी, तंबाकू और हुक्का पीने से पूरी दुनिया में लगभग 6 लाख लोग सेकेंड़ हैंड स्मोकिंग की वजह से मर रहे हैं यानी तंबाकू सेवन करने वाले लोग अपनी ही नहीं बल्कि अपने परिवार और आसपास रहने वाले लोगों की भी जान ले रहे हैं। ग्लोबल अडल्ट टोबैको सर्वे के अनुसार, देश में लगभग 27 लाख लोगों की तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं। इनमें से लगभग 9 लाख लोगों की असमय मौत तय है। ग्लोबल यूथ टोबैको (गेट्स) के अनुसार, दिल्ली में 48.2 फीसदी युवा 15 साल से कम की उम्र में ही तम्बाकू का सेवन शुरू कर देते हैं। यहां के 13 लाख लोग पैसिव स्मोकर और 10 लाख लोग गुटखा के रूप में तम्बाकू का सेवन करते हैं। शोध के अनुसार 5 से 10 साल तक लगातार तम्बाकू सेवन करने वाले 30% युवाओं में नपुंसकता पाई गई है।
पुरी पोस्ट नही पढ़ सकते तो यहां click करे- http://youtu.be/6VytOKTVRN0
तलब से ऐसे पाएं छुटकारा
बहुत से लोग नशा छोड़ना चाहते है पर उनसे छूटता नहीं है। बार-बार वे कहते है हमें मालूम है यह गुटका खाना अच्छा नहीं है लेकिन तलब उठ जाती है तो क्या करें? बार-बार लगता है ये बीड़ी सिगरेट पीना अच्छा नहीं है लेकिन तलब उठ जाती है तो क्या करें?
बार-बार महसूस होता है यह शाराब पीना अच्छा नहीं है लेकिन तलब हो जाती है तो क्या करें? तो आपको बीड़ी सिगरेट की तलब न आए, गुटखा खाने की तलब न लगे, शारब पीने की तलब न लगे! इसके लिए बहुत अच्छे दो उपाय है जो आप बहुत आसानी से कर सकते है। पहला यह कि जिनको बार-बार तलब लगती है, जो अपनी तलब पर नियन्त्रण नहीं कर पाते, इसका मतलब उनका मन कमजोर है। तो पहले मन को मजबूत बनाओ।
मन को मजबूत बनाने का सबसे आसान उपाय है पहले थोड़ी देर आराम से पालती मार कर बैठ जाओ जिसको सुख आसन कहते हैं।  फिर अपनी आखें बंद कर लो फिर अपनी दायीं (right side) नाक बंद कर लो और खाली बायीं (left side) नाक से सांस भरो और छोड़ो! फिर सांस भरो और छोड़ो, फिर सांस भरो और छोड़ो।
बायीं नाक मे चंद्र नाड़ी होती है और दाई नाक मे सूर्य नाड़ी। चंद्र नाड़ी जितनी सक्रिय (active) होगी उतना इंसान का मन मजबूत होता है और इससे संकल्प शक्ति बढ़ती है। चंद्र नाड़ी जितनी सक्रिय होती जाएगी, आपकी मन की शक्ति उतनी ही मजबूत होती जाएगी। और आप इतने संकल्पवान हो जाएंगे। जो बात आप ठान लेंगे उसको बहुत आसानी से कर लेगें। तो पहले रोज सुबह 5 मिनट तक नाक की right side को दबा कर left side से सांस भरे और छोड़ो। यह एक तरीका है जो बहुत आसान है।
दूसरा एक और तरीका है। आपके घर मे एक आयुर्वेदिक ओषधि है जिसको आप जानते-पहचानते हैं। राजीव भाई ने उसका बहुत इस्तेमाल किया है लोगो का नशा छुड्वने के लिए। उस ओषधि का नाम है अदरक जो सबके घर मे होती है। इस अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े कर लो। उस मे नींबू निचोड़ दो और थोड़ा सा काला नमक मिला लो फ़िर इसको धूप मे सूखा लो। सुखाने के बाद जब इसका पूरा पानी सूख जाए तो इन अदरक के टुकड़ो को अपनी जेब में डिब्बी में या पुड़िया बनाकर रखें। जब तलब उठे तो निकालें और चूसें। जब भी दिल करे गुटका या तम्बाकू खाना, बीड़ी-सिगरेट पीनी है तो आप एक अदरक का टुकड़ा निकालें और मुंह मे रखकर चूसना शुरू कर दें। यह अदरक अदभुत चीज है। आप इसे दाँत से काटो मत और सवेरे से शाम तक मुंह मे रखो तो शाम तक आपके मुंह मे सुरक्षित रहेगा। इसको चूसते रहो आपको गुटका खाने की तलब ही नहीं उठेगी। तंबाकू-सिगरेट लेने की इच्छा ही नहीं होगी या शराब पीने का मन ही नहीं करेगा। यह बहुत आसान काम है कोई मुश्किल काम नहीं है।
आप बोलेगे अदरक मैं आखिर ऐसी क्या चीज है ? यह अदरक मे एक ऐसे चीज है जिसे हम रसायनशास्त्र (क्मिस्ट्री) मे कहते है सल्फर। अदरक मे सल्फर बहुत अधिक मात्रा मे है और जब हम अदरक को चूसते है तो यह हमारी लार के साथ मिल कर अंदर जाने लगता है और सल्फर खून मे मिलने लगता है। यह अंदर जाकर ऐसे हारमोन्स को सक्रिय कर देता है जो हमारे नशा करने की इच्छा को खत्म कर देता है।
विज्ञान की शोध के अनुसार यह माना जाता है कि कि कोई आदमी नशा तब करता है जब उसके शरीर मे सल्फर की कमी होती है तो उसको बार बार तलब लगती है बीड़ी सिगरेट तंबाकू आदि की। सल्फर की मात्रा आप पूरी कर दो बाहर से ये तलब खत्म हो जाएगी।  इसका राजीव भाई ने हजारो लोगो पर परीक्षण किया और बहुत ही सुखद प्रणाम सामने आए। बिना किसी खर्चे के शराब छूट जाती है बीड़ी सिगरेट शराब गुटका आदि छूट जाता है। आपको यदि ऐसी कोई लत है और आप उससे छुटकारा पाना चाहते हैं तो इसका प्रयोग अवश्कय करके देखें। आप नि:सन्देह सफ़ल होंगे।
इसका दूसरे उपयोग का तरीका भी पढें।
अदरक के रूप मे सल्फर भगवान ने बहुत अधिक मात्रा मे दिया है और सस्ता है। इसी सल्फर को आप होम्योपैथी की दुकान से भी प्राप्त कर सकते हैं। आप कोई भी हो म्योपैथी की दुकान से सल्फर नाम की दावा ले लें। आपको शीशी मे भरी हुई दवा मिलेगी। सल्फर नाम की दावा होम्योपैथी में तरल के रूप मे आती है, प्रवाही के रूप मे आती है जिसको हम Dilution कहते है अँग्रेजी में।
देखने मे ऐसे ही लगेगा जैसे यह पानी है। 5 मिली दवा की शीशी लगभग 5 रुपये में आती है और उस दवा का एक बूंद जीभ पर डाल लें सुबह खाली पेट। फिर अगले दिन और एक बूंद डाल लें। 3 खुराक लेते ही 50 से 60% लोगों की दारू छूट जाती है और जो ज्यादा पियक्कड़ हैं। जिनकी सुबह दारू से शुरू होती है और शाम दारू पर खतम होती है ! वो लोग हफ्ते मे दो दो बार लेते रहे तो एक दो महीने तक करे बड़े बड़े पियकरों की दारू छूट जाएगी। राजीव भाई ने ऐसे-ऐसे पियकाड़ों की दारू छुड़ाई है जो सुबह से पीना शुरू करते थे और रात तक पीते रहते थे उनकी भी दारू छूट गई, बस दो-तीन महीने का समय लगा।
ये सल्फर अदरक मे भी है और होम्योपेथी की दुकान में भी उपलब्ध है जिसे आप आसानी से खरीद सकते है। लेकिन जब आप होम्योपैथी की दुकान पर खरीदने जाएं तो 200 potency या शक्ति की yaa  सल्फ़र 200 दवा मांगें। आप 200 मिली लीटर का बोतल खरीद लें जो शायद 150 रुपए में मिलेगी। आप सैकड़ों लोगो की शराब छुड़वा सकते हैं मात्र एक बोतल से। लेकिन साथ में आप मन को मजबूत बनाने के लिए रोज सुबह बायीं नाक से सांस लें और अपनी इच्छा शक्ति मजबूत अवश्य करें।
अब एक खास बात। बहुत ज्यादा चाय और काफी पीने वालों के शरीर में आर्सेनिक (arsenic) तत्व की कमी हो जाती है। उसके लिए आप arsenic 200 का प्रयोग करें। गुटखा, तम्बाकू खाने वालों और सिगरेट-बीड़ी पीने वालों के शरीर में फ़ॉस्फ़ोरस (phosphorus)  तत्व की कमी हो जाती है। उसके लिए आप phosphorus 200 का प्रयोग करें। शराब पीने वाले में सबसे ज्यादा सल्फ़र (sulphur) तत्व की कमी होती है। उसके लिए आप sulphur 200 का प्रयोग करें। अच्छा यही है कि आप शुरुआत अदरक से ही करें।
वन्देमातरम !
एक बार यहाँ जरूर click करे !
http://youtu.be/6VytOKTVRN0
Link- http://goo.gl/VuycQ

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

एफ़डीआई

ममता या तो यहाँ से आर या पार
• जगमोहन फ़ुटेला
अपने अपने राज्य में एफडीआई का विरोध भी सियासी मजबूरी है ही कइयों के लिए। ऐसे में मुलायम, नितीश, नवीन पटनायक, चौटाला, खुद ममता, कांग्रेस और भाजपा दोनों के साथ मजबूरी में चल रहे करूणानिधि या जयललिता में से किसी एक और चंद्रबाबू नायडू जैसों के साथ मिल के अगर कोई मोर्चा बना सकें ममता तो वोट शेयर तो तब यूपीए और एनडीए का भी तब आज के 30 और 28 प्रतिशत से घट कर बड़ी आसानी से शायद 25 से भी नीचे आ लेगा।
मैं सोचता हूँ जो नवीन या उन के पिता बीजू पटनायक ने नहीं किया, करूणानिधि ने नहीं किया, बादल, चौटाला, चंद्रबाबू नायडू ने न किया। न बालासाहब ठाकरे ने। मुलायम और माया जो कर के भी कुछ हासिल नहीं कर पाए। महत्वाकांक्षा के साथ मिली ग्लैमरी चमक के साथ जयललिता ने भी जो नहीं किया, वो ममता बनर्जी क्यों कर रही हैं? क्यों उन्हें लगता है कि धमक वे देश में भी पैदा कर सकती हैं और उन्हें अब राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीति कर ही लेनी चाहिए? मान ही लेना चाहिए कि या तो बहुत मह्त्वाकांक्षिणी हैं या बहुत भोली हैं।
इस सब पे मंथन इस लिए इस लिए और भी ज़रूरी है कि वे जो कर रही हैं वो उनको पड़ा कोई दिमागी दौरा नहीं है। आज चढ़ा, कल उतर जाने वाला बुखार भी नहीं है। एफडीआई का मुद्दा भले उतना मज़बूत न हो उन का, इरादा मज़बूत है। लगता है उनके सलाहकारों ने सलाह तो ठीक ही दी है उन्हें। वे कांग्रेस का तो पता नहीं, कामरेडों का नुक्सान तो ज़रुर कर देंगी बंगाल के भीतर और बाहर भी। कभी वे सड़कों पे उतरते थे मंहगाई जैसे आर्थिक मुद्दों पे कांग्रेस के खिलाफ। आज ममता जंतर-मंतर पंहुची हुई हैं
कम्युनिस्टों को एक तरह से मुद्दाविहीन कर ही दिया है उन्होंने। बंगाल के भीतर उनकी ये छवि भी बन ही रही है उनकी कि अब ममता के कांग्रेस को छोड़ देने के बाद वामपंथी शायद फिर दामन थामेंगे कांग्रेस का बंगाल में। उनकी छवि का अच्छा ख़ासा कचरा कर रही है ममता की पार्टी बंगाल में। ऐसे में कांग्रेस की असली दुश्मन दिख के ममता कामरेडों को तो जैसे संदर्भहीन बना देने पर तुली हैं। इस अर्थ में एक बड़ी लड़ाई लड़ और उस में विजयी होती भी दिख रही हैं वे। लेकिन यक्ष प्रश्न फिर वही है। जब कोई क्षत्रप कामयाब नहीं हुआ किसी भी प्रदेश या अंचल का राष्ट्रीय स्तर पे, तो ममता वो प्रयोग करना ही क्यों चाह रहीं हैं? तब क्योंकि जब वो बड़ा जोखिम भरा भी है। ठीक से न हो पाए तो किसी हद तक आत्मघाती भी।
किसी भी प्रदेश के मुद्दे और आपको उस की राजनीति के शिखर तक भी ले आने के कारण होते हैं। पड़ोसी राज्य के साथ आपका कोई विवाद है तो किसी भी हद तक बोल या जा सकते हो आप अपने राज्य के लोगों को खुश करने के लिए। राष्ट्रीय राजनीति करनी हो तो उस राज्य में अपनी पार्टी की मजबूरियों, मुद्दों, राजनीति, हालत को भी देखना पड़ता है। यूं भी ठोस आर्थिक मुद्दों पर राजनीति कर सकते हो आप अपने बंगाल में। लेकिन पंजाब में मुद्दे जैसे होते ही नहीं हैं। पंजाब में तो पंजाब से बाहर के डेरों और बाबाओं की भी एक भूमिका होती है आपकी पार्टी को जितवाने या हरवाने में। भाषा और पहरावा भी एक वजह है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में तो जयललिता ने प्रचार किया नहीं कभी, लालू आये भी कांग्रेस का प्रचार करने तो कुछ नहीं कर पाए। संजय दत्त और राज बब्बर जैसे भीड़ बटोरू सितारे भी चौटाला का प्रचार करते रहे हैं हरियाणा में। आज दोनों वाया समाजवादी पार्टी कांग्रेस में हैं. सो, कोई विश्वसनीयता या कहें कि कोई अहमियत, इज्ज़त भी नहीं है उन की किसी राजनीतिक प्रतिबद्धता की।
ममता ने भी जो भाषण दिया दिल्ली में कभी वे खुद भी सुनेंगी तो आधा उन की खुद समझ में भी नहीं आएगा। संवाद के लिए भाषा का महत्व है तो है. और वो भाषा उन्हें नहीं आती जिस से वे उत्तर भारत की जनता के साथ संवाद भी कर सकें। लेकिन जिन्हें खुद हिंदी नहीं आती उन जनार्दन द्विवेदी और राजीव शुक्ला जैसों को रख के अगर सोनिया गाँधी को भी हिंदी नहीं आयी और वो फिर भी कोई पद लिए बिना हिंदुस्तान पे राज कर सकती हैं तो फिर ममता क्यों नहीं? सवाल जायज़ है। लेकिन सोनिया ममता नहीं हैं। सोनिया को देश की सियासत भी विरासत में मिली है. ममता ने जो पाया वो खुद कमाया है। सोनिया अपने किन्हीं गुणों या उपलब्धियों की वजह से सत्ताधारी कांग्रेस की मुखिया नहीं हैं। वे न होंगी तो कल राहुल कांग्रेस की मजबूरी हो जायेंगे। लेकिन ममता का जो है बंगाल में कार्यकर्त्ता से लेकर सत्ता तक, सब ममता की वजह से और उन के साथ होने से है। डर ये है कि देश की राजनीति के चक्कर में वे कहीं बंगाल तो नहीं खो देंगी? और ये खतरा इस लिए है कि बंगाल के बाहर उन्हें वो रुतबा मिलने नहीं वाला है कि वापिस जा कर वे विजयी मुद्रा में दिख सकें। बंगाल के बाहर बंगाल की खाड़ी से गहरी समस्याएं हैं और वे बंगाल से अलग भी हैं। इस पर तुर्रा ये कि अभी तो उनके उत्तर भारतीय संगठन में वे लोग दिख रहे हैं जो खुद कांग्रेस में फुंके हुए कारतूस साबित हुए हैं। और सब से बड़ी बात ये है कि बंगाल के बाहर राज्यों में कांग्रेस का विकल्प अगर लोग अगर देखते भी हैं तो वो वे उन में नहीं देखते। और विशुद्ध चुनावी अंकगणित के हिसाब से देखें तो आप के काटे कांग्रेसी वोट फायदा तो उस राज्य में कांग्रेस के प्रमुख विपक्षी दल को ही पंहुचाते हैं। इस अर्थ में जब आपकी सारी मेहनत आज या कल वोटों, सीटों और निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या के रूप में दिखाई नहीं देती तो फिर खुद अपना संगठन भी देर सबेर बिखरने लगता है।
लोग बड़े गरजाऊ हैं। सत्ताधारी या सत्ता में आ सकने वाली पार्टी का झंडा गाड़ी पे लगाना उन का शौक नहीं, मजबूरी भी है। बंगाल के बाहर वे टीएमसी का नहीं लगाएंगे। और अगर टीएमसी ने बिना गाँव, पंचायत, ब्लाक जैसी तैयारी के अभी हिमाचल चुनाव लड़ने जैसी गलती कर दी तो फिर किसी उत्तरी राज्य में पैसे दे के क्या, पैसे ले के भी कोई टिकट लेने न आएगा। माया जो पिछले चार चार चुनाव लड़ के भी कुछ हासिल नहीं कर पाईं इधर के राज्यों में वो ममता चार महीनों की मशक्कत से हासिल कर लेना चाहती हैं तो फिर वे मां जैसी भोली हैं, माटी जैसी कच्ची हैं और मानुष जैसे गलत भी फैसले कर सकने वाली महिला तो हैं ही. लेकिन इस सब के बावजूद वे वो कर सकती हैं जो इस देश की राजनीति में कभी किसी ने नहीं किया. कम से आज तो कोई करता नहीं दीखता। और उस की ज़बरदस्त संभावना और ज़रूरत भी है। वे तीसरा मोर्चा बना सकती हैं। बना वो पहले भी। लेकिन उस की आज जैसी सख्त ज़रूरत कभी नहीं रही। यूपीए और एनडीए दोनों को तीस प्रतिशत से ऊपर वोट शेयर न देने वाले सर्वे छोडो। घोटालों पे घोटालों, उस पर राहुल गाँधी का कार्ड यूपी तक में न चल पाने और उस पे भी अन्ना, रामदेव जैसों की पैदा की जाग्रति और छवि तो थी ही। अब एफडीआई, मंहगाई भी आम आदमी को अपने आप आपका बना देने वाला मुद्दा है।
अपने अपने राज्य में एफडीआई का विरोध भी सियासी मजबूरी है ही कइयों के लिए। ऐसे में मुलायम, नितीश, नवीन पटनायक, चौटाला, खुद ममता, कांग्रेस और भाजपा दोनों के साथ मजबूरी में चल रहे करूणानिधि या जयललिता में से किसी एक और चंद्रबाबू नायडू जैसों के साथ मिल के अगर कोई मोर्चा बना सकें ममता तो वोट शेयर तो तब यूपीए और एनडीए का भी तब आज के 30 और 28 प्रतिशत से घट कर बड़ी आसानी से शायद 25 से भी नीचे आ लेगा। बदला ही लेना है अगर कांग्रेस से तो फिर ये बड़ी मार होगी। और देश के राजनीतिक परिद्रश्य पे एक बड़ी भूमिका भी अदा करनी है उन को तो फिर वो स्थिति बड़ी संतोष दायिनी होगी। ये भी उन्हें करना है तो फिर इसी 2014 के चुनाव में कर लेना चाहिए। वरना आंध्र पे जब नायडू, तमिलनाडु पे करुणा और अम्मा, यूपी में माया या मुलायम, बिहार पे लालू, पंजाब पे अकालियों और हरियाणा पे चौटाला का पट्टा नहीं लिखा तो इस बात की भी क्या गारंटी है कि बंगाल पे राज हमेशा ममता ही करेंगी! ink-  http://journalistcommunity.com/index.php?option=com_content&view=article&id=2118:2012-10-01-19-10-58&catid=34:articles&Itemid=54

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

मीरजाफर

धूर्त राजनीति और मीरजाफर मनमोहन
खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का सवाल जिससे 5 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी जाने का संकट है, हमारी राजनीति में एक सामान्य सा सवाल है। राजनीतिक दल कांग्रेस के इस कदम का विरोध करते हुए राजनीतिक लाभ तो उठाना चाहते हैं किंतु वे ईमानदारी से अपने मुद्दों के साथ नहीं हैं। यह दोहरी चाल देश पर भारी पड़ रही है। सरकार की बेशर्मी देखिए कि आज के राष्ट्रपति और तब के वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी दिनांक सात दिसंबर, 2011 को संसद में यह आश्वासन देते हैं कि आम सहमति और संवाद के बिना खुदरा क्षेत्र में एफडीआई नहीं लाएंगे। किंतु सरकार अपना वचन भूल जाती है और चोर दरवाजे से जब संसद भी नहीं चल रही है, खुदरा एफडीआई को देश पर थोप देती है।  

मीरजा़फर ने लॉर्ड क्वाइव के नवाब बनने के प्रस्ताव को स्वीकार न किया होता तो शायद भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की नींव नहीं पड़ती। प्लासी के युद्ध में मीरजाफर की गद्दारी ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी को घुसने और अगले दो सौ सालों तक अंग्रेजों की गुलामी के लिए मजबूर कर दिया। अंग्रेजों से तो आजा़दी मिल गई लेकिन मीरजाफरों से मुक्ति नहीं मिली। हमारे युग के मीरजाफर मनमोहन सिंह ने आज से बीस साल पहले प्लासी का एक युद्ध लड़ा था और आर्थिक सुधारों के नाम पर देश की आर्थिक संप्रभुता को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथ गिरवी रख दिया था। जो कसर रह गई थी, उसे वे अब पूरा कर रहे हैं।
बीस साल पहले और अब बीस साल बाद एक बार फिर प्लासी का मैदान सजा तो मनमोहन सिंह ने मीरजाफर की भूमिका अख्तियार कर ली। एक तरफ जब पूरे देश में खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश के विरोध में प्रदर्शन चल रहे थे, ठीक उसी दिन उन प्रदर्शनों को ठेंगा दिखाते हुए मनमोहन सिंह ने विदेशी निवेश की अधिसूचना भी जारी करवा दी। 20 सितंबर, 2012 के भारत बंद में अड़तालीस (48) से ज्यादा छोटी-बड़ी राजनीतिक पार्टियां सहभागी होती हैं किंतु सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह अपने फैसले पर एक कदम और आगे बढ़ती है और विरोध का वह जवाब देश को देती है जो सीधे तौर पर विदेशी कंपनियों का हित साधने के लिए ही गढ़ा गया है।
सरकारें बदलीं पर नहीं बदले रास्ते
हम देखें तो 1991 की नरसिंह राव की सरकार जिसके वित्तमंत्री मनमोहन सिंह थे, ने नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की शुरूआत की। तब राज्यों ने भी इन सुधारों को उत्साहपूर्वक अपनाया। लेकिन जनता के गले ये बातें नहीं उतरीं। यानी जनराजनीति का इन कदमों को समर्थन नहीं मिला, सुधारों के चैंपियन आगामी चुनावों में खेत रहे और संयुक्त मोर्चा की सरकार सत्ता में आती है। किंतु अद्भुत यह कि यह कि संयुक्त मोर्चा सरकार और उसके वित्तमंत्री पी. चिदंबरम् भी वही करते हैं जो पिछली सरकार कर रही थीं। वे भी सत्ता से बाहर हो जाते हैं। फिर अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार सत्ता में आती है। उसने तो गज़ब ढाया। प्रिंट मीडिया में निवेश की अनुमति, केंद्र में पहली बार विनिवेश मंत्रालय की स्थापना की और जोरशोर से यह उदारीकरण का रथ बढ़ता चला गया। यही कारण था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक स्व. दत्तोपंत ठेंगड़ी ने तत्कालीन भाजपाई वित्तमंत्री को अनर्थमंत्री तक कह दिया था। संघ और भाजपा के द्वंद के इस दौर में साफ नजर आए। सरकारी कंपनियां घड़ल्ले से बेची गयीं और मनमोहनी एजेंडा इस सरकार का भी मूलमंत्र रहा। अंततः इंडिया शायनिंग की हवा-हवाई नारेबाजियों के बीच भाजपा की सरकार भी विदा हो गयी। सरकारें बदलती गयीं किंतु हमारी अर्थनीति पर अमरीकी और कारपोरेट प्रभाव कायम रहे। सरकारें बदलने का नीतियों पर असर नहीं दिखा। फिर कांग्रेस लौटती है और देश के दुर्भाग्य से उन्हीं डा. मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह, चिदम्बरम् जैसों के हाथ देश की कमान आ जाती है जो देश की अर्थनीति को किन्हीं और के इशारों पर बनाते और चलाते हैं। ऐसे में यह कहना उचित नहीं है कि जनता ने प्रतिरोध नहीं किया। जनता ने हर सरकार को उलट कर एक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की, किंतु हमारी राजनीति पर इसका कोई असर नहीं हुआ।
मुद्दों के साथ ईमानदार नहीं है विपक्ष
खुदरा क्षेत्र में एफडीआई का सवाल जिससे 5 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी जाने का संकट है, हमारी राजनीति में एक सामान्य सा सवाल है। राजनीतिक दल कांग्रेस के इस कदम का विरोध करते हुए राजनीतिक लाभ तो उठाना चाहते हैं किंतु वे ईमानदारी से अपने मुद्दों के साथ नहीं हैं। यह दोहरी चाल देश पर भारी पड़ रही है। सरकार की बेशर्मी देखिए कि आज के राष्ट्रपति और तब के वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी दिनांक सात दिसंबर, 2011 को संसद में यह आश्वासन देते हैं कि आम सहमति और संवाद के बिना खुदरा क्षेत्र में एफडीआई नहीं लाएंगे। किंतु सरकार अपना वचन भूल जाती है और चोर दरवाजे से जब संसद भी नहीं चल रही है, खुदरा एफडीआई को देश पर थोप देती है। आखिर क्या हमारा लोकतंत्र बेमानी हो गया है? जहां राजनीतिक दलों की सहमति, जनमत का कोई मायने नहीं है। क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि राजनीतिक दलों का विरोध सिर्फ दिखावा है। क्योंकि आप देखें तो राजनीति और अर्थनीति अरसे से अलग-अलग चल रहे हैं। यानि हमारी राजनीति तो देश के भीतर चल रही है किंतु अर्थनीति को चलाने वाले लोग कहीं और बैठकर हमें नियंत्रित कर रहे हैं। यही कारण है कि मुख्यधारा के राजनीतिक दलों में अर्थनीति पर दिखावटी मतभेदों को छोड़ दें तो आमसहमति बन चुकी है।
आज कोई दल यह कहने की स्थिति में नहीं है कि वह सत्ता में आया तो खुदरा क्षेत्र में एफडीआई लागू नहीं होगा। क्योंकि सब किसी न किसी समय सत्ता सुख भोग चुके हैं और रास्ता वही अपनाया जो नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की सरकार ने दिखाया था। उसके बाद आयी तीसरा मोर्चा की सरकारें हों या स्वदेशी की पैरोकार भाजपा की सरकार, सबने वही किया जो मनमोहन टीम चाहती है। ऐसे में यह कहना कठिन है कि हम विदेशी राष्ट्रों के दबावों, खासकर अमरीका और कारपोरेट घरानों के प्रभाव से मुक्त होकर अपने फैसले ले पा रहे हैं। अपनी कमजोर सरकारों को गंवानें की हद तक जाकर भी हमारी राजनीति अमरीका और कारपोरेट्स की मिजाजपुर्सी में लगी है।
मीर ज़ाफ़र और लॉर्ड क्लाइव
क्या यह साधारण बात है कि कुछ महीनों तक पश्चिमी और अमरीकी मीडिया द्वारा निकम्मे और ‘अंडरअचीवर’ कहे जा रहे हमारे माननीय प्रधानमंत्री आज एफडीआई को मंजूरी देते ही उन सबके लाडले हो गये। यह ऐसा ही है जैसे फटा पोस्टर निकला हीरो। लेकिन पश्चिमी और अमरीकी मीडिया जिस तरह अपने हितों के लिए सर्तक और एकजुट है क्या हमारा मीडिया भी उतना ही राष्ट्रीय हितों के लिए सक्रिय और ईमानदार है?
विरोध करेंगे पर सरकार से चिपके रहेंगे

यह देखना विलक्षण है कि जो राजनीतिक दल सत्ता की इस जनविरोधी नीति के खिलाफ सड़क पर हैं, वही सरकार को गिराने के पक्ष में नहीं हैं। मुलायम सिंह यादव से लेकर एम. करूणानिधि तक यह द्वंद्व साफ दिखता है। यानी सत्ता को हिलाए बिना वे जनता के दिलों में उतर जाना चाहते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या किसी जनविरोधी सरकार का पांच साल चलना जरूरी है ? निरंतर भ्रष्टाचार व महंगाई के सवालों से घिरी, जनविरोधी फैसले करती सरकार आखिर क्यों चलनी चाहिए? यदि इसे चलना चाहिए तो डा. राममनोहर लोहिया यह बात क्यों कहा करते थे कि “जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं।” किंतु आप देखिए डा. लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश के चेले उप्र से लेकर बिहार तक सौदेबाजी में लगे हैं। मुलायम सिंह यादव सरकार को बचाएंगें चाहे वो कुछ भी करें क्योंकि उनके पास सांप्रदायिक ताकतों को रोकने का एक शाश्वत बहाना है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार कह रहे हैं जो उनके राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देगा उसके साथ हो लेंगे। आखिर हमारी राजनीति को हुआ क्या है? आखिर राजनीतिक दलों के लिए क्या देश के लोग एक तमाशा हैं कि आप सरकार को चलाने में मदद करें और सड़कों पर सरकार के खिलाफ गले भी फाड़ते रहें। शायद इसीलिए राजनीतिक दलों की नैतिकता और ईमानदारी पर सवाल उठते हैं। क्योंकि आज के राजनीतिक दल अपने मुद्दों के प्रति भी ईमानदार नहीं रहे। सत्ता पक्ष की नीतियों से देश लुटता रहे किंतु वे सांप्रदायिक तत्वों को रोकने के लिए घोटाले पर घोटाले होने देंगें।
संगठन और सरकार के सुर अलग-अलग
क्या यह साधारण बात है कि हर दल का संगठन आम आदमी की बात करता है और उसी की सरकार खास आदमी, अमरीका और कारपोरेट की पैरवी कर रही होती है। आप देखें तो सोनिया गांधी गरीब समर्थक नीतियों की पैरवी करती दिखती हैं, राहुल गांधी को ‘कलावतियों’ की चिंता है वे दलितों के घर विश्राम कर रहे हैं, किंतु उनकी सरकार गरीबों के मुंह से निवाला छीनने वाली नीतियां बना रही है। भाजपा की सरकार केंद्र में उदारीकरण की आंधी ला देती है, जबकि उसका मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वदेशी और स्वावलंबन की बातें करता रह जाता है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सुप्रीमो प्रकाश कारात विचारधारा से समझौता न करने की बात करते हैं किंतु उनके मुख्यमंत्री रहे बंगाल के बुद्धदेव भट्टाचार्य नवउदारवादी प्रभावों से खुद को रोक नहीं पाते और नंदीग्राम रच देते हैं। मुलायम सिंह भी लोहिया, जयप्रकाश और चरण सिंह का नाम लेते नहीं अघाते किंतु वे भी ‘कारपोरेट समाजवाद’ के वाहक बन जाते हैं। जब कारपोरेट समाजवाद उन्हें ले डूबता है तब वे ‘अमर सिंह एंड कंपनी’ से मुक्ति लेते हैं। विदेशी धन और निवेश के लिए लपलपाती राजनैतिक जीभें हमें चिंता में डालती हैं। क्योंकि देश में जो बड़े धोटाले हुए हैं वे हमारी सारी आर्थिक प्रगति को पानी में डाल देते हैं। अमरीका के बाजार को संभालने के लिए हमारी सरकार का उत्साह चिंता में डालता है। ओबामा के प्रति यह भक्ति भी चिंता में डालती है। यह तब जब यह सारा कुछ उस पार्टी के राज में घट रहा है जो महात्मा गांधी का नाम लेते नहीं थकती।
आज भी जो लोग इन फैसलों के खिलाफ हैं, उनकी ईमानदारी भी संदेह के दायरे में है। वे चाहे मुलायम सिंह हो या करूणानिधि या कोई अन्य। एक साल में चार बार भारत बंद कर रहे दल क्या वास्तव में जनता के सवालों के प्रति ईमानदार हैं? सारी की सारी राजनीति इस समय जनविरोधी और मनुष्यविरोधी तंत्र को स्थापित करने के लिए मौन साधे खड़ी है। 2014 के चुनावों के मद्देनजर यह विपक्ष की दिखती हुई उछल-कूद हमें प्रभावित करने के लिए है, किंतु क्या जिम्मेदारी से हमारे राजनीतिक दल यह वादा करने की स्थिति में हैं कि वे खुदरा क्षेत्र में एफडीआई को मंजूरी नहीं देंगें। सही मायने में भारत के विशाल व्यापार पर विदेशियों की बुरी नजर पड़ गयी है। इस बार लॉर्ड क्वाइव और मैकाले की रणनीतियों से नहीं, हमें अपनों से हारना है। हार तय है, क्योंकि हममें जीत का माद्दा बचा नहीं है। प्रतिरोध नकली हो चुके हैं और प्रतिरोध के सारे हथियार भोथरे हो चुके हैं। प्लीज, इस बार भारत की पराजय का दोष विदेशियों को मत दीजिएगा।
• संजय द्विवेदी 
साभार (लिन्क): विस्फ़ोट
कार्टून © टी.सी. चन्दर/कार्टूनपन्ना 
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बी.ए.लखनऊ विश्वविद्यालय से किया, फिर पत्रकारिता में बी.जे. और एम.जे. एम.सी. की डिग्री भोपाल के माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से ली। दैनिक भास्कर भोपाल, स्वदेश के भोपाल, रायपुर के संस्करणों के अलावा नवभारत-मुंबई, दैनिक भास्कर-बिलासपुर, हरिभूमि-रायपुर में समाचार संपादक, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में रीडर आदि महत्वपूर्ण पदों पर कार्य। छत्तीसगढ़ राज्य के प्रमुख दैनिक समाचार पत्र हरिभूमि में स्थानीय संपादक एवं छत्तीसगढ़ के प्रथम सैटेलाइट चैनल जी-24 घंटे, छत्तीसगढ़ के एडिटर इन्पुट रहे। विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों से संबंद्ध । संप्रतिः विभागाध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय 
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