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रविवार, 2 अगस्त 2015

मिशन

मिशनरी संस्थाएँ और एनजीओ
बाल श्रमिक तथा यौन शोषण दुष्चक्र

हमारे भारत के “तथाकथित मेनस्ट्रीम” मीडिया में कभीकभार भूले-भटके महानगरों में काम करने वाले घरेलू नौकरों अथवा नौकरानियों पर होने वाले अत्याचारों एवं शोषण की दहला देने वाली कथाएँ प्रस्तुत होती हैं। परन्तु चैनलों अथवा अखबारों से जिस खोजी पत्रकारिता की अपेक्षा की जाती है वह इस मामले में बिलकुल नदारद पाई जाती है। आदिवासी इलाके से फुसलाकर लाए गए गरीब नौकर-नौकरानियों की दर्दनाक दास्तान बड़ी मुश्किल से ही “हेडलाइन, “ब्रेकिंग न्यूज़” या किसी “स्टिंग स्टोरी” में स्थान पाती हैं। ऐसा क्यों होता है? जब एक स्वयंसेवी संस्था ने ऐसे कुछ मामलों में अपने नाम-पते गुप्त रखकर तथा पहचान छिपाकर खोजबीन और जाँच की तब कई चौंकाने वाले खुलासे हुए।
दिल्ली-मुम्बई-कोलकाता-अहमदाबाद जैसे महानगरों में की गई इस जाँच से पता चला कि बड़े-बड़े शक्तिशाली NGOs तथा कई मिशनरी संस्थाएँ एक बड़े “रैकेट” के रूप में इस करोड़ों रूपए के “धंधे” को चला रही हैं। इस संस्था को जितनी जानकारी प्राप्त हुई है उसके अनुसार इन NGOs एवं मिशनरी संस्थाओं की कार्यशैली इस प्रकार है। सबसे पहले ईसाई मिशनरियाँ भारत के दूरदराज आदिवासी क्षेत्रों में गरीब आदिवासियों को शहर में अच्छी नौकरी और परिवार को नियमित मासिक धन का ऐसा लालच देती हैं कि उसे नकार पाना मुश्किल ही होता है। उस गरीब परिवार की एक लड़की को वह संस्था पहले अपनी शरण में लेकर ईसाई बनाती है और उसे महानगर में उन्हीं की किसी कथित “प्लेसमेंट एजेंसी” के जरिये नौकरानी बनाकर भेज देती है। यह प्लेसमेंट एजेंसी उस धनाढ्य परिवार से पहले ही 30 से 50,000 रूपए “विश्वसनीय नौकरानी” की फीस के रूप में वसूल लेते है।
गाँव में बैठी मिशनरी संस्था और महानगरों की एजेंसी के बीच में भी “दलालों” की एक कड़ी होती है जो इन नौकरों-नौकरानियों को बेचने अथवा ट्रांसफर करने का काम करते हैं। यह एक तरह से “मार्केट सप्लाय चेन” के रूप में काम करता है और प्रत्येक स्तर पर धन का लेन-देन किया जाता है। महानगर में जो कथित प्लेसमेंट एजेंसी होती है, वह इन नौकरानियों को किसी भी घर में चार-छह माह से अधिक टिकने नहीं देती और लगातार अलग-अलग घरों में स्थानान्तरित किया जाता ह। जो परिवार पूरी तरह सिर्फ नौकरों के भरोसे रहते हैं, उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके यहाँ कौन काम कर रहा है, क्योंकि उन्हें तो सिर्फ अपने काम पूर्ण होने से मतलब रहता है। चूँकि विश्वसनीयता (खासकर उस नौकर द्वारा चोरी करने वगैरह) की जिम्मेदारी उस एजेंसी की होती है, इसलिए मालिक को कोई फर्क नहीं पड़ता कि नौकरानी कौन है, कहाँ से आई है या चार महीने में ही क्यों बदल गई? इस प्रकार यह प्लेसमेंट एजेंसी एक ही नौकरानी को तीन-चार-छः घरों में स्थानांतरित करते हुए उन धनाढ्यों से धन वसूलती रहती है।
सामान्यतः इन घरेलू नौकरानियों को ना तो अच्छी हिन्दी आती है और ना ही अंग्रेजी. चूँकि उधर सुदूर गाँव में मिशनरी ने मोर्चा संभाला हुआ होता है, इसलिए परिवार को भी कोई चिंता नहीं होती, क्योंकि उस नौकरानी के वेतन में से अपना कमीशन काटकर वह NGO उस परिवार को प्रतिमाह एक राशि देता है, इसलिए वे कोई शिकायत नहीं करते। परन्तु इधर महानगर में वह नौकरानी सतत तनाव में रहती है और बार-बार घर बदलने तथा प्लेसमेंट एजेंसी अथवा NGO पर अत्यधिक निर्भरता के कारण अवसादग्रस्त हो जाती है। इसी बीच इन तमाम कड़ियों में कुछ व्यक्ति ऐसे भी निकल आते हैं जो इनका यौन शोषण कर लेते हैं, परन्तु परिवार से कट चुकी इन लड़कियों के पास वहीं टिके रहने के अलावा कोई चारा नहीं होता. एक अनुमान के मुताबिक़ अकेले दिल्ली में लगभग ८०० ऐसी नौकरानियां काम कर रही हैं, जबकि उधर दूरस्थ आदिवासी इलाके में उसका परिवार चर्च से एकमुश्त मोटी रकम लेकर धर्मान्तरित ईसाई बन चुका होता है.
अपने “शिकार” पर मजबूत पकड़ तथा इन संस्थाओं की गुण्डागर्दी की एक घटना हाल ही में दिल्ली में दिखाई दी थी, जब एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में ऊँचे वेतन पर पदस्थ एक महिला को दिल्ली पुलिस ने अपनी “नौकरानी पर अत्याचार” के मामले में थाने में बैठा लिया था। महिला पर आरोप था कि उसने एक नाबालिग आदिवासी लड़की के साथ मारपीट की है। पुलिस जाँच में पता चला कि वह लड़की झारखण्ड के संथाल क्षेत्र से आई है और उसका परिवार बेहद गरीब है।
हमारी “सनसनी-प्रिय” मीडिया ने खबर को हाथोंहाथ लपका और दिन भर “बालश्रम” विषय पर तमाम लेक्चर झाडे़, खबरें बनाईं. जाँच में आगे पता चला कि उस लड़की को सिर्फ तीन माह पहले ही उस संभ्रांत महिला के यहाँ किसी एजेंसी द्वारा लाया गया था और इससे पहले कम से कम बीस घरों में वह इसी प्रकार काम कर चुकी थी। दिल्ली पुलिस ने जब झारखंड संपर्क किया तो पता चला कि लड़की १८ वर्ष पूर्ण कर चुकी है. यहाँ पर पेंच यह है कि जब उस महिला ने पुलिस को पैसा खिलाने से इनकार कर दिया तब पुलिस ने मामला रफा-दफा कर दिया, जबकि होना यह चाहिए था कि पुलिस उस नौकरानी द्वारा काम किए पिछले सभी घरों की जाँच करती (क्योंकि तब वह नाबालिग थी) और साथ ही उस कथित प्लेसमेंट एजेंसी के कर्ताधर्ताओं की भी जमकर खबर लेती, तो तुरंत ही यह “रैकेट” पकड़ में आ जाता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि जिस NGO और मिशनरी संस्था से उस एजेंसी की साँठगाँठ थी, उसने ऊपर से कोई राजनैतिक दवाब डलवा दिया और वह नौकरानी चुपचाप किसी और मालिक के यहाँ शिफ्ट कर दी गई. केस खत्म हो गया.
दिल्ली पुलिस के अधिकारी भी इस रैकेट के बारे में काफी कुछ जानते हैं, परन्तु कोई भी कार्रवाई करने से पहले उन्हें बहुत सोचना पड़ता है। क्योंकि अव्वल तो वह नौकरानी “ईसाई धर्मान्तरित” होती है, और उसके पीछे उसका बचाव करने वाली शक्तिशाली मिशनरी संस्थाएँ, NGOs होते हैं, जिनके तार बड़े राजनेताओं से लेकर झारखंड-उड़ीसा के दूरदराज स्थानीय संपर्कों तक जुड़े होते हैं। इन्हीं संगठनों द्वारा ऐसे ही कामों और ब्लैकमेलिंग के लिए महानगरों में कई मानवाधिकार संगठन भी खड़े किए होते हैं. इसलिए पुलिस इनसे बचकर दूर ही रहती है। दिल्ली की उस संभ्रांत महिला के मामले में भी यही हुआ कि वृंदा करात तत्काल मामले में कूद पड़ी और उस महिला पर दबाव बनाते हुए उसे शोषण, अत्याचार वगैरह का दोषी बता डाला, लेकिन इस बात की माँग नहीं की, कि उस एजेंसी तथा उस नौकरानी के पूर्व-मालिकों की भी जाँच हो. क्योंकि यदि ऐसा होता तो पूरी की पूरी “सप्लाय चेन” की पोल खुलने का खतरा था। यही रवैया दूसरे राजनैतिक दलों का भी रहता है. उन्हें भी अपने आदिवासी गरीब वोट बैंक, मिशनरी संस्थाओं से मिलने वाले चन्दे और दूरदराज में काम कर रहे NGOs से कार्यकर्ता आदि मिलते हैं। इसलिए कोई भी राजनैतिक दल इस मामले में गंभीर नहीं है और यथास्थिति बनाए रखता है।
बालश्रम, शोषण के ऐसे मामलों में कुछ शातिर NGOs इसमें भी ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोज लेते हैं। चूँकि उनके पास संसाधन हैं, अनुभव है, नेटवर्क है, तो वे धनाढ्य परिवार को धमकाते हैं कि यदि वे अपनी भलाई चाहते हों तथा पुलिस के चक्करों से बचना चाहते हों तो फलाँ राशि उन्हें दें अन्यथा नौकरानी कैमरे और पुलिस के सामने कह देगी कि उसके साथ यौन शोषण भी किया गया है। पुलिस के अनुसार कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि जब उस एजेंसी (अथवा NGO) को यह लगने लगता है कि बात बिगड़ने वाली है या अब उस परिवार को नौकरानी की जरूरत नहीं रहेगी इसलिए भविष्य में उस परिवार से उनकी आमदनी का जरिया खत्म होने वाला है तो वे इन्हीं नौकरानियों को डरा-धमकाकर महँगे माल की चोरी करवाकर उन्हें रातोंरात वापस उनके गाँव भेज देती हैं। यदि कभी कोई लड़की गलती से तेजतर्रार निकली, बातचीत अच्छे से कर लेती हो, थोड़ी बहुत अंग्रेजी भी सीख चुकी है तो उसे “गोद लेने” के नाम पर अपने किसी विदेशी नेटवर्क के जरिये यूरोप अथवा खाड़ी देशों में भेज दी जाती है।
भारत के मीडिया के बारे में तो कहना ही क्या, “खोजी पत्रकारिता” किस चिड़िया का नाम है, ये तो वे बरसों पहले भूल चुके हैं। इतने सारे संसाधन और रसूख होने के बावजूद उन्हें मानवता से कोई लेना-देना नहीं. किसी घरेलू नौकरानी के शोषण और अत्याचार का मामला उनके लिए TRP बढ़ाने और सनसनीखेज खबर बनाने का माध्यम भर होता है, उन्हें इस बात की कतई चिंता नहीं है कि आखिर ये नौकरानियाँ कहाँ से आती हैं? क्यों आती हैं? कौन इन्हें लाता है? इनका पूरा वेतन क्या वास्तव में उनके ही पास अथवा परिवार के पास पहुँचता है या नहीं? “प्लेसमेंट एजेंसी” क्या काम कर रही है? उनकी फीस कितनी है? ऐसे अनगिनत सवाल हैं परन्तु मीडिया, नेता, पुलिस, तंत्र सभी खामोश हैं और उधर खबर आती है कि २०१४-१५ में पश्चिम बंगाल से सर्वाधिक ११००० लड़कियाँ रहस्यमयी तरीके से गायब हुई हैं, जिनका कोई एक साल से कोई अतापता नहीं चला।
यदि केन्द्र सरकार अपनी सक्षम एजेंसियों के मार्फ़त महानगरों में काम करने वाली नौकरानियों के बारे में एक विस्तृत जाँच करवाए तो कई जाने-माने मिशनरी संस्थाएँ एवं NGOs के चेहरे से नकाब उतारा जा सकता है, जो दिन में "Save the Girl Child", "Donate for a Girl Child" के नारे लगाते हैं, लेकिन रात में "मानव तस्कर" बन जाते हैं।
साभार • सुरेश चिपलूणकर
लिन्क: http://blog.sureshchiplunkar.com/2015/08/missionaries-ngos-and-child-labour.html

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

पशु वध

मेनका के बयान पर तूफान

केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी के बयान को जिस तरह विवाद का विषय बनाया गया है वह अस्वाभाविक नहीं है। लंबे समय से देश के किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठे हुए व्यक्ति के मुंह से ऐसी बातें नहीं निकलीं थीं। जिनमें अल्पसंख्यकों में विशेषकर मुसलमानों के प्रति प्रश्न खड़ा करने का पहलू हो तो उससे लोग दूर ही रहने की कोशिश करते रहे हैं। इसलिए मेनका की बात से सनसनाहट जैसी स्थिति पैदा होती है। हालांकि यह विषय मुस्लिम विरोधी है ही नहीं। मेनका ने मुख्यतः तीन बातें कहीं। पहला, देश में अवैध तरीके से दुधारु गाय की बेरहमी से हत्यायें हो रहीं हैं। उन्हांेंने विशेष तौर पर पश्चिमी एशिया एवं बांग्लादेश का नाम लेते हुए कहा कि उसेे १६०० टन गोमांस का निर्यात किया जा रहा है। हालांकि पशुपालन विभाग के आंकड़ों में यह नहीं मिलेगा। दूसरे, उन्होंने कहा है कि इसे केवल एक समुदाय या मजहब तक तक सीमित नहीं। तीसरे, इसका पैसा आतंकवाद में लग रहा है। मेनका का दावा है कि चार वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश पुलिस को इससे संबंधित रिपोर्ट सौंपी गई थी।
हम रिकॉर्ड में विश्व के सबसे बड़े मांस निर्यातक हो गए हैं। भारत से जो मांस निर्यात होता है वो गाय का है, बैल का है, भैंस का है....इसके बारे में अधिकृत रिकॉर्ड सरकार ने रखा ही नहीं। यूरोप एवं अमेरिका में कहा जाता है कि भारत के निर्यात में भैंस का मांस ज्यादा है। अगर ऐसा ही है तो बैल और देसी गायें कहां विलुप्त होतीं गईं हैं? गाय और उसकी संतति बैल भारतीय किसानों की ताकत थी। बैल खेती को स्वावलंबी बनाता था। गाय हमें पुष्ट रखने के लिए दूध देती है, उसके पेशाब से आयुर्वेद की अनेक दवाईयां बनती हैं तथा उसके गोबर का उपयोग केवल खेत में ही नहीं और कई कार्यों में परंपरागत तरीके से होता रहा है। ऐसे जानवर की हत्या राष्ट्रीय अपराध होना चाहिए।
अनेक कत्लगाहों के खिलाफ गांधीवादी, अहिंसक लोग आंदोलन कर रहे हैं। गांधी जी गोवंश की हत्या के विरुद्ध थे। संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में इसे शामिल कर संविधान निर्माताओं ने भावी नेताओं से यह अपेक्षा की थी कि वे गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाएंगे। राष्ट्रीय स्तर पर इसके निषेध का कोई कानून नहीं है। केन्द्र सरकार की पूर्व नीति मांस निर्यात को बढ़ावा देने की रही है और डेयरी विकास के नाम पर इसमें कई प्रकार की छूट भी है। 
आतंकवाद संबंधी आरोपों की पुष्टि उत्तर प्रदेश सरकार ही कर सकती है कि पुलिस को ऐसी रिपोर्ट मिली थी या नहीं। लेकिन आतंकवाद कहीं भी वैध धन से नहीं फैलता। अवैध तरीके से धन दिए जाने से ही जेहादी आतंकवाद का खतरनाक विस्तार हुआ है। अगर कोई मांस के अवैध निर्यात से प्राप्त धन से कुछ आतंकवादियों को मदद कर रहे हों तो इसमें आश्चर्य का कोई कारण नहीं है। हमारे यहां आतंकवादी पैदा हो रहे हैं यह सच है। तभी तो महाराष्ट्र का एक पढ़ा लिखा युवक अचानक इराक चला गया 
उनकी दूसरी भी सही है। काटने वाले मुसलमान होते हैं, लेकिन उसे ढोने वाले हिन्दू हो सकते हैं, पालने वाले बेचने वाले हिन्दू हो सकते हैं। एवं आईएसआईएस के लिए लड़ते हुए मारा गया। हैदराबाद में पुलिस ने १४ युवाओं को पकड़ा जो इराक और सीरिया जा रहे थे। पता नहीं और कितने कहां से जा रहे होंगे। इनको वहां तक जाने के लिए धन कौन दे रहा है? इसकी तो जांच होनी चाहिए।

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

ईसाइयत

ईसाइयत पर भारत के महापुरुषों के विचार

स्वामी विवेकानन्द
आप मिशनरियों को शिक्षा कपड़े और पैसे क्या इसलिए देते हैं कि वे मेरे देश में आकर मेरे सभी पूर्वजों को मेरे देश में आकर मेरे सभी पूर्वजों को, मेरे धर्म को और जो भी मेरा है, उस सब को गालियां दें, भला बुरा कहें। वे मंदिर के सामने खड़े होकर कहते हैं ऐ ! मूर्तिपूजकों तुम नकर में जाओगे, लेकिन हिन्दुस्तान के मुसलमानों से ऐसी ही बात करने की उनकी हिम्मत इसलिए नहीं होती कि कहीं तलवारें न खिंच जाएं...और आपके धर्माधिकारी जब भी हमारी आलोचना करें, तब वे यह भी ध्यान रखें कि यदि सारा हिन्दुस्तान खड़ा होकर सम्पूर्ण हिन्द महासागर की तलहटी में पड़े कीचड़ को पश्चिमी देशों पर फेंकें, तो भी अन्याय के अंश मात्र का ही परिमार्जन होगा जो आप लोग हमारे साथ कर रहे हैं।
• डेट्राइट में ईसाइयों की एक सभा में वक्त्व्य
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मोहनदास करम चन्द गांधी
यदि वे पूरी तरह से मानवीय कार्यों तथा गरीबों की सेवा करने के बजाय डाक्टरी सहायता, शिक्षा आदि के द्वारा धर्म परिवर्तन करेगें, तो मैं निश्चय ही उन्हें चले जाने को कहूंगा  प्रत्येक राष्ट्र का धर्म अन्य किसी राष्ट्र के धर्म के समान ही श्रेष्ठ है। निश्चय ही भारत का धर्म यहां के लोगों के लिए पर्याप्त है। हमें धर्म परिवर्तन की आवश्कता नहीं।
• गांधी वाङ्मय खण्ड ४५ पृष्ठ ३३९
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पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन्
तुम्हारा क्राइस्ट तुम्हें एक उत्तम स्त्री और पुरुष बनाने में सफल न हो सका, तो हम कैसे मान लें कि वह हमारे लिए अधिक प्रयास करेगा, यदि हम ईसाई बन भी जाएं।
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डॉ. भीमराव अम्बेडकर
यह एक भयानक सत्य है कि ईसाई बनने से अराष्ट्रीय होते हैं।साथ ही यह भी सत्य है कि ईसाइयत, मतान्तरण के बाद भी जातिवाद नहीं मिटा सकती।• राइटिंग एण्ड स्पीचेज वाल्यूम 5 पृष्ठ 456

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गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर
ईसाई व मुसलमान मत अन्य सभी को समाप्त करने हेतु कटिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य केवल अपने मत पर चलना नहीं है अपितु मानव धर्म को नष्ट करना है।
• पृष्ठ रवीन्द्र नाथ वाडमय २४ वां खण्ड पृष्ठ २७५ , टाइम्स आफ इंडिया १७-०४-१९२७ , कालान्तर




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कवि

जनपथ










मेरे मस्तिष्क के आकाश में
गहरी धुन्ध
साफ़ हो जाती है
जब मैं
भारत की राजधानी के बीचों-बीच
जनपथ को
राजपथ से
कटते हुए देखता हूं!
• सरदार दलीप सिंह अलमी
सरदार दलीप सिंह अलमी
पिछले दिनों मेरी तबियत के बारे में जानने को घर पर आये हिन्दी के जबरदस्त पक्षपाती मेरे पुराने मित्र गज़लकार-कवि सरदार दलीप सिंह।

सहयात्रा में पढ़िए