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सोमवार, 12 मार्च 2012

भारतवासी

भारत के मुसलमान हैं आप
• ए.एम. बिस्मिल
    दीन-धर्म उसे ही कहते हैं जिसके करने से पहले, बीच में और बाद में डर, शक व शुभा और शर्म न हो तथा जिससे शरीर, आत्मा तथा देश की उन्नति हो। सुख और खुशहाली के लिए भारत में रह रहे मुसलमानों को यह चाहिए कि वे संगठित होकर भारत के प्रति सदा अपनी वफादारी का परिचय दें। सब प्रकार की अफवाहों से दूर रहकर विदेशी शक्ति तथा धन पर इतराकर भारत के प्रति गद्दारी की भावना रखने वाले चन्द सिरफिरे मुसलमानों से सदा दूर रहें। इस प्रकार के तथाकथित मुसलमान नेता शान्ति के साथ खुशहाली की ओर बढ़ रहे मुसलमानों के सख्त दुश्मन हैं। ऐसे नेता आज मात्र अपनी कुर्सी के लोभ में दूसरों के घरों को आग लगा अपने हाथ सेकना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य समझते हैं।
    आज हमें भारत जैसे हिन्दू प्रधान देश में रहते हुए जिसे स्वतन्त्रता के साथ अपने मजहबी उसूलों के अनुसार चलने अर्थात् मुस्लिम यूनिवर्सिटियां खोलकर खोलकर अपने बच्चों को उर्दू माध्यम से शिक्षा देने, अपनी रीति-रिवाज के अनुसार जीवन यापन करने, निर्भीकता से मजहबी जलसे, जुलूस निकालने, भारत सरकार की ओर से अपने ईद आदि त्यौहारों की छुट्टियां पाने, यहां अपने नाम पर मनपसन्द जमीनें खरीदने, बेरोकटोक व्यापार करने इच्छा के अनुसार अधिक से अधिक मस्जिदें बनाकर इस्लाम का प्रचार करने, अल्पसंख्यक होने के नाते कॉलेजों, चुनावों तथा सरकारी नौकरियों में विशेष सीटें प्राप्त करने और यहां तक कि  राजनीति में भाग लेकर राष्ट्रपति तक बनने की जितनी छूट यहां एक गैर-मुस्लिम देश में प्राप्त है उतनी दुनिया के किसी भी गैर-मुस्लिमदेश में नहीं है। यथा चीन में कोई कोई मुसलमान एक से अधिक पत्नी नहीं रख सकता तथा न दो से अधिक बच्चे पैदा कर सकता है। सिंगापुर में तमाम कब्रों को तोड़कर बिजली द्वारा मुर्दों को जलाया जाता है। जापान के मुसलमानों को अपने मुर्दों के लिए कब्रें बनाने की आज्ञा नहीं। इस्राइल आदि देशों में कोई मुसलमान  अपने मजहब का प्रचार नहीं कर सकता। नेपाल में कोई मुसलमान  किसी भी प्रकार से किसी हिन्दू का मजहब बदलकर उसे मुसलमान  नहीं बना सकता। ऐसा करने वाले को कठोर दण्ड मिलता है। साथियो,  आज इस हिन्दू-धर्म प्रधान देश में रहते हुए हम मुसलमानों को जितनी सुविधाएं प्राप्त हैं उन सब का एक अंश भी इन सिख, जैन, बौद्ध आदि हिन्दुओं को किसी भी मुसलमान देश में प्राप्त नहीं हैं।
अरब, ईराक, ईरान अथवा पाकिस्तान आदि मुसलमान देशों में कोई सिख, जैन, बौद्ध आदि हिन्दू (सरकारी सहायता से) वहां धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक  स्वतन्त्रता या सुविधा प्राप्त नहीं कर सकता।  यथा-
1. कोई भी सिख, जैन, बौद्ध आदि हिन्दू मुस्लिम देशों में अपने धर्म एवम् भाषा के अनुसार न तो कोई विद्यालय अथवा विश्वविद्यालय खोल सकता है और न ही भारत में चल रहे अलीगढ़ तथा जामिया आदि विश्वविद्यालयों की तरह हिन्दी माध्यम से पढ़ने की सुविधा ही पा सकता है।
2. हिन्दुस्तान में उर्दू माध्यम से चल रहे आम विद्यालयों तथा मस्जिदों  में चल रही हजारों मजहबी पाठशालाओं की तरह न उन मुस्लिम देशों में ऐसा कोई संस्कृत वेद-विद्यालय ही खोल सकता है और न ही किसी सरकारी विद्यालय में अपने धर्म के अनुसार हमारे जुम्मे की तरह मनमानी छुट्टी ही मिल सकती है।
3. कोई भी हिन्दू वहां न तो हिन्दी भाषा में कोई कामकाज कर सकता है और न ही किसी को सरकार की ओर से ईद आदि की तरह श्रीराम नवमी, श्रीकृष्ण अष्ठमी, दशहरा अथवा दीपावली की छुट्टी ही मिल सकती है।
4. हिन्दी अथवा संस्कृत माध्यम से कोई हिन्दू उन मुस्लिम देशों में किसी प्रकार का रेडियो अथवा टीवी का कार्यक्रम नहीं सुन-देख  सकता। रामनवमी आदि धार्मिक प्रोग्राम को सुनना या देखना तो दूर अपितु प्रतिदिन काम में आने वाले साधारण समाचार भी अपनी भाषा में नहीं सुन सकता।
5. हम मुसलमानों की तरह अपना राष्ट्रपति चुनना तो दूर अपितु वहां हिन्दुओं के अल्पसंख्यक होने के नाते न तो उन्हें राजनीति में भाग लेने की आज्ञा है और न ही चुनाव लड़ने की। यहां तक कि अल्पसंख्यक के नाम पर किसी स्कूल या कॉलेज में सीट भी नहीं ले सकता।
6. वहीं रह रहे हिन्दुओं के द्वारा उन मुस्लिम देशों में अपने धर्म या संस्था के नाम पर किसी अलग स्थान की मांग करना तो दूर,  हिन्दू होने नाते वे एक छोटी-सी सरकारी नौकरी भी प्राप्त नहीं कर सकते।
7. भारत के सरकारी कार्यालयों में लगे हुए चित्रों की भांति मुस्लिम देशों में अपने धर्म या संस्था के नाम पर उन देशों में शेख के चित्र की तरह कोई भारतीय अपने हिन्दू नेता का चित्र नहीं लगा सकता।
8. भारत के राष्ट्रपति भवन में पाकिस्तान के तत्कालीन जनरल जिया-उल-हक के नमाज पढ़ने की तरह कोई भी हिन्दू वहां किसी सामान्य सरकारी स्थान पर यज्ञ-हवन नहीं कर सकता।
9. अपने हिन्दू धर्म के अनुसार बैण्ड बाजे बजाकर वहां न तो कोई भी हिन्दू जलसा-जुलूस ही निकाल सकता है और न ही हमारे यहां ताजियों की तरह अपने धर्म का वहां खुलकर प्रचार ही कर सकता है।
10. वहां के हिन्दुओं को खुलेआम अपने धर्म का पालन करने की छूट नहीं है।
11. हिन्दुस्तान में लाखों हलाल के मांस की दुकानें चल रही हैं पर वहां झटके के मांस पर पूर्ण प्रतिबन्ध है। वहां किसी सिख के द्वारा सुअर के मांस की दुकान भी नहीं खोली जा सकती।
12. कोई हिन्दू वहां गाय जैसे अपने किसी पूज्य पशु के मांस को खाने से किसी को नहीं रोक सकता जो वहां मुसलमानों के द्वारा खुलेआम खाया जाता है।
13. किसी हिन्दू के द्वारा इन तमाम मुस्लिम देशों में खुलेआम अपने धर्म की किताब, वेद, शास्त्र, रामायण, गीता आदि छापना या बेचना तो दूर किसी दुकान पर इन्हें रखा भी नहीं जा सकता। आर्य समाज के ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश पर तो वहां पूर्ण प्रतिबन्ध है।
14. भारत में कश्मीर जैसी मुस्लिम बाहुल्य वाली सरकार की तरह अरब देशों में शराब की दुकान खोलना तो दूर बल्कि यदि कोई पीता हुआ पकड़ा जाए तो उसे कोड़े मारने की कठोर सजा दी जाती है।
15. मैं भारत में अपने बहुत से मुस्लिम भाइयों की कब्रों को कहीं-कहीं तो बड़े-बड़े राजमार्गों को रोकते हुए देखता हूं। पर उन मुस्लिम देशों में कोई हिन्दू किसी एकांत जंगल में भी अपने धर्म के  मन्दिर, मठ अथवा गुरुद्वारे के नाम पर डेढ़ ईंट भी नहीं लगा सकता।
16. कोई भी हिन्दू उन मुस्लिम देशों में धोती पहनकर या कृपाण लटकाकर कार्य नहीं कर सकता। बाहर तो क्या इन देशों में वह अपने घर पर भी डरता होगा। आपको यह भी पता होना चाहिए कि सऊदी अरब में कोई खालसा अर्थात् सिख आज भी प्रवेश नहीं पा सकता।
17. कोई हिन्दू, चाहे वह पण्डित हो या सिख, वहां की सेना या पुलिस में नौकरी कर पाना तो दूर अन्य किसी सरकारी कार्यालय में भी नौकरी नहीं पा सकता।
18. कोई हिन्दू वहां पर अपनी फैक्टरी व व्यापार के लिए जमीन नहीं ले सकता, किसी प्रकार का भी स्वतन्त्र व्यापार नहीं कर सकता। कोई भी हिन्दू वहां उसी हालत में व्यापार कर सकता है जब वह किसी स्थानीय मुस्लिम को अपना पार्टनर बनाकर 51 प्रतिशत  का हिस्सेदार बनाए।
19. भारत की आजादी के बाद हमारे और हिन्दुओं के बीच अनेक बार गौ हत्या के सवाल पर झगड़े हो चुके हैं। झगड़े कभी भी किसी वर्ग के लिए लाभदायक नहीं होते हैं।
सऊदी अरब में गौ हत्या करने वाले को मौत की सजा मिलती है। ऐसी स्थिति में भी वहां बिना गाय काटे मुसलमानों की शादियां और दावतें सफलतापूर्वक होती हैं। यदि हमारे मुसलमान भाई सऊदी अरब की तरह यहां भी गाय को न मारने का निश्चय कर लें तो भारत में हिन्दू और मुसलमान अमन से जी सकते हैं।
20. देश के कुछ गद्दार लोग  यह कहकर भी दंगे भड़काते हैं कि हिन्दुस्तान में इस्लाम मजहब सुरक्षित नहीं है। एक मुसलमान होने के नाते मैं यह समझता हूं कि इस बात से बड़ा कोई दूसरा सफेद झूठ नहीं हो सकता।
इस अफवाह की असलियत का तो इसी से पता चलता है कि 1947  के बाद हिन्दुस्तान में हजारों नयी मस्जिदें, हजारों नये उर्दू माध्यम के स्कूल तथा अलीगढ़, जामिया और देवबन्द जैसे विश्वविद्यालय बेखौफ चल रहे हैं। जबकि दूसरी ओर पाकिस्तान में हिन्दुओं के उंगलियों पर गिने जा सकने वाले 2-4 ही धर्म स्थान ही बचे हैं। जबकि हिन्दुस्तान में ऐसा नहीं है। क्या यह मुस्लिमों पर अत्याचार का प्रतीक है?
21. पाकिस्तान, ईरान, ईराक या सऊदी अरब आदि मुस्लिम देशों की क्रिकेट, फुटबॉल या हाकी आदि की टीमों में कोई भी हिन्दू खिलाड़ी नहीं खेलता। जबकि दूसरी ओर यहां की ज्यादातर खेल टीमों में बहुत से मुसलमान खिलाड़ी हैं। यहां तक कि एशियाड में हाकी की दुर्भाग्यवश हारने वाली टीम के कप्तान जफर इकबाल भी मुसलमान ही थे। इससे स्पष्ट है कि भारत में मुसलमानों को कितने अधिकार प्राप्त हैं।
    उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए सब मुसलमानों को चाहिए कि अपनी सर्वांगीण उन्नति के लिए हिन्दुस्तान के प्रति वफादार बनकर रहें। भारत सरकार की हम पर बहुत बड़ी कृपा है कि उसने 1947 में  अलग देश पाकिस्तान दे देने पर भी यहां हिन्दुस्तान में हमें इस्लाम धर्म के अनुसार चलने की सब सुविधाएं दे रखी हैं।
प्रिय भाइयो, आज जो कथित मुसलमान नेता विदेशों के इशारे पर नाचकर अपनी कुर्सी या धन के लिए जातीय दंगे करवा देते हैं, वे ही वास्तव में मुसलमान मजहब को धब्बा लगाकर देश के गद्दार बनकर यहां हमारे लिए कांटे बो रहे हैं। उनसे हमें दूर रहना चाहिए।
    मेरा सभी मुसलमान भाइयों से अनुरोध है कि वे इस लेख की अधिक से अधिक उर्दू, हिन्दी और अंग्रेजी में प्रतियां छपवाकर सब मुस्लिमों तक पहुंचाने का कष्ट करें जिससे भारत में शन्ति से रहते हुए मुसलमान तथा इस्लाम मजहब शान्ति से उन्नति कर सकें और आपसे झगड़ों के कारण हमें यहां से उजड़ना न पड़े।
(सर्वोदय जगत में पूर्व प्रकाशित)

मंगलवार, 6 मार्च 2012

बचिए रासायनिक रंगों के खतरों से
कार्टून: चन्दर  visit- http://cartoonholi.blogspot.in/
अपने चेहरे, बाल और शरीर के वे भाग जो रंगों के सम्पर्क में आ सकते हैं उन पर ऑलिव ऑयल या सरसों का तेल लगा लेना चाहिए। ऐसा करने से से एक सुरक्षा पर्त बन जाती है। महिलाएं नाखूनों पर गहरे रंग की नेल पालिश लगाएं इससे होली खेलने के बाद रिमूवर से नेल पालिश उतारने पर नाखूनों पर लगा रंग भी उतर जाएगा। यदि कोई चेहरे पर गाढ़ा रंग लगा दे तो तो चेहरे को तुरन्त सादा पानी से धो लें। इससे चेहरे पर रंग का असर गहरा नहीं हो पाएगा और चेहरा आसानी से साफ हो जाएगा।
रंग उतारने के लिए कभी त्वचा को बहुत ज्यादा न रगड़ें। बार-बार नहाना और चेहरा धोना भी ठीक नहीं। त्वचा पर जहां गहरे निशान पड़ गये हों वहां हलके हाथ से नीबू का छिलका रगड़ें। खटाई या अमचूर पाउडर पानी में घोलकर त्वचा पर रगड़ने से भी रंग का प्रभाव कम हो जाता है।
आप स्वयं होली खेलने के लिए प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करें और दूसरों को भी प्रेरित करें।विशेष रूप से बच्चों पर भी नजर रखें। आजकल बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाले और प्राकृतिक पदार्थों से बने रंग-गुलाल आसानी से मिल जाते हैं। आप चाहें तो थोड़ी सूझबूझ से खुद घर में ही रंग बना सकते हैं।
हर्बल रंग
हरा रंग- मेहंदी के पत्तों को सुखाकर पीसकर रख लें। इस पाउडर को रातभर पानी में भिगोकर रखें। हरा रंग तैयार हो जाएगा। इसमें आटा या मैदा मिला देने से रंग का लाइट शेड बनाया जा सकता है। पालक और धनिया जैसी सब्जियों का प्रयोग भी रंग बनाने में किया जा सकता है।
लाल रंग- लाल चन्दन पाउडर या सिन्दूर उपयोग किये जा सकते हैं। गुलाब की सूखी पंखुडि़यां, लाल गुड़हल के फूलों को पानी में भिगोकर भी रंग बनाया जा सकता है। चुकन्दर को कद्दूकस करके या पीसकर भी शानदार रंग बनाया जा सकता है।
नीला रंग- जकरन्दा या नीली अड़हुल जैसे फूलों को पीसकर बढि़या नीला रंग तैयार किया जा सकता है। इण्डिगो पेड़ की फली (बेरी) को पीसकर भी नीला रंग बनाया जा सकता है। इसमें उपयुक्त मात्रा में पानी मिलाकर उपयोग किया जा सकता है।
पीला रंग- बेसन में पिसी-छनी हल्दी (पाउडर) मिलाकर जोरदार पीला रंग बनाया जा सकता है।
रंगों में मिले रसायन
काला- लैड ऑक्साइड- गुर्दे के लिए हानिकारक,
हरा- कॉपर सल्फेट- आंखों में खुजली, अस्थायी अंधापन,
रजत (सिल्वरद)- एल्यूमीनियम ब्रोमाइड- कैंसर,
लाल- मरकरी ;पाराद्ध सल्पफेट- त्वचा में खुजली, क्रोमियम, कैडमियम युक्त होने पर- बुखार,  अस्थमा, निमोनिया, एलर्जी, आदि
अतः कड़ाई से इन रंगों से बचें। रासायनिक रंगों का खुद उपयोग न करें और दूसरों को इनका उपयोग न करने को कहें। बच्चों को भी समझाएं और उन पर नजर रखें। थोड़ी सूझबूझ से घर में ही प्राकृतिक रंग तैयार करें और होली के प्रेम भरे पावन पर्व को सुरक्षित व सही ढंग से मनाएं।
इस होली महोत्सव में प्रति व्यक्ति कम से कम एक पेड़ अवश्य लगाए। जमीन नहीं है तो गमले में ही कोई नया पौधा लगाएं। यदि अभी तक आपके यहां तुलसी नहीं है तो बहुउपयोगी तुलसी का एक पौधा लगाना न भूलें।
मंजू गोपालन
देखें- मीडिया नेटवर्क भजन कीर्तन कार्टून होली  

रविवार, 11 दिसम्बर 2011

कार्टूनिस्ट मारियो

विश्वविख्यात कार्टूनिस्ट मारियो मिरांडा नहीं रहे
मारियो को पहली सफलता तब मिली जब `इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इण्डिया' के लिए कार्टून बनाने का प्रस्ताव मिला और उनके बहुत सारे कार्टून इस जानीमानी पत्रिका में छपे। एक साल बाद ही उन्हें 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में नौकरी का प्रस्ताव मिला। 

पणजी। प्रख्यात कार्टूनिस्ट मारियो मिरांडा का पणजी के निकट उनके निवास पर आज सुबह यानी 11 दिसंबर, 2011 को निधन हो गया। वे ८५ वर्ष के थे। गोवा के जीवन और अपने चारों ओर की दुनिया पर उन्होंने अपने ढंग से  विनोदपूर्ण चित्रण किया जिसे हर वर्ग के लोगों ने भरपूर सराहा। 
दिग्गज कार्टूनिस्ट मारिओ का अपने क्षेत्र में अपनी अनोखी और रोचक शैली के लिए अपने दर्शक-पाठकों के मन-मस्तिष्क में महत्वपूर्ण स्थान था। उनके हर कार्टून को पसन्द किया जाता है। मिस नींबूपानी (Nimbupani) और मिस फ़ोनेस्का मारियो मिरांडा के कार्टून 'फेमिना', 'नवभारत टाइम्स' और ’इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इण्डिया' में नियमित रूप से छपते थे।
मारियो मिरांडा ने मुंबई में प्रतिष्ठित सेंट जेवियर कॉलेज से सेंट जोसेफ हाई स्कूल, बंगलौर और बीए (इतिहास) का अध्ययन किया। प्रारंभ में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में शामिल होने में उनकी रुचि थी, लेकिन बाद में उनका मन बदल गया और उन्होंने अपने माता पिता के आग्रह पर वास्तुकला का अध्ययन शुरू कर दिया।
परिवार के सूत्रों के अनुसार जल्द ही उनकी रुचि वास्तुकला में भी खत्म हो गयी। फ़िर कला के क्षेत्र में सक्रिय होकर उन्होंने एक विज्ञापन स्टूडियो में अपना कैरियर शुरू किया और कार्टून बनाना आरम्भ करने से पहले उन्होंने चार साल काम किया।
मारियो को पहली सफलता तब मिली जब `इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इण्डिया' के लिए कार्टून बनाने का प्रस्ताव मिला और उनके बहुत सारे कार्टून इस जानीमानी पत्रिका में छपे। एक साल बाद ही उन्हें 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में नौकरी का प्रस्ताव मिला। उन्हें एक Fundacao Calouste Gulbenkian छात्रवृत्ति पाने के बाद विदेश यात्रा का अवसर मिला। मारियो ने पुर्तगाल  और फिर लंदन में समाचार पत्रों के लिए और टीवी एनिमेशन के लिए काफ़ी काम किया।
अपने कैरियर के दौरान कई दशकों में मारियो ने कई किताबों के लिए अनेक चित्र बनाये। मनोहर मलगांवकर की 'इनसाइड गोवा', ‘ए फ़ैमिली इन गोआ’ और डोम मोरेस की पुस्तक ’ओपन आइज़' जैसी कई किताबों के लिए बनाये गये उनके चित्र लोग भूल नहीं पाएंगे। उनकी अनूठी और गुदगुदाने में सक्षम शैली का शायद ही कोई मुकाबला कर पाए।
उन्होंने एक कलाकार के रूप में 'पद्म भूषण', 2002 में और 1988 में पद्मश्री सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त किये।
मारिओ मिरांडा के परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटे हैं।
सहयात्रा की कार्टूनिस्ट मारियो मिराण्डा को विनम्र श्रद्धांजलि! 
• कार्टूनिस्ट चन्दर

मंगलवार, 29 नवम्बर 2011

सीनाजोरी

http://t3.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcQGe9MXgvFjU-weVaN7GO8_uyoMtubiFC533qHm0xgXI5YTpXH0सर्वोच्च न्यायालय में दिल्ली पुलिस ने अपनी पोल खुद ही खोल दी है। उसने गृहमंत्री पी. चिदंबरम पर छाता तान दिया है। उसने अदालत से कहा है कि गृह मंत्रीजी बड़े चिंतित हो उठे थे। रामलीला मैदान में 50 हजार लोगों की समाई थी लेकिन एक लाख से भी ज्यादा लोग आ गए थे और आते ही जा रहे थे। ऐसी हालत में गृहमंत्री जी ने जो निर्णय कि उसकी अनुमति संविधान देता है। बेचारे पुलिसवालों को चिदंबरम के अफसरों ने जो पट्टी पढ़ाई, वही उन्होंने अदालत के सामने उगल दी। 
सर्वोच्च न्यायालय के सामने दिल्ली पुलिस को कैसी सफेद झूठ बोलनी पड़ रही है। यह उसकी मजबूरी है। वह भी उसकी मजबूरी थी कि उसे 4 जून को बाबा रामदेव के भक्तों पर हमला करना पड़ा। मजबूरी को छिपाने की इस मजबूरी पर किसे तरस नहीं आएगा? हमारे नेताओं से ज्यादा खूंखार प्राणी भारत में और कौन हैं? इन खूंखार नेताओं के सामने बेचारे पुलिसवालों की हैसियत क्या है? नेताओं का इशारा पाते ही उन्हें उन लोगों पर भी टूट पड़ना होता है, जो बिल्कुल बेकसूर और मासूम होते हैं। नेताओं के इशारे पर ही हमारी पुलिस हत्यारों और बलात्कारियों पर छाता तान देती है। उसने यही काम 4 जून को रामलीला मैदान में किया।
सर्वोच्च न्यायालय में दिल्ली पुलिस ने अपनी पोल खुद ही खोल दी है। उसने गृहमंत्री पी. चिदंबरम पर छाता तान दिया है। उसने अदालत से कहा है कि गृह मंत्रीजी बड़े चिंतित हो उठे थे। रामलीला मैदान में 50 हजार लोगों की समाई थी लेकिन एक लाख से भी ज्यादा लोग आ गए थे और आते ही जा रहे थे। ऐसी हालत में गृहमंत्री जी ने जो निर्णय कि उसकी अनुमति संविधान देता है। बेचारे पुलिसवालों को चिदंबरम के अफसरों ने जो पट्टी पढ़ाई, वहीं उन्होंने अदालत के सामने उगल दी। पुलिस के बयान से यह रहस्य खुल गया कि रामलीला मैदान के भूखे-प्यासे सत्याग्रहियों पर जानलेवा हमला किसने करवाया?
दुनिया के इतिहास में एक लाख लोगों का सामूहिक अनशन पहले कभी नहीं हुआ। गांधी जी के जमाने में भी नहीं हुआ। यदि इस अनशन की पूर्णाहुति ससम्मान होती तो सारे विश्व में भारत का माथा ऊँचा होता। अहिंसक आंदोलन का विश्व-प्रतिमान कायम होता। इस सरकार को भी जबर्दस्त श्रेय मिलता लेकिन हमारे केन्द्रीय मंत्रिमंडल में बैठे कुछ अंहकारी, नौसिखिए और नौकरीबाज नेताओं ने सरकार की इज्जत धूल में मिला दी। कांग्रेस जैसी महान पार्टी को, जो अपने अहिंसक आंदोलनों के कारण सारे विश्व में सम्मानित हुई, इन तथाकथित नेताओं ने कलंकित कर दिया। पुलिस ने उनका अंधा आदेश माना और आम जनता ने पलटकर उन पर वार नहीं किया, इसका मतलब यह नहीं कि वे सस्ते में छूट गए। भारत के करोड़ों लोगों ने उस दिन खून का घूंट पिया है। वे दुष्टों को दंडित किए बिना नहीं रहेंगे। देश की सर्वोच्च अदालत को आगे बढ़कर सरकार के इस कुकर्म पर आखिर उंगली क्यों उठानी पड़ी है।
प्रधानमंत्री ने उस रावण लीलापर खेद जरूर प्रगट किया। वे मगर के आंसू थे लेकिन आज तक वे और उनके मंत्री देश और अदालत को यह नहीं बता पाए कि हमारी इस नखदंतहीन सज्जन सरकार को इतनी भंयकर गुंडागर्दी करने की जरूरत क्यों पड़ गई? अदालत ने बिल्कुल सटीक सवाल पूछा है कि पुलिस ने पांच जून की सुबह तक इंतजार क्यों नहीं किया? गहरी नींद में सोए हुए, भूखे-प्यासे एक लाख लोगों पर उसने मध्यरात्रि में हमला क्यों किया? संन्यासिनों, ब्रह्मचारिणियों, वेदपाठी पंडितों, किशार छात्रों, वृद्ध वानप्रस्थितियों-किसी को भी नहीं बख्शा गया। यदि भारत में सचमुच के राजनीतिक दल होते तो यह सरकार पांच जून की सुबह ही गिर जाती। जरा याद करें, नवंबर, 1966 को। गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को दूसरे दिन सुबह ही इस्तीफा देना पड़ा था, गौरक्षा-आंदोलन पर हिंसक-प्रहार करने के लिए। खुद कांग्रेस पार्टी में बगावत हो गई थी। यदि भारती की जगह कोई बौद्ध या ईसाई या मुस्लिम राष्ट्र और उसके साधुओं पर इस तरह का प्रहार होता तो जनता नेताओं की खाल खींच लेती।
हमारी पुलिस अपने मालिकों को बचाने के लिए अपने पाप का ठीकरा बाबा रामदेव के माथे पर फोड़ रही है। वह उस गुंडागर्दीके लिए रामदेवजी को जिम्मेदार ठहरा रही है। चोरी और सीनाजोरी कर रही है। बाबा रामदेवी की गलती यही है कि वे इन धूर्त नेताओं के चकमे में आ गए और उनसे 4 जून की शाम तक बात करते रहे। वे उन्हें आदरणीय और विश्वसनीय समझते रहे। हमारी सबसे बड़ी अदालत को जड़ तक पहुंचना होगा। बेचारे पुलिसवाले उसे क्या जवाब देंगे? उसके कटघरे में तो उन सब मंत्रियों को खड़ा किया जाना चाहिए, जिन्होंने बाबा रामदेव को धोखा दिया और अपनी सरकार की कब्र खोद दी। 
POSTED BY: DR.VAIDIK ON: NOVEMBER 27 2011 • CATEGORIZED IN: ARTICLES 
साभार: http://www.vpvaidik.com

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